Kighakanya - 3 in Hindi Mythological Stories by Shree Kriti books and stories PDF | किघकन्या - 3

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किघकन्या - 3

अमावस की घनघोर काली अॅंधेरी रात थी, रोहिणी ने इस रात को चुना हवेली से भागने के लिए ... उस रात उसने वही दुल्हन का लाल जोड़ा पहना जिसे पहनकर वो ससुराल आई थी। वो दबे पाँव हवेली से निकल ग‌ई लेकिन ज्यादा दूर तक नहीं जा पाई। इसे रोहिणी का  दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उस रात बड़ी ही तेज हवाएँ चल रहीं थीं जिसके कारण छज्जे में लटका लालटेन झनाक से जोर की आवाज करता हुआ टूट गया और वीर सिंह की नींद खुल गई। उसने शुरू में ध्यान नहीं दिया पर जल्दी ही  उसे अहसास हो गया कि रोहिणी आस - पास कहीं नहीं है। उसने चिल्लाकर सारे घरवालों को उठा दिया ... ढूँढने पर जल्द ही पता लग गया कि रोहिणी हवेली में कहीं नहीं है ... भाग चुकी है ... वीर सिंह का अहंकार खौल उठा। उसने नौकरों को भेज के अपने सारे लठैतों - अखड़ैतों को इकट्ठा किया और साथ ही सारे गाँव वालों को भी जमा कर लिया। चालाक वीर सिंह को पता था कि गाँव वालों को रोहिणी से बड़ी हमदर्दी है इसलिए उनका भरोसा तोड़ने के लिए उसने उनसे यह कहा कि रोहिणी हवेली से ढेर सारे गहने - पैसे चोरी कर के अपने किसी यार के साथ भाग गई है। गाँव वालों को वीर सिंह का कहा मानना ही पड़ा क्योंकि सच में रोहिणी हवेली में या गाँव में कहीं नहीं थी। सब ने मिलकर उसे ढूँढना शुरू कर दिया ... वीर सिंह ने भी अपने लठैतों - अखड़ैतों को चारों ओर फैला दिया। गाँव के आसपास ज्यादातर जंगल पसरा पड़ा था इसलिए आधी रात होने के बावजूद लोग उसे जंगल में भी ढूँढने लगे। इधर रोहिणी बेहद थकी - हारी होने के बावजूद लागातार भाग रही थी। इर्दगिर्द क‌ई घाटियाँ थीं, उसे समझ नहीं आ रहा था वो किधर जाये। अंततः वो बिना सोचे - समझे एक ओर बढ़ने लगी और ऐसे ही एक घाटी पर पहुँच गई। अभी वो आगे बढ़ने का राह तलाश ही रही थी कि मशाल की रौशनी देख कर वो जान गई कि उस तरफ कोई आ रहा है। फौरन वो एक बड़े से पेड़ के पीछे छिप गई।  उसने पेड़ के ओट से देखा कि वीर सिंह उसी ओर बढ़ा चला आ रहा था। उसकी सांसें थम गई ... अगर कोई और होता तो शायद उम्मीद थी पर वीर सिंह से अब उसे कोई उम्मीद नहीं .... अगर वो इसके हाथ लग ग‌ई तो ये निश्चित ही उसे और उसके अजन्मे बच्चे को मार डालेगा। वो भय से पेड़ के पीछे और दुबक गई। उसने अपने पेट पर हाथ रखा .... उसे अपने बच्चे की सांसें महसूस होने लगीं ... इस अहसास ने जैसे उसके रगों में फिर से एक आस और साहस भर दिया। चाहे जो हो, उसे जीना है ... अपने बच्चे के लिए ... इस घनघोर अँधेरे में इन पेड़ों के ओट में वो वीर सिंह की नज़र से बच सकती है ... हाँ ! वो बच सकती थी पर भाग्य एक बार फिर रोहिणी का साथ नहीं निभाया और वीर सिंह जल्द ही उस पेड़ तक पहुँच गया जिस पेड़ के पीछे वो छिपकर खड़ी थी। उसने बालों से पकड़ कर रोहिणी को घसीटते हुए अपने करीब खींचा और बुरी तरह पीटने लगा। गुस्से में उफनता हुआ वो बोला, 
" घर चल तेरे पर कतरता हूँ, बहुत उड़ने का शौक चर्राया है तुझे ... तेरी हिम्मत कैसे हुई हवेली से भागने की ? तेरे जैसी गरीब अनाथ लड़की को मैंने शानदार हवेली रहने को दी ... गहने दिये ... हर सुख - सुविधा दी तो फिर घर से भागी क्यों? "
वीर सिंह की बात सुनकर रोहिणी कराहती हुई चिल्ला उठी, 
" सुविधा तो दी पर सुख कहाँ दिया ? प्रेम दिया ? कैसे देते प्रेम ... सारा प्रेम तो लूटा कर आते थे हीरगंज में अपनी दूसरी पत्नी मंगला पे तो अब जाओ ना उसी के पास ... मेरी जान खाने क्यों आये हो यहाँ, भगवान के लिए मुझे और मेरे बच्चे को छोड़ दो ... मैं सौगंध खाकर कह रही हूँ यहाँ से बहुत दूर चली जाऊँगी ...........। "
रोहिणी की बात सुनकर वीर सिंह सन्न रह गया .... यानि यह छुईमुई की फुल जैसी लड़की उसका सारा राज जान चुकी है। वीर सिंह यह सोच के आया था कि रोहिणी को ढूंढ के चोटी पकड़ कर हवेली वापस ले जायेगा फिर जंजीरों में बांधकर किसी कोठरी में फेंक देगा, ऐसे ही जीवन भर उसे उसके किये की सजा देगा। पर पासा एकदम से पलट गया, रोहिणी की बातें सुनकर वीर सिंह डर गया। उसे लगने लगा की अगर वो रोहिणी को वापस गाँव में ले गया तो वो गाँव वालों को उसका भेद बता देगी और उसके खानदान की बनी बना‌ई इज्जत चली जायेगी लेकिन साथ ही वो उसे सजा देने का लालच भी नहीं छोड़ पा रहा था। अचानक से उस के जेहन में एक खुराफात कौंधा ,उसने सोचा क्यों ना इस बात को यहीं दफन कर दें ... इस औरत को यहीं मार दें ताकि यह किसी को यह भेद बता ही न सके। रोहिणी की ओर देखता हुआ वो बेहद निर्ममता से हंस पड़ा। उसे यूँ हंसता देख रोहिणी के प्राण सूख गए पर वो कुछ समझ पाती इससे पहले ही वीर सिंह के हाथ उसके गले पर कस गए और कुछ ही क्षणों में रोहिणी निष्प्राण होकर उसके बाजुओं में झूल ग‌ई लेकिन वो उसकी लाश गाँव नहीं ले जा सकता था। गाँव वाले ढेरों सवाल करते कि कैसे मरी ? क्यों मरी ?? किसने मारा ??? साथ ही उस पर भी बहुत सारे सवाल उठते, इतने सारे जवाब वो कैसे देता? लिहाजा उसने सबसे आसान रास्ता अपनाया, अपने साथ आये दोनों लठैतों से खड्डा खुदवाया और रोहिणी को वहीं दफन कर दिया । गहरे अंधेरे में सिर्फ मशाल की रौशनी थी, उन में से किसी को नजर नहीं आया कि रोहिणी का सारा शरीर तो मिट्टी में दफन हो गया पर उसका एक बाजु ... बायाँ हाथ बाहर ही रह गया था। लौट कर वीर सिंह ने वही झूठा किस्सा गाँव में दोहरा दिया कि रोहिणी किसी दूसरे मर्द के साथ भाग ग‌ई है। गाँव वाले उसे भला - बुरा कहने लगे ... गालियाँ देने लगे ... छिनाल नाम धरा गया उसका। वैसे भी रोहिणी अनाथ थी, कोई भी उसे ढूँढने वाला नहीं था। गुणगौरी रोहिणी मिट्टी में दफन हो गई और धगड़बाज़ वीर सिंह अपनी रंगीनियों में डूब गया .....................  ।।। 


क्रमशः .............................