Dhokha - 1 in Hindi Mythological Stories by Rk writer books and stories PDF | धोखा - 1

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धोखा - 1

1999 था। गाँव वैशाली की मिट्टी में उस समय भी एक अजीब सी दहशत घुली हुई थी। लोग कहते थे कि यहाँ रात के 2:00 बजे के बाद कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकलता, क्योंकि उस वक्त गाँव की हवा अपना रंग बदल लेती है। वह हवा भारी हो जाती है, जैसे कोई मरा हुआ इंसान साँस ले रहा हो। पर सुनेखा को इन बातों पर कभी विश्वास नहीं था। वह बीस साल की थी, पर उसकी आँखों में चालीस बरस का दर्द बैठा हुआ था। उसकी माँ मर चुकी थी, उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी, और उसकी सौतेली माँ उसे किसी नौकरानी से भी बदतर समझती थी। बस किशन ही था जो उससे सच्चा प्यार करता था, या कम से कम सुनेखा को ऐसा ही लगता था।

किशन गाँव के किनारे रहता था। वह मजदूरी करता था, पर उसका दिल बहुत बड़ा था। वह सुनेखा को रोज एक फूल लाकर देता, चाहे मौसम कैसा भी हो। वह उससे कहता था कि वह उसे इस गाँव से दूर ले जाएगा, किसी ऐसे शहर में जहाँ कोई उन्हें न जानता हो, जहाँ वे नए सिरे से जीवन शुरू कर सकें। सुनेखा को यह बातें सुनकर बहुत अच्छा लगता था। वह किशन के सपनों में खो जाती थी, और उसे लगता था कि शायद उसकी ज़िंदगी में भी कुछ अच्छा हो सकता है। पर जीवन को शायद सुनेखा का सुख बर्दाश्त नहीं था।

एक महीने पहले, किशन की मौत हो गई थी। गाँव वालों ने बताया कि जंगल में साँप ने काट लिया। जब सुनेखा वहाँ पहुँची, तो किशन का शरीर ठंडा पड़ा था। उसके मुँह पर झाग था, और उसकी आँखें खुली हुई थीं, जैसे उसने कुछ देखा हो जो उसे मौत तक डराता रहा। सुनेखा ने उसकी आँखें बंद की थीं, और उसने उसकी चिता को आग लगाई थी। उस दिन उसके आँसू नहीं थे, क्योंकि उसका मन इतना सुन्न हो गया था कि दर्द भी नहीं महसूस हो रहा था। वह बस खड़ी रही, उसकी राख को देखती रही, और सोचती रही कि अब उसकी ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं बचा है।

पर किशन की मौत के बाद से गाँव में अजीब चीजें होने लगीं। पहले तो लोगों ने बताया कि उन्हें जंगल में किशन की आवाज़ सुनाई देती है। फिर किसी ने कहा कि उसने रात को किशन को नदी के किनारे बैठे देखा है। पर जब लोग वहाँ गए, तो कुछ नहीं मिला। सुनेखा ने इन बातों को अनसुना कर दिया, क्योंकि वह जानती थी कि मरने के बाद कोई वापस नहीं आता। पर उस रात, जब रात के 2:00 बजने को थे, सुनेखा को अपने दरवाजे के नीचे एक कागज़ मिला। वह कागज़ पुराना था, मानो दस साल पहले लिखा गया हो, पर उस पर लिखी बातें बिल्कुल ताज़ा थीं। उस पर लिखा था, "सुनेखा, मैं जानता हूँ कि तूने मुझसे झूठ बोला था। मैं जानता हूँ कि तू क्या करती है रात के 2:00 बजे। अब मैं भी आ रहा हूँ।"

यह कागज़ पढ़कर सुनेखा के होश उड़ गए। उसने चारों तरफ देखा, पर कोई नहीं था। उसने दरवाज़ा खोला, तो बाहर कोहरा था, इतना घना कि दो कदम दूर कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उसने आँगन में देखा तो उसे एक जूता पड़ा मिला। वह जूता किशन का था, क्योंकि उसके तले पर एक खरोंच थी जो किशन ने एक बार कील पर चलते हुए बनाई थी। सुनेखा ने वह जूता उठाया और उसे जोर से दूर फेंक दिया। पर जब वह वापस कमरे में आई, तो वह जूता उसके बिस्तर के पास रखा हुआ था। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था, और उसके हाथ ठंडे पड़ गए थे।

वह खिड़की के पास गई और उसने नीचे झाँका। कोहरे के बीच उसे एक परछाई दिखी, जो किशन जैसी ही थी। वह परछाई हिल नहीं रही थी, बस खड़ी थी, और ऊपर सुनेखा की तरफ देख रही थी। सुनेखा ने आवाज़ लगाई, "किशन, क्या तू है?" पर कोई जवाब नहीं आया। वह परछाई धीरे-धीरे आगे बढ़ी, और सुनेखा ने देखा कि उसके पैर नहीं थे, वह हवा में तैर रही थी। सुनेखा ने खिड़की बंद कर दी, पर उसे बंद करते ही पीछे से एक आवाज़ आई, "सुनेखा, मैं तुझसे प्यार करता हूँ, पर तूने मुझे धोखा दिया।" वह आवाज़ किशन की थी, पर उसमें कोई गर्माहट नहीं थी, बल्कि एक कड़वाहट थी, जैसे कोई सालों तक जहर पीता रहा हो।

सुनेखा ने मुड़कर देखा तो कमरे में कोई नहीं था, पर उसके शीशे में एक चेहरा दिखा। वह चेहरा उसका था, पर उसमें उसकी आँखों के बदले काली खाली जगहें थीं। शीशे का वह चेहरा मुस्कुरा रहा था, और उसके मुँह से खून बह रहा था। सुनेखा ने चीख मारी और शीशा तोड़ दिया। शीशे के टुकड़े बिखर गए, पर हर टुकड़े में वही चेहरा था, और सभी चेहरे उसे घूर रहे थे। वह सब उसका वहम नहीं था, यह बहुत सच्चा था। उसने कमरे से बाहर भागने की कोशिश की, पर दरवाज़ा बंद था, और ताला बाहर से लगा हुआ था।

तभी उसके पीछे से फिर वही आवाज़ आई, "तू कहाँ भागेगी, सुनेखा? यह तेरा घर है, और मैं तेरा हूँ।" सुनेखा ने पीछे मुड़कर देखा तो कमरे के कोने में एक काली सी गुड़िया पड़ी थी। वह गुड़िया उसकी नहीं थी, और वह वहाँ पहले कभी नहीं थी। उस गुड़िया के मुँह पर सिलाई की हुई थी, जैसे कोई उसका मुँह सीना चाहता हो। सुनेखा ने उस गुड़िया को उठाना चाहा, पर जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, गुड़िया का सिर घूम गया, और उसकी बिना आँखों वाली जगह से एक अजीब सी रोशनी निकली। वह रोशनी धीरे-धीरे बढ़ी और उसने सुनेखा को घेर लिया।

सुनेखा ने महसूस किया कि उसके पैर ज़मीन से ऊपर उठ रहे हैं। उसका शरीर हवा में तैर रहा था, और वह हिल भी नहीं सकती थी। उसने अपनी जान बचाने के लिए प्रार्थना की, पर उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। वह गुड़िया अब उसके बिल्कुल सामने थी, और उसके सीए हुए मुँह से एक फुसफुसाहट निकली, "धोखा, सुनेखा, तुझे धोखा मिला है।" सुनेखा ने अपनी पूरी ताकत लगाई और वह गुड़िया को दूर फेंकने में सफल हुई। गुड़िया दीवार से टकराई और टूट गई, पर टूटते ही उसमें से एक कागज़ निकला। वह कागज़ कोई साधारण कागज़ नहीं था, बल्कि उस पर किशन की लिखावट में एक बात लिखी थी, "तू जानती है कि मैं क्यों मरा?"

सुनेखा उस कागज़ को पढ़ते ही ज़मीन पर बैठ गई। उसके दिमाग में एक बात घूम गई। क्या किशन को उसने धोखा दिया था? क्या उसकी मौत के पीछे सुनेखा का कोई हाथ था? उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। उसका दिमाग साफ़ नहीं था, जैसे कोई उसकी यादें मिटा रहा हो। अचानक उसे एक बात याद आई — किशन की मौत से एक रात पहले, उसने किशन को जंगल में बुलाया था, और उसे कुछ बताना चाहती थी, पर उस रात उसे क्या बताना था, यह उसे याद नहीं है। उसके दिमाग में बस एक छवि है — वह खुद, एक चाकू लिए हुए, और किशन उसके सामने घुटनों पर है।

सुनेखा ने अपना सिर पीटा, पर उसे और कुछ याद नहीं आया। वह उस रात की बात भूल चुकी थी, या शायद उसे भुला दिया गया था। पर अब वह सोचने लगी कि जो कुछ हो रहा है, वह किशन की आत्मा नहीं है, बल्कि उसका अपना अपराधबोध है। पर जब उसने फिर से नीचे झाँका, तो उसने देखा कि आँगन में किशन खड़ा है। उसके हाथ में वही चाकू है, जो उसके सपने में था। किशन ने ऊपर देखा, और वह मुस्कुराया — पर उसकी मुस्कान में दर्द था, और उसकी आँखों में आँसू थे। उसने कहा, "सुनेखा, तूने मुझे क्यों मारा?" यह कहकर वह गायब हो गया, और सुनेखा के कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं। सुनेखा अंधेरे में अकेली थी, और उसके हाथ में वह चिट्ठी थी जिस पर लिखा था, "अगला धोखा तुझे मिलेगा, जब तू सोचेगी कि तू सुरक्षित है।"

यह सिर्फ शुरुआत थी, असली धोखा तो अभी आना बाकी था, और वह धोखा सुनेखा का इंतज़ार कर रहा था। उसे कुछ और याद नहीं था, पर उसे यह जरूर पता था कि रात के 2:00 बजने को हैं, और जो आया है वो वापस जाएगा नहीं। सुनेखा ने उस चिट्ठी को अपने दिल से लगा लिया, और फूट-फूट कर रोने लगी, क्योंकि उसे लगा कि शायद वही सबसे बड़ी खलनायिका है, जो अपनी कहानी से अनजान है।

भाग 1 समाप्त

अब क्या होगा, आगे इस कहानी में ये जानने के लिए, आपको मेरी  कहानी पढ़नी पड़ेगी जिसका नाम है , धोखा।
‎To be Continued ,
‎Thanks for the Reading .
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