40 धारावाहिक मे आपने शिबर से थोड़ा दूर बैठा गंगा माँ का निर्मल पानी की गुनगुनाहट सुन रहा था, जिसमे ऐसा लग रहा था संगीत की लय श्री गंगा धर का मधुर मय हो। गोदली हो रही थी... सूर्य जैसे गंगा जी और मंदिरो की प्रकरमा कर कोई अलग से कृपा बरसा रहा हो।
ये आज का दृश्य एक दम से जाग्रत था।
उसके खोज मे, मन की खोज मे लगा हुआ ढूंढ रहा था, वयकुल मन आँखे जिसमे पानी था उस महाराज शिव के प्रति.... कुछ मन से उखड़ रहा था। आँखे बंद तो नाम सिमरन स्वासो की माला से था। कोशिश वही... दुबारा से, अगर किसी चीज का ख्याल आ गया तो नाम कयो नहीं टिकता, बिखर कयो जाता है, कयो ऐसा होता है।
धीरे धीरे वो बढ़ रहा था... आगे को। अक्सर नाम टिकता कयो नहीं... कयो नहीं जुड़ता और कितनी मेहनत।
आभास हुआ अंदर खुद ही स्वर गुज रहा है। फिर दयाल उठा... अदर शिवर मे।
आवाज आयी ----" थक गए। " ये स्वर किर्पा का था।
"नहीं भगत जी। " किर्पा हस पड़ा। " कठिन है धीरे से आत्मा तक पहुंच गया तो फिर तुम जीत गए। " दयाल ने निम्न से सर हिला दिया.... "आत्मा परमात्मा " चुप एक लम्बी चुप। कुछ याद था। भूल गए। किर्पा ने आज हाथ से बनाये चूले मे लकड़ी पाथी गोबर की धुखाई... फिर धीरे धीरे आग पकड़ गयी। छोटा योगी नाम था हमारे टोली का सजन " कहने लगा आज तो हद होंगी। " हमने पूछा कया हुआ.... हमारे भेस मे डाकू भी है " ------ किर्पा बोला " कया हुआ " साथ मे गाये का दूध मे पती और खंड डाल रहा था। " प्रमोद का बजरंग दल का अखाडा है जो ---- उसमे पुलिस किसी को ढूंढ रही थी... कहा उन्हों ने सब आपनी असली एडनती हफ्ते तक न बनायीं तो शक के तहत उठा लेगे। " किर्पा हम सभी सहम गए। ये गंगा नगरी मे भी जुर्म पीछा नहीं छोड़े, पैसा गल घोटे गा, माया का जाल यही भी है। दियाल तो शिव शिव शिव करता बाहर निकल आया। किर्पा ने कहा"---- प्रधानचार्य से बात करेंगे कल!" दिन डूबता जा रहा था.... "आज खिचड़ी बनाये गे।" दियाल अंदर आया " शिव की नगरी मे भी हम साधु की कया एडनती " किर्पा ने कहा " इधर भी एक जुट का ही मसला है, नहीं तो सब की सेवा होंगी... फिर वो हस पड़ा। " अजय भगत जो अधूरा था काफ़ी... चर्चा मे... आख़िरी श्रद्धांजलि और वालो को भी कटवा नहीं पाया था, फिर तरवेणी संगम मे नहाना, फिर पितरों को जिदे जी मुक्ति की प्रार्थना... अभी किर्पा जी ही ने ही उन्हें रोका था। नाम की बदली फिर ही होनी थी। "पर इनकी इदनती कौन करेगा... सोचने वाली बात है " दियाल ने जरा सा मन को उलाना दिया। "आज खिचड़ी बनी " पके चूले पे। मैंने सोचा " पक्का तो यहां कुछ भी नहीं है, फिर भी चलो मिटी लेपन से अब धुया कम था। " सब के पतलो मे थोड़ी थोड़ी खिचड़ी थी... भगत ला देते थे सब कुछ, कुछ होते है जो जानते है ईश्वर के बच्चे।
( चलदा ) अगली किश्त के लिए।