जयगुरु,🙏🏻🙏🏻🙏🏻सब ताले की एक चाबी
भूमिका
संसार में असंख्य समस्याएँ हैं—गरीबी, हिंसा, भ्रष्टाचार, पारिवारिक विघटन, तनाव, अनिद्रा, अकेलापन, नशा, असंतोष, युद्ध और नैतिक पतन। देखने में ये सब अलग-अलग प्रतीत होती हैं, पर क्या इन सबका कोई एक मूल कारण भी है?
यदि कारण अनेक हैं, तो समाधान भी अनेक होंगे। पर यदि मूल कारण एक है, तो चरम समाधान भी एक ही होना चाहिए।
इस पुस्तक का उद्देश्य किसी मत का प्रचार करना नहीं, बल्कि उस मूल कारण और उसके समाधान की खोज करना है। यदि मनुष्य मूल कारण को जान ले, तो समाधान स्वयं स्पष्ट होने लगता है।
कुछ मूल परिभाषाएँ
ज्ञान — जो प्रत्यक्ष अनुभूति से सत्य रूप में जाना जाए, वही ज्ञान है। केवल सूचना, स्मृति और शब्दों का संग्रह ज्ञान नहीं है।
वेद — मेरे चिंतन के अनुसार वेद का सार अखंड ज्ञान है। ग्रंथ उस ज्ञान के वाहक हो सकते हैं, पर ज्ञान स्वयं किसी पुस्तक तक सीमित नहीं है।
कर्म — केवल शरीर की क्रिया ही कर्म नहीं है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से प्रेरित प्रत्येक संकल्प, विचार, वाणी और व्यवहार कर्म है।
मन — संकल्प और विकल्प का केंद्र, जहाँ इच्छाएँ, आकर्षण और विकर्षण उत्पन्न होते हैं।
बुद्धि — निर्णय करने वाली शक्ति, जो उचित और अनुचित का विवेक करती है।
चित्त — संस्कारों, स्मृतियों और अनुभवों का भंडार।
अहंकार — "मैं" और "मेरा" का बोध। जब यही बोध अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर स्वयं को पृथक और सर्वोपरि मानने लगता है, तब बंधन का कारण बनता है।
समस्या कहाँ है?
मेरे विचार में संसार की लगभग प्रत्येक मानवीय समस्या का संबंध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मन से है।
अहंकार, लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा—ये सब मन की विकृत अवस्थाएँ हैं। मन विकृत होता है तो कर्म विकृत होते हैं; कर्म विकृत होते हैं तो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र अशांत हो जाते हैं।
यदि शिक्षा बढ़ रही है, तो अपराध क्यों बढ़ रहे हैं?
यदि विज्ञान आगे बढ़ रहा है, तो तनाव और अकेलापन क्यों बढ़ रहे हैं?
यदि साधन बढ़ रहे हैं, तो संतोष क्यों घट रहा है?
इन प्रश्नों का उत्तर बाहर नहीं, भीतर खोजना होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा का संकेत
भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल स्थूल शरीर नहीं मानता। उसके अनुसार मनुष्य के अस्तित्व के तीन प्रमुख आयाम हैं—स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर।
स्थूल शरीर वह है जिसे हम देखते और स्पर्श करते हैं। जन्म, वृद्धि, रोग, वृद्धावस्था और मृत्यु इसी शरीर से संबंधित हैं।
सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, प्राण और इन्द्रियों का क्षेत्र है। हमारे विचार, इच्छाएँ, भावनाएँ, प्रेम, क्रोध, लोभ, मोह और संस्कार इसी स्तर पर कार्य करते हैं।
कारण शरीर कर्मबीजों और गहरे संस्कारों का आधार माना गया है। भारतीय दर्शन के अनुसार जीव के कर्मों की निरंतरता और जन्म-जन्मांतर का संबंध इसी स्तर से समझाया जाता है।
इन तीनों शरीरों का कर्म से गहरा संबंध है।
किन्तु कर्म स्वयं अकेला नहीं चलता। उसके पीछे मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार निरंतर कार्य करते हैं। यदि मन अशांत है तो कर्म अशांत होंगे, और यदि कर्म अशांत हैं तो तीनों शरीर किसी न किसी रूप में उससे प्रभावित होंगे।
इसीलिए भारतीय ऋषियों ने बाहरी उपचार से अधिक अंतःकरण के शोधन पर बल दिया।
महर्षि पतञ्जलि ने कहा—
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।"
अर्थात् योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
"उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।" (गीता 6.5)
अर्थात् मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए, स्वयं को पतन की ओर न ले जाए।
फिर कहते हैं—
"बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।" (गीता 6.6)
अर्थात् जिसने अपने मन को जीत लिया, उसका मन उसका मित्र है; जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही मन शत्रु के समान है।
रामायण और महाभारत का संदेश
रामायण केवल एक राजवंश की कथा नहीं है और महाभारत केवल एक युद्ध का इतिहास नहीं है।
मेरे चिंतन के अनुसार दोनों महाग्रंथों का चरम उद्देश्य मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष को समझाना है।
महाभारत संकेत करती है कि मनुष्य कितना भी बलवान, विद्वान और समृद्ध क्यों न हो, यदि उसका मन अहंकार के अधीन हो जाए तो उसका पतन निश्चित है।
रामायण बताती है कि महान तप, विद्या और शक्ति भी मन की अशुद्धि के सामने टिक नहीं पाते।
कथा माध्यम है, मनुष्य निर्माण उसका उद्देश्य है।
वर्तमान युग की स्थिति
आज अस्पतालों में बढ़ती बीमारियाँ, तनाव, अनिद्रा, पारिवारिक विघटन, भ्रष्टाचार, अकेलापन, नशा, सामाजिक अविश्वास और नैतिक पतन हमें एक प्रश्न पूछने के लिए विवश करते हैं—
क्या हमने अपने मन के नियंत्रण के लिए कुछ किया है?
यह सत्य है कि सभी रोगों का कारण केवल मन नहीं होता; अनेक रोगों के जैविक, आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारण भी होते हैं। फिर भी मानसिक तनाव और जीवनशैली शरीर तथा संबंधों दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।
विज्ञान ने हमें अद्भुत साधन दिए हैं, पर साधनों का उपयोग मनुष्य के मन पर निर्भर करता है।
मोबाइल में ज्ञान भी है और भ्रम भी। वही व्यक्ति सत्संग सुन सकता है, वही हिंसा भी देख सकता है। साधन नहीं, दिशा निर्णायक है।
समाधान की दिशा
यदि मूल कारण मन है, तो चरम समाधान भी मन का रूपांतरण होना चाहिए।
मेरी साधना-परंपरा की समझ के अनुसार, सत् दीक्षा और बीज नाम का उद्देश्य किसी संप्रदाय का विस्तार नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण का रूपांतरण है। इस विषय की विस्तृत चर्चा आगे के अध्यायों में की जाएगी।
यह पुस्तक किसी पर निष्कर्ष थोपने का प्रयास नहीं करती। इसका उद्देश्य जिज्ञासा जगाना है।
यदि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठक अपने जीवन में केवल एक प्रश्न पूछना प्रारंभ कर दे—
"मैंने अपने मन के रूपांतरण के लिए क्या किया?"
—तो इस पुस्तक का उद्देश्य सफल माना जाएगा।
अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगा—
यदि मूल कारण मन है, तो चरम समाधान भी मन का रूपांतरण ही होगा।
इसीलिए मैं विनम्रतापूर्वक कहता हूँ—
"सब ताले की एक ही चाबी है—मन का पूर्ण नियंत्रण।"
मन नियंत्रित होगा तो कर्म शुद्ध होंगे।
कर्म शुद्ध होंगे तो चरित्र निर्मित होगा।
चरित्र निर्मित होगा तो परिवार सुधरेगा।
परिवार सुधरेगा तो समाज सुधरेगा।
समाज सुधरेगा तो राष्ट्र सुदृढ़ होगा।
और जब मनुष्य स्वयं को जानने की यात्रा पर चलेगा, तभी वह अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होगा।
यही इस पुस्तक की भूमिका है। आगे के अध्यायों में हम क्रमशः दीक्षा, बीज नाम, पुरुषोत्तम, मनुष्य निर्माण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर विचार करेंगे।
जयगुरु 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम
( चंद्रा सत्संग केंद्र)
बोकारों झारखंड