---
*नॉवेल: "पांच वादों की दुल्हन"*
*Chapter 3: पहली रात का सच ~ 1000 शब्द*
आज सोमवार था।
आराध्या के कैलेंडर पर लाल स्याही से लिखा था - *"विक्रम"*
*Scene 1: कमरे में घुटन ~ 300 शब्द*
रात 11 बजे। नौकरानी आई: "बहूजी, बड़े साहब बुला रहे हैं।"
आराध्या का दिल धड़क रहा था। हाथ में लॉकेट कसकर पकड़ा। अंदर मां-बहन की फोटो।
विक्रम का कमरा। काला, भारी पर्दे, शराब की बोतलें।
विक्रम सूट में। हाथ में व्हिस्की का गिलास।
"आ गई?" आवाज में नशा और घमंड।
आराध्या: "जी।"
विक्रम पास आया। उसकी ठुड्डी उठाई: "डर लग रहा है?"
"नहीं।" आराध्या ने झूठ बोला।
"झूठ। तुम्हारी आंखें बता रही हैं।" विक्रम हंसा: "डरो। इस घर में डर ही इज्जत बचाता है।"
उसने टेबल पर कागज फेंका: "ये साइन कर दो। तुम्हारे बाप की बाकी जमीन भी अब ठाकुरगढ़ की।"
आराध्या ने कागज देखा। 50 बीघा। रामलाल के नाम।
अंदर गुस्सा भड़का: _"पहले 10 बीघा ली। अब 50?"_
उसने कलम उठाई। हाथ कांप रहा था। साइन करते वक्त स्याही फैल गई।
विक्रम: "होशियार बन रही हो?" उसने आराध्या का हाथ पकड़ा: "दर्द होगा तो चिल्लाना मत। आवाज मुझे पसंद नहीं।"
तभी दरवाजा खटका।
"भाई साहब, जरूरी बात है।" बाहर से अर्जुन की आवाज।
विक्रम चिढ़ गया: "रुक जा।"
पर अर्जुन अंदर आ गया। वर्दी में।
अर्जुन: "पुलिस का फोन आया। गांव में चोरी। तुम्हें चलना पड़ेगा।"
विक्रम: "अभी?"
अर्जुन ने आराध्या को देखा: "हां। अभी।"
विक्रम गुस्से में गिलास फेंककर चला गया: "बाद में निपटते हैं।"
दरवाजा बंद होते ही आराध्या फर्श पर गिर पड़ी। सांस लेना मुश्किल हो रहा था।
*Scene 2: सबूत और शक ~ 400 शब्द*
आराध्या उठी। विक्रम शराब पीकर गया था। टेबल पर उसकी चाबी का गुच्छा।
उसकी नजर अलमारी पर गई। उसमें ताला। पर चाबी...?
दिल की धड़कन तेज। उसने एक-एक चाबी ट्राई की।
*क्लिक।* खुल गया।
अंदर फाइलें। जमीन के कागज। और एक पुरानी डायरी।
डायरी खोली। 5 साल पुरानी तारीख:
_"15 Oct। शर्मा की जमीन चाहिए। रात को काम खत्म। अर्जुन केस बंद कर देगा। विक्रम आग लगाएगा। देव दवाई देगा। करण शोर मचाएगा। रुद्र... उसे कुछ मत बताना। वो छोटा है।"_
नीचे 5 के साइन।
आराध्या की आंखों के आगे अंधेरा। _"यही सबूत। यही।"_
उसने फोटो खींची। फोन में सेव किया।
तभी पीछे से आवाज: "क्या कर रही हो?"
आराध्या पलटी। देव खड़ा था। हाथ में दवाई का डिब्बा।
देव की आंखें अलमारी पर, फिर आराध्या पर: "चोरी?"
आराध्या का गला सूख गया: "मैं... मैं दवा लेने आई थी। सिर दर्द..."
देव पास आया। डायरी देखी। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
"तुमने पढ़ लिया?" आवाज धीमी।
आराध्या: "हां।"
देव 10 सेकंड चुप रहा। फिर धीरे से बोला: "इसे बंद कर दो। और भूल जाओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर विक्रम को पता चला... वो तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेगा।"
देव ने अलमारी बंद की। चाबी आराध्या के हाथ में दी: "जाओ। सो जाओ।"
आराध्या: "आप... आपने मुझे बचाया क्यों?"
देव: "क्योंकि इस घर में कोई तो इंसान बचा हो।" कहकर चला गया।
*Scene 3: रात का आखिरी हमला ~ 300 शब्द*
रात 2 बजे। आराध्या अपने कमरे में। फोन में सबूत सेव।
तभी खिड़की पर आवाज।
रुद्र। हाथ में खाना।
"दी, भूखी होंगी।"
आराध्या: "तुम यहां क्या कर रहे हो?"
रुद्र: "चिंता हो रही थी। बड़े भाई का गुस्सा..."
आराध्या ने खाना लिया: "थैंक्यू रुद्र।"
रुद्र: "दी एक बात बोलूं? आप यहां से भाग जाओ।"
आराध्या चौंकी: "क्या?"
रुद्र: "मैंने सब सुन लिया था 5 साल पहले। पापा और भाइयों की बात। मैं डर गया था। कुछ नहीं बोला।" उसकी आंखों में आंसू: "माफ करना दी।"
आराध्या सन्न। _"तो इसे सच पता है?"_
"रुद्र, तुम..."
"चुप। कोई आ रहा है।" रुद्र खिड़की से कूदा और भाग गया।
2 मिनट बाद करण नशे में दरवाजा तोड़कर घुसा:
"कहां है मेरी बीवी? आज मेरी बारी है ना? गुरुवार!"
आराध्या पीछे हटी: "आज सोमवार है।"
करण: "तो क्या? मैं ठाकुर का बेटा हूं। जो मर्जी।"
उसने आराध्या का हाथ पकड़ा।
तभी लाइट जली। दरवाजे पर देव।
"छोड़ो उसे करण।"
करण: "तू बीच में मत आ।"
देव: "मैं डॉक्टर हूं। और ये मेरी मरीज है। टच किया तो हाथ तोड़ दूंगा।"
करण गाली देकर चला गया।
कमरा खाली। आराध्या कांप रही थी।
देव: "ठीक हो?"
आराध्या ने सर हिलाया। आंखों में आंसू।
देव दरवाजे पर रुककर बोला: "आराध्या... इस घर से नफरत करती हो ना? करती रहो। पर सावधान रहना। यहां हर कोई एक्टर है।"
कहकर चला गया।
आराध्या ने लॉकेट खोला। फोटो को चूमा:
_"मां, सबूत मिल गया। अब गिनती शुरू।"_
*Chapter 3 End*
_सबूत हाथ में। पर खतरा सर पर।
देव दोस्त है या दुश्मन? रुद्र सच बोल रहा है?
और कल मंगलवार... अर्जुन का दिन।_
---