Antarnihit 51 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 51

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अन्तर्निहित - 51

 [51]

पुलिस कार्यालय में नदीम के स्थान पर श्रीधर को स्थानांतरित किया गया था। उसने त्वरित कार्यभार संभाल लिया। उसके कक्ष में शैल और सारा उपस्थित हो गए। 

“शैल, तुम्हारे पर लगे सभी अभियोगों से तुम्हें मुक्त कर दिया गया है। तुम्हें सेवा में पुन: स्थापित किया जा रहा है। अभिनंदन। यह है उस आदेश का पत्र। इसे ग्रहण करो।” श्रीधर ने एक पत्र शैल को दिया। 

“धन्यवाद महाशय।” शैल ने पत्र ले लिया। 

“सारा जी आप भी इस कार्य के भार से मुक्त हो। आप को सात दिनों में अपने देश पाकिस्तान लौटना होगा। लीजिए यह पत्र।” श्रीधर से सारा ने चिंतित मन से उसे ग्रहण किया। प्रयत्न पूर्वक किए गए स्मित के साथ उत्तर दिया। शैल ने उस स्मित के अर्थ को पढ़ लिया और मन ही मन विचारता रहा ‘मैं क्या कर सकता हूँ? कैसे सारा जी को भारत में रोक सकता हूँ?’

इसी विचार में शैल ने श्रीधर का कक्ष छोड़ दिया, सारा ने भी। 

“शैल, क्या मैं कुछ समय के लिए तुम्हारे कक्ष में आ सकती हूँ?” अपने कक्ष में जाते शैल को सारा ने अनुनय किया। 

“जी, जी। अवश्य। आइए। मैं भी आपको यही कहने वाला था।”

शैल के कक्ष में सारा ने भी प्रवेश किया। 

“बैठिए सारा जी। एक लंबे अंतराल के पश्चात हम पुन: इस कक्ष में हैं। आप क्या लेंगी? विजेंदर को ...।”

“शैल तुम बैठो। मुझे इस समय कुछ नहीं चाहिए।”

“आपके शब्दों में विषाद है। मैं जानता हूँ। किन्तु मैं क्या कर सकता हूँ?”

“मेरा विषाद अधिक गहरा होकर तुम्हारे मन को प्रभावित कर रहा है ऐसा तुम्हारे मुख के भावों से स्पष्ट प्रतीत होता है। मुझ से अधिक तुम मेरे लिए चिंतित हो यह मैं जानती हूँ।”

“जी, मैं तो ...।”

“यही अंतर है भारत के पुरुषों में और पाकिस्तान के पुरुषों में।” सारा के शब्दों में वही परिचित पीड़ा प्रकट हो गई। 

“मैं जानता हूँ कि आप पुन: पाकिस्तान लौटना नहीं चाहती। मैं भी इसी विषय पर विचारग्रस्त हूँ। कोई उपाय नहीं सूझ रहा है। आप चिंता ना करें। हमारे पास अभी सात दिनों का समय है। तब तक कुछ न कुछ उपाय ..।”

“धन्यवाद तुम्हारा, शैल। इन शब्दों से मुझे आश्वस्त करने की तुम्हारी चेष्टा की मैं प्रशंसा करती हूँ। सात दिन तो अभी व्यतीत हो जाएंगे। इन दिनों में तुम अपने कार्यों में व्यस्त हो जाओगे।”

“समय बड़ा विचित्र है, सारा जी। कब कैसा रंग धारण कर ले, कोई नहीं जानता। हम समय पर सब कुछ छोड़ देते हैं।” 

सारा मौन रही। कुछ क्षण पश्चात विजेंदर ने प्रवेश करते हुए कहा, “महाशय, आज के दिन आप मुक्त हो। कल से अनेक काम करने हैं। मैं सारी फ़ाइलें कल लाकर दे दूंगा।” वह चला गया।

“आज तो मैं मुक्त हूँ। तो कहीं बाहर चलते हैं कुछ सोचते हैं।”

दोनों ने कक्ष छोड़ दिया। जहां से दूर पहाड़ियाँ दिख रही थीं ऐसे एक स्थान पर रुकते हुए सारा ने कहा,

“शैल, यहाँ बैठते हैं।” शैल बैठ गया, सारा भी। 

“वैसे तो मीरा कांड बंद कर दिया गया है किन्तु उसकी मृत्यु का अनसुलझा रहस्य मुझे विचलित कर रहा है। क्या आपको भी ऐसा होता है?”

“शैल, इस संसार में असंख्य अनसुलझे रहस्य हैं। एक और सही।”

“सत्य है। किन्तु यह मीरा हत्या कांड भिन्न है।”

“वह कैसे?”

“इस संसार के जीतने भी अनसुलझे रहस्य हैं उन सभी से हमारा सीधा सीधा कोई संबंध नहीं है। मीरा के रहस्य से हमारा सीधा संबंध है। यदि इस कांड से मैं जुड़ा नहीं होता तो मुझे भी कोई अंतर नहीं पड़ता। यह जुड़ना ही मुझे विचलित कर रहा है। मेरा मन मुझे कह रहा है कि तुम इस रहस्य को सुलझा सकते हो। तुम इसके तल तक जा सकते हो। बस केवल प्रयास करना है। ऐसा क्यों हो रहा है यह मैं नहीं जानता। मुझे कोई मार्ग नहीं सुझ रहा है। मुझे अब क्या करना चाहिए?” शैल ने गहन सांस ली। 

“आपको कोई मार्ग दिख रहा है क्या?”

कुछ क्षण विचार के पश्चात सारा बोली, “मेरे दादाजी कहते थे कि जीवन में जब कोई मार्ग न सूझे तब या तो प्रकृति पास चले जाना …।”

“प्रकृति के पास ही हैं हम तथापि मार्ग क्यों नहीं सूझ रहा?”

“तुम भी पूरी बात सुनने का धैर्य खो चुके हो, शैल।” शैल ने सारा की बात पर स्मित दिया। 

“या तो प्रकृति के पास जाना चाहिए या किसी गुरु के पास चले जाना चाहिए। कोई न कोई मार्ग दिखाने में गुरु समर्थ होते हैं।”

“गुरु?” सहसा शैल खड़ा हो गया। 

“हाँ, गुरु। किन्तु तुम सहसा खड़े क्यों हो गए? क्या बात है?”

“सारा जी, मार्ग तो हमारे समक्ष ही है और हम कहीं अन्यत्र उलझ रहे हैं।”

“कैसा मार्ग, शैल?”

“आपको स्मरण होगा कि हम मीरा कांड के मूल घटना स्थल हेतु नदी के प्रवाह के साथ साथ जा रहे थे तब एक रात्रि हम एक आश्रम में रुके थे। जहां हमें एक गुरु जी मिले थे।”

“जो हमारे लाहोर वाले गुरु के शिष्य थे वही न?”

“हाँ, वही। वहाँ जाते हैं, उन्हें मिलते हैं। हमारा प्रश्न, हमारी बात उनके सम्मुख रखते हैं। वे हमारा अवश्य मार्गदर्शन करेंगे।” 

“वाह शैल। यही उचित मार्ग है। कब चलना है? कल चलें?”

“कल क्यों? आज ही, अपितु इसी समय चलते हैं। मैं वाहन की व्यवस्था करता हूँ।”

“चलो।” सारा उत्साह से उठी। शैल के पग ने भी नवीन ऊर्जा को पा लिया था।