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चारू हॉल मे अमर के सामने बैठी पढ रही थी। वही अमर कॉफी पीते हुए उसे घूर रहा था। चारू अमर की नजरे महसूस कर खुद मे सिकुड़ती जा रही थी। उसने किताब के पीछे से अमर के देखा और आंखे गोल घुमा दी।
" ये मुझे ऐसे क्यो देख रहे है जैसे मै इनकी बेटी भगा के ले गई हूं। वैसे इनकी बेटी मतलब मेरी भी बेटी। तो मै अगर अपनी बेटी को ही भगा के ले जाउं तो क्या ही दिक्कत है। दोनो मां बेटी गोलगप्पे खाएंगे। लेकिन अगर बेटा हो गया तो ? क्या वो भी सर जैसे खडुस होगा! "
चारू अपनी सोच मे इतना खो गई थी की उसे पता ही नही चला कब छोटा सा राघव घुटनो पर चलते हुए उसके पैरो के पास आ गया था ।
राघव जमीन पर बैठ , सर ऊपर उठा गंभीरता से इस नए इंसान को देख रहा था। उसे इस लडकी से अपनी मां की ही खुश्बू आ रही थी।
राघव आगे बडा और चारू की जिंस अपनी मुट्ठी मे कस खींचने लगा।
अपनी सोच मे गुम चारू को एहसास हुआ की कुछ..खींच रहा है। उसने सर झुकाया ।
नन्हा राघव उसके पैर पकड कर बैठा..उसे टुकुर टुकुर दुख रहा था।
चारू ने जैसे ही उसे देखा , राघव मुस्कुरा दिया। चारू को लगा मानो उहका दिल भर आया हो। उसने किताब साइड कल राघव.को गोद मे ले लिया।
राघव जैसे ही चकरू की गोद मे आया , उसने अपने हाथो से चारू के गाल पर मारना शुरू कर दिया। चारू हँस दी। वो राघव के हाथो से बचने की कोशिश करने लगी।
बच्चा भी खेल मे मशगूल होकर खेलने लगा। बीच बीच मे राघव हँस देता तो चारू उसे गुदगुदी करना शुरू कर देती।
" आप राघव हो! ओ..मेरी अन्वी दी का बेबी । कितना प्यारा है। "
चारू प्यार से बोली।
" और आप पढाई से बचने वाली । " , अमर की आवाज आई जो ये सब हाथ बांधे देख रहा था। हांलाकि उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी मगर वो ये चारू को थोडी दिखा सकता था।
चारू ने अमर को खुनी निगाह से देखा। तो अमर ने कंधे इचका दिए।
" हम कॉलेज टॉपर है। आप कैसी कह सकते है कि हम पढते नही? ", चारू अप्रसन्नता से बोली।
" तुम्हारी शक्ल देख के लगता तो नही ! ",
चारू का मुंह खुल गया । वो अमर को ब्लैंक होकर देखने लगी।
चारू के हैरत मु पडी चेहरे के देख अमर हँस पडा ।
उसकी हस्सी.सुन मानो चारू का समय ही रूक गया हो। उसने अपनी निगाहे राघव पर टिका ली जो अब उसके कडे से खेल रहा था।
क्या कोई आवाज इतनी मधुर हो सकती है की राग सी महसूस हो । मानो स्वंय सितार की धुन ! उनकी हँसी हमारे कानो मे किसी धुन की तरह गूंज रही थी। हमारा दिल मदमस्त होने लगा है। जी चाहता है कि इस संगीत पर नाचने लगू !
नाचू किसी जोगन जैसे,
मोहे प्रीत का रोग लगा रे !
इस एक ख्याल के साथ बाकि का समय भी बीत गया। चारू ने सामान पैक किया और जाने लगी। अमर दरवाजा बंद करने के लिए उसके पीछे आया ।
जब वो जा रही थी तो अमर ने आवाज लगा रोक लिया उसे। और चारू थम गई मानो जैसे गोपी थम जाती है सांवरे की बोली पे।
वो अमर की तरफ पलट गई।
" कल से एक नोटबुक लेकर आना । तुम्हारे बेसिक से स्टार्ट करेंगे। और होमवर्क दुंगा मे। तो गंभीरता से पढो। आखरी सेमेस्टर है तुम्हारा। " ,अमर चारू को समझाते हुए बोला ।
हां मे सर हिला चारू चली गई।
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रात का समय
राजवंशी महल
नैना बगीचे मे कान मे ईयर फोन लगाए घूम रही थी। उहका मन कुछ ठीक नही था। सर दर्द कर रहा था। वो कुछ परेशान सी इधर उधर चक्कर काट रही थी।
तभी एक स्त्री उसके बगल मे चलने लगी । नैना चौंक गई। उसने अपनी बगल मे देखा तो एक महिला खडी थी। नैना इन्हे जानती थी। ये अमोघ की मां और मेघराज की महारानी
अमृत राजवंशी। नैना ने अपना सर झुका लिया ।
अमृत जी ने भंवे उठा दी। फिर नैना के सर पर चपत लगा उसका चेहरा ऊपर किया।
" हमारे आगे सर ना झुकाया करो। " , वो प्यार से बोली।
" आप महारानी है । ", नैना ने शांती से कहा।
" तो क्या हुआ! " , रानी अमृत बोली।
नैना ने पलके उठाकर उन्हे देखा तो वो मुस्कुरा दी। उन्होने नैना के कान से ईयर फोन निकाले और उसका सर सहला दिया।
" मेरा अमोघ प्रेम करता है आपसे । जानती है आप नैना ? ", अमृत जी ने सवाल किया।
नैना ने बस हां मे सर हिला दिया।
अमृत जी ने आगे सवाल किया , " आप करती है ? "
नैना चुप!
उसकी चुप्पी पर अमृत जी मुस्कुरा दी। उन्होने नैना का सर सहला दिया।
" एक महीना हो गया है तुम्हे यहां । और मैने तुम्हे अपनी बच्ची ही माना है। मां समझ कल दिल की बात बताओ मुझे । "
अमृत जी की बात सुनकर नैना का गला भर आया। उसने थूक निगला और गहरी सांस भर पलके झपका दी।
" करती हूं...बहुत ज्यादा ! "
" तो कहती क्यो नही ? ", अमृत जी चलते हुए बोली।
" नही कह सकती। "
" क्यो ? "
" आप जानती है। मेरी हेल्थ जैसी है उसमे कुछ पता नही कि आगे क्या हो जाए। ऐसे मे कैसे मै अमोघ की लाईफ अपने साथ खराब कर दूं । "
नैनी की आंखे भर आई थी। वो जानती थी कि उसकी बिमारी जल्दी ठीक होने वाली नही है। ऐसे मे वो अमोघ की जिंदगी मे संर्घष नही लिख सकती थी।
अमृत जी रूक कर नैना की तरफ पलट गई। वो कुछ बोलती की उनकी नजर हाथ बांधे नैना के पीछे खडे अमोघ पर पडी । वो मुस्कुरा दी।
नैना ने असमंजस मे उन्हे देखा।
" तुम्हारी बात का जवाब देने वाला तुम्हारे पीछे खडा है। मै बस इतना कहुंगी..की यर्थाथ मे जियो ! हर पल बित रहा है। और हर पल एक नया पल आ रहा है। हर आनेवाला पल जाने के लिए ही आया है तो भविष्य की इतनी चिंता मत करो । एक दिन सबको ही बीत जाना है। चले जाना है। बाकी..अमोघ तो है ही सब समझाने के लिए। "
कहकर अमृत जी चली गई। उनके जाते ही अमोघ नु नैना की कमर मे हाथ डाल उसे अपनी तरफ खींच लिया।
नैना की सांसे अटक गई।
क्रमशः