पुलिस हेडक्वार्टर - एक गुप्त सुराग
इधर, संध्या सिंह और अभिमन्यु खुराना हार मानने वालों में से नहीं थे। संध्या ने अपनी पर्सनल इंटेलिजेंस टीम को एक्टिवेट कर दिया था। तभी अभिमन्यु एक फाइल लेकर अंदर आता है।
अभिमन्यु: "मैडम, एक अजीब बात पता चली है। बेगूसराय के जितने भी टोल प्लाजा हैं, वहां का पिछले दो घंटे का सीसीटीवी फुटेज अचानक 'करप्ट' (Corrupt) हो गया है। कोई है जो सिस्टम के अंदर बैठकर उसे डिलीट कर रहा है।"
संध्या सिंह: "यही तो सबूत है, अभिमन्यु! इसका मतलब है कि वो गाड़ियां अभी भी शहर के अंदर ही कहीं छुपी हैं। उन्हें बाहर निकलने के लिए सेफ पैसेज (Safe Passage) चाहिए।"
तभी संध्या को एक गुमनाम नंबर से मैसेज आता है: "पुरानी बर्फ फैक्ट्री, काली पहाड़ी के पीछे। सुबह होने से पहले।"
जद्दोजहद और साजिश
संध्या समझ जाती है कि यह या तो कोई जाल है या फिर किसी ऐसे मुखबिर की मदद जो दुर्रानी के साम्राज्य को गिरते देखना चाहता है। लेकिन उसके पास समय बहुत कम है।
संध्या: "अभिमन्यु, कोई फोर्स नहीं, कोई सायरन नहीं। हम सिविल ड्रेस में जाएंगे। अगर मंत्री या किसी और को कानो-कान खबर हुई, तो वो उन लड़कियों को मार देंगे।"
उधर, जितेंद्र परमार अपने ऑफिस में बैठा एक गुप्त फोन कॉल पर बात कर रहा था। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। वह जेके दुर्रानी का वो मोहरा था जिसे समाज 'सच का सिपाही' समझता था।
काली पहाड़ी का सन्नाटा
सुबह की पहली किरण अभी फूटने ही वाली थी। कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। संध्या और अभिमन्यु अपनी प्राइवेट गाड़ी से 'पुरानी बर्फ फैक्ट्री' पहुँचते हैं। चारों तरफ सन्नाटा था, सिर्फ दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
जैसे ही संध्या फैक्ट्री के लोहे के भारी दरवाज़े को धक्का देकर अंदर घुसती है, उसकी रूह कांप जाती है। अंदर का नज़ारा भयानक था। वहाँ लड़कियों की टूटी हुई चूड़ियां, खून से सने कपड़े और बिखरी हुई किताबें पड़ी थीं, लेकिन एक भी लड़की वहाँ नहीं थी।
संध्या का दिल बैठ गया। उसने दीवार पर देखा, जहाँ कोयले से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— "बहुत देर कर दी मैडम!"
वह रहस्यमयी फोन कॉल
तभी सन्नाटे को चीरते हुए संध्या का फोन बजता है। यह वही गुमनाम नंबर था। जैसे ही संध्या फोन उठाती है, दूसरी तरफ से एक रोंगटे खड़े कर देने वाली हंसी सुनाई देती है।
अज्ञात आवाज़: "हाहाहाहा! क्यों संध्या जी, कैसा लगा मेरा छोटा सा मज़ाक? पुलिस की फुर्ती के बड़े चर्चे सुने थे, पर आप तो मेरे परछाईं को भी नहीं छू पाईं।"
संध्या: (गुस्से में चिल्लाते हुए) "कौन हो तुम? कहाँ हैं वो लड़कियां? अगर उन्हें एक खरोंच भी आई तो मैं तुम्हें पाताल से भी ढूँढ निकालूँगी!"
अज्ञात आवाज़: "पाताल तो बहुत नीची जगह है मैडम, मैं तो आपके सिर के ऊपर आसमान में बैठा हूँ। वो लड़कियां तो अब शहर की सीमा पार कर चुकी हैं। लेकिन आपके लिए एक 'उपहार' छोड़ रहा हूँ।"
आवाज़ थोड़ी गंभीर और भारी हो जाती है:
"आज सुबह होने तक आपके शहर के हाई-प्रोफाइल इलाकों से कुछ और लड़कियां गायब होने वाली हैं। इस बार वो गरीब नहीं, बल्कि रसूखदार घरों की होंगी। अगर दम है तो बचा लो उन्हें। टिक-टिक शुरू हो चुकी है संध्या जी!" फोन कट जाता है।
खौफ की नई लहर
संध्या फोन कान से हटाती है, उसके हाथ कांप रहे थे। यह जेके दुर्रानी की चाल थी। वह न केवल लड़कियों का व्यापार कर रहा था, बल्कि वह पुलिस की वर्दी का मज़ाक उड़ा रहा था।
अभिमन्यु: "मैडम, ये क्या कह रहा था? हाई-प्रोफाइल लड़कियां? अगर बड़े घरों की लड़कियों को कुछ हुआ, तो सरकार हमें कच्चा चबा जाएगी।"
संध्या सिंह: "यही तो उसका प्लान है, अभिमन्यु! वह शहर में अराजकता (Chaos) फैलाना चाहता है। वह चाहता है कि जनता पुलिस पर थूके। हमें फौरन शहर के पॉश इलाकों— 'सिविल लाइन्स' और 'गोल्फ व्यू' में नाकाबंदी बढ़ानी होगी।"
शहर में नया हड़कंप
अभी सुबह के 7 भी नहीं बजे थे कि बेगूसराय के एक बड़े उद्योगपति की बेटी के अपहरण की खबर फ्लैश होने लगती है। जितेंद्र परमार अपने स्टूडियो में तैयार बैठा था।
जितेंद्र परमार: "ब्रेकिंग न्यूज़! पुलिस की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत! अब गरीब ही नहीं, रईस भी सुरक्षित नहीं हैं। क्या बेगूसराय में मार्शल लॉ लगा देना चाहिए? कहाँ हैं हमारी बेखौफ IPS संध्या सिंह?"
हाई-प्रोफाइल किडनैपिंग का धमाका
बेगूसराय का पॉश इलाका 'गोल्डन हाइट्स'। शहर के सबसे बड़े एक्सपोर्ट कारोबारी अजय कौशल के घर के बाहर सन्नाटा था, लेकिन अंदर कोहराम मचा था। उनकी इकलौती बेटी साक्षी कौशल, जो अपनी सहेली की बर्थडे पार्टी से लौट रही थी, अपनी मर्सिडीज कार के साथ गायब थी। ड्राइवर बेहोश सड़क किनारे मिला।
अजय कौशल मुख्यमंत्री के करीबी थे। आधे घंटे के अंदर पूरा पुलिस महकमा उनके ड्राइंग रूम में खड़ा था।
अजय कौशल: (संध्या की वर्दी पकड़कर चीखते हुए) "मेरी बेटी कहाँ है? करोड़ों का टैक्स देता हूँ मैं इस सरकार को! अगर साक्षी को कुछ हुआ, तो संध्या सिंह, मैं तुम्हारी वर्दी उतरवा दूँगा!"
संध्या सिंह: "शांत हो जाइए मिस्टर कौशल। हम अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं।"
संध्या बाहर आती है और अभिमन्यु से कहती है— "अभिमन्यु, अब खेल बदल गया है। ये गरीब लड़कियों वाला केस नहीं रहा। अब ये लोग बड़े घरों को निशाना बना रहे हैं ताकि पुलिस और सरकार पर इतना दबाव आ जाए कि हम मुख्य जांच से भटक जाएं।"
सरहद पर मौत का कंटेनर
इधर, बेगूसराय से सैकड़ों किलोमीटर दूर, उत्तर प्रदेश और नेपाल की सीमा (Border) पर एक बड़ा मालवाहक कंटेनर रुका हुआ था। उस पर 'मशीनरी' का लेबल लगा था, लेकिन अंदर का सच दिल दहला देने वाला था।
कंटेनर के अंदर एक छोटा सा गुप्त दरवाजा था। वहां अंधेरे और दमघोंटू गर्मी में वे 13 लड़कियां और औरतें भूखी-प्यासी पड़ी थीं। उनके हाथ-पैर बंधे थे और मुँह पर काली पट्टी थी।
नेपाल सीमा पर दहशत
नेपाल बॉर्डर पर पुलिस की मुस्तैदी और SSB के जवानों की सघन चेकिंग (Strict Checking) देखकर कंटेनर के ड्राइवर के माथे पर पसीना आ गया। सामने हर एक गाड़ी के टायर तक चेक किए जा रहे थे।
ड्राइवर ने तुरंत पीछे बैठे उस नकाबपोश को इशारा किया। नकाबपोश ने बिना देर किए एक गुप्त नंबर डायल किया।
नकाबपोश: "बॉस, बॉर्डर पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता। पुलिस ने जाल बिछा दिया है। अगर हम आगे बढ़े तो पकड़े जाएंगे। क्या करें?"
दूसरी तरफ से एक ऐसी आवाज़ आई जो शांत थी, लेकिन उसमें जहर घुला था। यह आवाज़ उस रसूखदार व्यक्ति की थी जिसने जेके दुर्रानी के साथ मिलकर यह खेल रचा था।
रसूखदार व्यक्ति: "घबराओ मत। कंटेनर को तुरंत पीछे घुमाओ और 'काली हवेली' की तरफ ले जाओ। वहाँ का रास्ता नक्शे में नहीं है। वहाँ पुलिस तो क्या, उनकी परछाईं भी नहीं पहुँच सकती। कुछ दिन वहीं रुको।"
वह व्यक्ति थोड़ा रुककर, नफरत भरी आवाज़ में आगे बोला:
"और सुनो... उस आदमी से कहो जिसने साक्षी कौशल को पकड़ा है—उस लड़की को संभाल कर रखे। मुझे उसका बाप अजय कौशल नहीं, बल्कि खुद साक्षी चाहिए। उसने कॉलेज के फंक्शन में सबके सामने मेरे बेटे को थप्पड़ मारा था और उसका अपमान किया था। आज मेरा बेटा उस अपमान का बदला लेगा। वह लड़की अब कोई 'माल' नहीं है, वह मेरे बेटे का खिलौना है।"