Teri Meri Khamoshiyan - 14 in Hindi Love Stories by Mystic Quill books and stories PDF | तेरी मेरी खामोशियां। - 14

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तेरी मेरी खामोशियां। - 14

हॉल के उस तनावपूर्ण माहौल के बाद रात धीरे-धीरे सुल्तान मेंशन पर हावी हो रही थी। दरगाह की थकान और निखार के तंज की कड़वाहट लिए नायरा अपने कमरे में आई। यह कमरा अब उसका भी था, मगर यहाँ की हर चीज़ में अमन की शख्सियत की तरह एक अजीब सी ठंडी खामोशी थी।

नायरा ने आईने के सामने खड़े होकर अपने गुलाबी सूट का दुपट्टा उतारा। आईने में उसने अपनी आँखें देखीं, उनमें आँसू नहीं, बल्कि एक अजीब सा संकल्प था। दादी से किया वादा उसकी रूह में उतर चुका था।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। अमन अंदर आया।
उसने अपनी शेरवानी के बटन खोलते हुए नायरा की तरफ एक सरसरी नज़र डाली, और सीधे अलमारी की तरफ बढ़ गया। पूरे रास्ते गाड़ी में और अब कमरे में भी, उसका यह अजनबीपन नायरा को चुभ रहा था, मगर उसने हौसला नहीं हारा।

"आप... आप कुछ खाएंगे? मैं नीचे से दूध या चाय ला दूँ?" नायरा ने अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना सहज रखते हुए पूछा।

अमन के हाथ अलमारी के हैंडल पर ठहर गए। उसने बिना मुड़े, ठंडे लहजे में कहा, "मैंने हॉल में कहा था ना, मुझे किसी की परवाह या खिदमत की आदत नहीं है। अपनी ये हमदर्दी मेरे लिए बचाकर मत रखो।"

नायरा ने एक गहरी सांस ली और दो कदम आगे बढ़ी, "यह हमदर्दी नहीं है, अमन जी। आप मेरे शौहर हैं, और इतनी सी फिक्र करना मेरा हक है।"

'हक' शब्द सुनते ही अमन तेजी से पलटा। उसकी आँखों में वही पुरानी कड़वाहट और गुस्सा तैर आया। वह नायरा के बेहद करीब आया, इतना करीब कि नायरा को उसकी गरम सांसें महसूस हो रही थीं।

"हक?" अमन ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, "निकाह के कागज पर दस्तखत करने से हक नहीं मिल जाता, नायरा। इस कमरे में तुम्हें हर ऐश-ओ-आराम मिलेगा, इस घर में तुम्हें पूरी इज्जत मिलेगी क्योंकि तुम दादी की पसंद हो। मगर मुझसे किसी जज्बात की उम्मीद मत रखना। मेरे दिल में किसी के लिए कोई जगह नहीं है, और बेहतर होगा तुम यह बात जितनी जल्दी समझ लो।"

नायरा की पलकें भीग गईं। उसे उस वक्त बस स्टॉप का वह मंजर याद आया जब उसने पहली बार इस शख्स को देखा था, तब वह नहीं जानती थी कि इस शांत चेहरे के पीछे इतना बड़ा तूफान छिपा है। उसने अपनी भीगी आँखों से सीधे अमन की आँखों में देखा और बिना डरे बोली:
"अल्लाह ने अगर इस पाक रिश्ते में हमें बांधा है, तो वो राह भी दिखाएगा। मुझे आपके दिल में जगह छीनकर नहीं चाहिए, अमन जी। मैं बस आपकी उस तकलीफ को कम करना चाहती हूँ जो आपको अंदर ही अंदर खाए जा रही है।"

अमन का चेहरा एक पल के लिए सख्त हुआ, जैसे नायरा की बातों ने उसके दिल के किसी पुराने जख्म को छू दिया हो। उसने अपनी नजरें चुराईं, अपने कपड़े उठाए और बिना कुछ कहे चेंज करने के लिए वॉशरूम में चला गया।

नायरा ने बेड के एक कोने में अपनी जगह बनाई। जब अमन बाहर आया, तो वह बिना कुछ बोले काउच पर तकिया रखकर लेट गया। कमरे की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, मगर दोनों की आँखों से नींद कोसों दूर थी। एक ही कमरे में दो अजनबी, अपनी-अपनी खामोशियों से जंग लड़ रहे थे।

दूसरी तरफ: रुकसाना बेगम का कमरा

रात के सन्नाटे में निखार अपने कमरे में गुस्से में पैर पटक रही थी। दादी की सबके सामने दी हुई डांट उसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी।

"अम्मी! आपने देखा दादी ने उस दो कौड़ी की लड़की के लिए मुझे सबके सामने डांटा? वह नायरा... वह अमन के इतने करीब कैसे आ सकती है!" निखार की आवाज में जलन साफ दिख रही थी।

रुकसाना बेगम ने कमरे का दरवाजा बंद करते हुए कहा, "धीमे बोलो, निखार! कोई सुन लेगा। और तुम इतनी उतावली क्यों हो रही हो? अमन का मिजाज जानती हो ना? वह किसी लड़की को अपने करीब नहीं आने देता। उस पहली लड़की का जो हाल तुमने किया था, वह भूल गई क्या?"

निखार के होठों पर एक शातिर और क्रूर मुस्कान उभर आई, "भूल कैसे सकती हूँ, अम्मी। उस आयशा (अमन की पहली गर्लफ्रेंड) के कान मैंने ऐसे भरे थे कि वह अमन को छोड़कर भाग गई। अमन आज तक समझता है कि आयशा ने उसे धोखा दिया। लेकिन अम्मी, यह नायरा अलग है। इसकी आँखों में अमन के लिए एक अलग ही जिद दिख रही है। मुझे इसे इस घर से और अमन की जिंदगी से निकालना ही होगा।"

रुकसाना ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा, "तो फिर गुस्से से नहीं, दिमाग से काम लो। कोई ऐसी चाल चलो कि नायरा खुद अमन की नजरों में गिर जाए और यह शादी टूट जाए।"

निखार की आँखों में एक जूनून था। उसने खिड़की से बाहर देखते हुए बुदबुदाया, "अमन सिर्फ मेरा है... और उसे पाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकती हूँ। नायरा, तुम्हारी उल्टी गिनती अब शुरू होती है।"