यह एक पूर्णतः काल्पनिक (Fictional) कहानी है। इस कहानी के सभी पात्र, घटनाएँ, स्थान (जहाँ विशेष रूप से वास्तविक स्थान का केवल पृष्ठभूमि के रूप में उल्लेख न हो), संवाद और प्रसंग लेखक की कल्पना पर आधारित हैं।
इस कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन और एक काल्पनिक प्रेम कथा प्रस्तुत करना है। किसी भी धर्म, जाति, समुदाय, संस्कृति, परंपरा या व्यक्ति का समर्थन, विरोध, अपमान, आलोचना या भावनाएँ आहत करना हमारा उद्देश्य नहीं है।
यदि इस कहानी का कोई पात्र, घटना या परिस्थिति किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या घटना से मिलती-जुलती प्रतीत होती है, तो उसे केवल संयोग माना जाए।
कृपया इस कहानी को केवल एक काल्पनिक रचना के रूप में पढ़ें।
एपिसोड 1: लखनऊ का शेर – अर्जुन वशिष्ठ
उत्तर प्रदेश...
भारत का वह राज्य जहाँ राजनीति, संस्कृति, तहज़ीब और परंपराएँ हर गली में साँस लेती हैं। और जब बात उत्तर प्रदेश की हो, तो Lucknow का नाम सबसे पहले ज़ुबान पर आता है।
नवाबों का शहर...
इमामबाड़ों की शान...
अदब और तहज़ीब की पहचान...
लेकिन इस शहर का एक और चेहरा भी था—सत्ता, प्रभाव और रसूख का चेहरा।
लखनऊ में कई बड़े राजनीतिक परिवार थे, कई बड़े कारोबारी थे, लेकिन अगर धर्म, संस्कार और राजनीति की बात एक साथ होती, तो एक नाम सबसे पहले लिया जाता था...
वशिष्ठ परिवार।
यह सिर्फ़ एक परिवार नहीं था, बल्कि एक ऐसी प्रतिष्ठा थी जिसे पूरा उत्तर प्रदेश सम्मान देता था।
किसी बड़े मंदिर की स्थापना हो...
किसी मंत्री के घर यज्ञ हो...
किसी उद्योगपति के यहाँ विवाह संस्कार हो...
या किसी बड़े परिवार का उपनयन...
सबकी पहली पसंद वशिष्ठ परिवार ही होता था।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी उनका विशेष सम्मान था। चुनावों के समय बड़े-बड़े नेता उनके घर आशीर्वाद लेने आते थे। उनके पिता, पंडित हरिदत्त वशिष्ठ, अपने ज्ञान, विद्वता और धर्मशास्त्र की गहरी समझ के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध थे।
लोग कहते थे...
"जिस घर में पंडित हरिदत्त वशिष्ठ के चरण पड़ जाएँ, वहाँ शुभता अपने आप चली आती है।"
लेकिन उसी प्रतिष्ठित परिवार में एक ऐसा बेटा भी था...
जो अपने पिता की राह पर चलना ही नहीं चाहता था।
अर्जुन वशिष्ठ।
वशिष्ठ परिवार का सबसे छोटा बेटा।
तीन भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा...
और सबसे अलग।
जहाँ उसके दोनों बड़े भाई अपने पिता के साथ बड़े-बड़े मंदिरों में पूजा, यज्ञ, कथा, विवाह और अन्य धार्मिक संस्कार करवाते थे, वहीं अर्जुन को इन सबमें बिल्कुल भी रुचि नहीं थी।
पंडित हरिदत्त चाहते थे कि एक दिन अर्जुन भी उनके साथ बैठे, वेद-पुराण सीखे और आगे चलकर परिवार की परंपरा संभाले।
लेकिन अर्जुन का सपना कुछ और था।
वह डॉक्टर बनना चाहता था।
इस बात को लेकर पिता और बेटे के बीच अक्सर बहस होती रहती।
"ब्राह्मण का बेटा होकर डॉक्टर बनेगा?"
"हाँ... क्योंकि यह मेरा सपना है।"
बस...
यहीं से दोनों के रिश्तों में दूरी बढ़ती चली गई।
आख़िरकार, परिवार के समझाने पर पंडित हरिदत्त ने अनमने मन से अर्जुन को मेडिकल की पढ़ाई की अनुमति दे दी।
आज अर्जुन लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में एमबीबीएस के तीसरे वर्ष का छात्र था। King George's Medical University
उसकी पढ़ाई के दो साल पूरे हो चुके थे और दो साल अभी बाकी थे।
लेकिन...
अगर कोई यह सोचता कि अर्जुन सिर्फ़ किताबों में डूबा रहता होगा...
तो वह बहुत बड़ी गलती करता।
क्योंकि अर्जुन जितना अच्छा पढ़ाई में था...
उतना ही खतरनाक अपने गुस्से में भी था।
पूरे लखनऊ में शायद ही कोई ऐसा युवक हो जिसने अर्जुन वशिष्ठ का नाम न सुना हो।
गुंडे भी उसका नाम सुनकर दो बार सोचते थे।
लेकिन वजह यह नहीं थी कि अर्जुन अपराधी था...
बल्कि इसलिए कि वह अन्याय बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता था।
किसी लड़की को सड़क पर कोई परेशान करे...
किसी कमज़ोर पर चार लोग मिलकर हाथ उठाएँ...
किसी से ज़बरदस्ती वसूली की जाए...
तो सबसे पहले वहाँ पहुँचने वाला इंसान अर्जुन वशिष्ठ होता।
और फिर...
जिसने गलती की होती, उसे उसकी गलती की कीमत भी चुकानी पड़ती।
लखनऊ के कई लड़के कहते थे...
"पुलिस बाद में आती है... अर्जुन पहले पहुँच जाता है।"
हाँ...
उसका गुस्सा बहुत ख़तरनाक था।
वह लड़ाई से पीछे हटना नहीं जानता था।
उसकी जेब में अक्सर लाइसेंसी हथियार नहीं, बल्कि सिर्फ़ अपना हौसला और बेखौफ़ अंदाज़ होता था, लेकिन लोग उसके नाम से ही डर जाते थे।
अब अगर उसके व्यक्तित्व की बात करें...
तो वह किसी फ़िल्मी हीरो से कम नहीं था।
लगभग छह फ़ुट लंबा कद...
चौड़े कंधे...
मज़बूत शरीर...
हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी...
तेज़ और गहरी आँखें...
गले में रुद्राक्ष की माला...
दाहिने हाथ में लाल कलेवा...
और सीने के ऊपर तक खुले हुए शर्ट के बटन, जिन पर काले रंग की जैकेट उसके व्यक्तित्व को और दमदार बना देती थी।
उसे देखकर पहली नज़र में कोई भी यही कहता...
"यह लड़का गुंडा होगा..."
लेकिन जो उसे जानता था, वह कहता...
"नहीं... यह गुंडा नहीं, गुंडों का डर है।"
कॉलेज में उसकी एक अलग ही पहचान थी।
हर लड़की उसके साथ दोस्ती करना चाहती थी।
कई लड़कियाँ उसे प्रपोज़ कर चुकी थीं।
लेकिन अर्जुन...
उसे इन सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं था।
अगर कोई लड़की उसके पीछे ज़्यादा घूमती...
तो वह उससे दूरी बना लेता।
उसे प्यार, इश्क़ और रिश्तों में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
उसकी दुनिया बस तीन चीज़ों तक सीमित थी...
उसके दोस्त...
उसकी मेडिकल की पढ़ाई...
और अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होना।
उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था...
कि बहुत जल्द उसकी ज़िंदगी में एक ऐसी लड़की आने वाली है...
जो उसकी पूरी दुनिया बदल देगी।
एक ऐसी लड़की...
जो उससे बिल्कुल अलग थी।
एक अलग धर्म...
अलग परवरिश...
अलग दुनिया...
और शायद...
उसी का नाम आगे चलकर अर्जुन की सबसे बड़ी ताक़त भी बनने वाला था...
और सबसे बड़ी परीक्षा भी...