hukm aur hasarat in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत - 17

Featured Books
Categories
Share

हुक्म और हसरत - 17


♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia

सुबह के ठीक 3:00 बजे... पूरा महल गहरी नींद में डूबा हुआ था।लेकिन अर्जुन की नींद अचानक टूट गई।

"नहीं... माँ!!" 😨

वो हाँफते हुए बिस्तर पर उठ बैठा। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, जैसे अभी-अभी कोई भयानक सपना देखकर लौटा हो। उसने कुछ पल अपनी साँसों को संभालने की कोशिश की।फिर उसकी नज़र सामने टँगे कैलेंडर पर गई।

15 नवंबर। 

उसकी आँखें कुछ पल के लिए वहीं ठहर गईं।

आज...माँ की पुण्यतिथि थी। उसने आँखें बंद कर लीं।बरसों बीत चुके थे...

लेकिन उस तारीख़ का दर्द आज भी उतना ही ताज़ा था।एक भारी साँस लेकर वो बिस्तर से उठा।

"याद नहीं करना है..." उसने खुद से कहा।

कुछ देर बाद...वो महल के निजी जिम में था। 

अँधेरे कमरे में सिर्फ़ पंचिंग बैग के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी।

धड़ाम...! धड़ाम...! हर मुक्का ऐसा था, जैसे वो अपनी यादों से लड़ रहा हो।

फिर उसने पुश-अप्स शुरू कर दिए।

एक...बीस...

पचास...सौ...

लेकिन शरीर जितना थक रहा था...यादें उतनी ही गहरी होती जा रही थीं। 💔

उसे याद आया...

बचपन में माँ हर सुबह उसके बाल सँवारती थीं।

"इतनी जल्दी मत भागो... पहले नाश्ता कर लो।" 🤍

पिता मुस्कुराकर कहते—

"मजबूत बनो... लेकिन इंसानियत कभी मत खोना।"

और उसका छोटा भाई...

हर सुबह उसकी शर्ट पकड़कर पीछे-पीछे दौड़ता था।

"भैया... मुझे भी साथ ले चलो!" 😊

अर्जुन की आँखें कसकर बंद हो गईं।

उसने एक आख़िरी ज़ोरदार मुक्का पंचिंग बैग पर मारा।

धड़ाम!! 

कुछ देर वहीं खड़ा अपनी साँसें संभालता रहा।फिर खुद को शांत करने के लिए जिम से निकलकर महल के विशाल गार्डन की ओर चला गया। 🌿

सुबह की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी।वो दोनों हाथ पैंट की जेब में डाले, धीरे-धीरे फूलों के बीच बनी पगडंडी पर चलता रहा।चेहरे पर वही गंभीर खामोशी...और आँखों में बरसों पुराना दर्द...

जिसे कोई पढ़ नहीं सकता था। 

""""""""

सुबह के ठीक 4:00 बजे... 

सिया की भी नींद खुल गई।कल रात अचानक चली गई बिजली की वजह से जो कुछ हुआ था...

वो सब बार-बार उसकी आँखों के सामने घूम रहा था।अनजाने में अर्जुन का चेहरा याद आते ही उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। 😊❤️

वो धीरे-धीरे उठी और बालकनी में आ गई।सुबह की ठंडी हवा उसके खुले बालों से खेल रही थी। 

तभी उसकी नज़र नीचे गार्डन की ओर गई।

अर्जुन... 🖤

वो अकेला, बेहद शांत कदमों से बगीचे में टहल रहा था।उगते सूरज की सुनहरी किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं।

उसकी शख्सियत हमेशा की तरह गंभीर...संयमित...और बेहद आकर्षक लग रही थी। 

सिया कुछ पल के लिए उसे बस देखती रह गई।उसके चेहरे पर अनायास मुस्कान फैल गई।

"इतनी सुबह भी उठ जाते हैं..." उसने धीरे से खुद से कहा।उसने अपने लंबे, रेशमी बालों का ढीला-सा जूड़ा बनाया और रेलिंग पर टिककर कुछ देर तक उसे देखती रही।उसे क्या पता था...

कि उस शांत चेहरे के पीछे आज कितनी गहरी तकलीफ़ छिपी हुई है। कुछ देर बाद अर्जुन महल के अंदर चला गया और सिया भी मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर लौट आई।

वो जल्दी से नहाकर तैयार हुई। 

उसने लाल रंग का खूबसूरत अनारकली सूट पहना। ❤️हल्का-सा काजल...न्यूड लिपस्टिक...और छोटी-सी बिंदी। 

अपने लंबे बाल खुले छोड़कर उसने आईने में खुद को देखा।

फिर मुस्कुराते हुए धीमे से बोली—"वाह! सिया कितनी सुंदर हो तुम..." !!


**

सुबह की हल्की सुनहरी धूप महल के आँगन में उतर चुकी थी। 

सिया तैयार होकर सबसे पहले अर्जुन को ढूँढ़ने निकली।

लेकिन आज...वो न तो उसके कमरे के बाहर था...न ही महल के गलियारों में...और न ही हमेशा की तरह उसके दिन का पहला "सुप्रभात, राजकुमारी।" सुनाई दिया। 😔

सिया ने चारों ओर नज़र दौड़ाई।

"अर्जुन कहाँ हैं?" 🤔

तभी सामने से काव्या कुछ फाइलें हाथ में लिए आती दिखाई दी। 

"काव्या... अर्जुन कहीं दिख नहीं रहे।"

काव्या हल्का-सा मुस्कुराई। 😊

"वो जिम में हैं, राजकुमारी।"

सिया ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

"जिम...? इस समय?" 😯

"जी।"

काव्या भी थोड़ी हैरान थी।

"आज पहली बार ऐसा हुआ है। वरना इस समय तक तो वो आपके साथ रहने के लिए तैयार मिलते हैं। आप जहाँ भी जाती हैं... वो हमेशा आपके साथ होते हैं।"

इतना कहते ही काव्या के होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।😏

"वैसे... आज आप उन्हें ढूँढ़ रही हैं?"

सिया ने तुरंत नज़रें चुरा लीं।

"ऐसी कोई बात नहीं है..." 😅

फिर मुस्कुराते हुए बोली—"असल में... आज सुबह फ्लोरेंस पियानो प्रतियोगिता के जज का ईमेल आया है।" 

उसकी आँखें चमक उठीं।

"उन्होंने मेरे प्रदर्शन की बहुत तारीफ़ की है... और आगे के लिए भी बुलाया है।"

उसने खुशी से मोबाइल सीने से लगा लिया।

"सबसे पहले ये बात... मैं अर्जुन को बताना चाहती हूँ।" ❤️

काव्या बस उसे देखती रही।

उसके चेहरे की मुस्कान सब कुछ कह रही थी।

शायद...सिया अब खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि अर्जुन उसके लिए क्या बनता जा रहा है। सिया धीमे कदमों से महल के निजी जिम की ओर बढ़ गई। जैसे ही उसने दरवाज़े के पास पहुँचकर अंदर झाँका...वो कुछ पल के लिए वहीं ठिठक गई😶

पूरा जिम सिर्फ़ पंचिंग बैग की आवाज़ से गूँज रहा था।

धड़ाम...!

धड़ाम...! 

अर्जुन लगातार पंच मार रहा था।उसने टी-शर्ट नहीं पहन रखी थी। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।माथे से पसीने की बूँदें उसके चौड़े कंधों और तराशे हुए शरीर पर फिसल रही थीं। 

कमरे में पसीने, धूल और उसके शरीर की हल्की-सी जंगल और भीगी मिट्टी जैसी महक घुली हुई थी...एक अजीब-सी सुकून देने वाली खुशबू... सिया अनायास उसे देखती रह गई।

फिर उसने हल्के से दरवाज़ा खटखटाया।

ठक... ठक... 

आवाज़ सुनते ही अर्जुन ने पलटकर देखा।सामने सिया को मुस्कुराते हुए खड़ा देखकर वो कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गया।उसकी आँखों में एक पल को हैरानी तैर गई।

अगले ही पल उसने जल्दी से पास रखी टी-शर्ट उठाई और पहन ली। 

फिर हमेशा की तरह दोनों हाथ पीछे बाँधकर...सिर हल्का-सा झुकाकर खड़ा हो गया।

"जी, राजकुमारी... आप यहाँ?" 😑

सिया ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा।

"हाँ... क्या मुझे आने की इजाज़त नहीं है?" 😊

अर्जुन ने धीरे से सिर हिलाया।

"ऐसी बात नहीं है, राजकुमारी।"


सिया उसके थोड़ा और करीब आई।

तभी उसकी नज़र अर्जुन के हाथों पर पड़ी।उँगलियों की गाँठें बुरी तरह छिल चुकी थीं।कहीं-कहीं से खून भी सूख चुका था। 

उसकी मुस्कान तुरंत गायब हो गई।


"अर्जुन..." 😟

उसने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

"ये क्या हुआ?"

अर्जुन ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाना चाहा।

"कुछ नहीं, राजकुमारी।"

"कुछ नहीं?" सिया ने भौंहें चढ़ाईं।

"इसे तुम कुछ नहीं कहते हो?" 🥺

अर्जुन चुप रहा।

सिया ने तुरंत जिम के एक कोने में रखा फ़र्स्ट-एड बॉक्स ढूँढ़ लिया। फिर उसकी ओर देखकर बोली—

"बैठिए।"

अर्जुन बिना कुछ कहे सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया।

उसका सिर झुका हुआ था।जैसे वो आज भी उसकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।सिया बड़े ध्यान से उसके हाथ साफ़ करने लगी।दवाई लगाते समय उसकी उँगलियाँ अर्जुन की हथेलियों को हल्के-हल्के छू रही थीं।अर्जुन ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।उसके बेहद करीब खड़ी सिया के खुले बालों से गुलमोहर और वनीला की हल्की-सी खुशबू आ रही थी। 🌺

उसने अनजाने में गहरी साँस ली।और मन ही मन...

"मोह..." ❤️

बस एक शब्द...

जो उसके होंठों तक कभी नहीं आ सकता था।कुछ देर की खामोशी के बाद...

सिया ने जानबूझकर मुस्कुराते हुए माहौल हल्का करने की कोशिश की। 😊

"अच्छा... एक बात बताइए?"

"जी, राजकुमारी।"

"ये गुस्सा आपको आता कैसे है?" 🤨

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

"जी?"

"मतलब... पैदल आता है..." 

"...या गाड़ी में बैठकर?" .

कुछ पल की चुप्पी...सिया खुद ही अपनी बात पर हँस पड़ी।

लेकिन अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान नहीं आई।बस उसकी आँखों के कोनों में एक हल्की-सी नरमी ज़रूर उतर आई।

सिया ने मुँह फुला लिया। 😗

"हूँह... इतनी मेहनत से मज़ाक किया... फिर भी नहीं हँसे।"

अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा—

"मुस्कुराने की वजह मिलना भी ज़रूरी होता है, राजकुमारी।"

ये सुनकर सिया का दिल हल्का-सा कस गया। 

वो कुछ कहने ही वाली थी कि तभी...

"राजकुमारी।"

काव्या हाथ में एक फ़ाइल लिए अंदर आई। 

"आपके हस्ताक्षर चाहिए।"

सिया ने हल्की-सी मुस्कान के साथ फ़ाइल उसकी ओर बढ़ाने का इशारा किया...और अर्जुन ने चुपचाप अपने हाथ पीछे खींच लिए, जैसे अपनी तकलीफ़ फिर से छिपा ली हो। 

***** 

काव्या फ़ाइल लेकर आगे बढ़ी तो सिया भी उसके साथ महल के प्रशासनिक कक्ष की ओर चली गई। कमरे में पहले से ही उदयपुर राज्य के कई दस्तावेज़ फैले हुए थे।

गाँवों की रिपोर्ट...जनता की शिकायतें...नई सिंचाई योजनाएँ...अस्पताल और स्कूलों के निर्माण से जुड़ी फाइलें...

सब कुछ मेज़ पर करीने से रखा हुआ था। 

काव्या एक-एक फ़ाइल खोलकर समझाने लगी।

"राजकुमारी, ये पिछली पंचायत की रिपोर्ट है।"

"यहाँ किसानों ने पानी की नई लाइन की माँग की है।""और ये महिलाओं के स्वयं सहायता समूह की योजना है।"

सिया पूरे ध्यान से हर बात सुन रही थी। वो बीच-बीच में अपनी राय भी दे रही थी।

इस गाँव में पहले अस्पताल का काम पूरा करवाइए।"

"और बच्चों की पढ़ाई पर भी विशेष ध्यान दीजिए।"

काव्या मुस्कुराई। 🌸

उसे देखकर साफ़ लग रहा था...सिया सच में अपनी जनता की परवाह करती थी।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। महाराज अंदर आए।

उन्हें देखते ही सिया तुरंत खड़ी हो गई।

"पिताश्री।" 🤍

उन्होंने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा।

"बैठो, बेटा।"

कुछ पल तक उन्होंने मेज़ पर रखी फाइलों को देखा।

फिर गंभीर स्वर में बोले—"सिया... तुम सिर्फ़ इस राज्य की राजकुमारी नहीं हो।"

"तुम हमारे साम्राज्य और कंपनी... दोनों की उत्तराधिकारी हो।"

सिया चुपचाप सुनती रही।

महाराज आगे बोले—"अब समय आ गया है कि तुम हमारी कंपनी के कामकाज को भी समझना शुरू करो।"

"अगले सप्ताह से तुम ऑफिस जॉइन करोगी।"

सिया के चेहरे की मुस्कान हल्की-सी फीकी पड़ गई।

उसने एक गहरी साँस ली।

ज़िम्मेदारियाँ...उसे हमेशा स्वीकार थीं।लेकिन उनके साथ आने वाला बोझ...कभी-कभी दिल को भारी कर देता था। 

फिर भी उसने अपने चेहरे पर मुस्कान लाकर कहा—

"जैसा आपका आदेश, पिताश्री।" 

महाराज संतुष्ट होकर मुस्कुराए।

"तुम अकेली नहीं रहोगी।"

"अर्जुन और काव्या हर समय तुम्हारे साथ रहेंगे।"

ये सुनते ही जाने क्यों...सिया के चेहरे पर फिर से हल्की-सी मुस्कान लौट आई। ❤️

कुछ देर बाद...


सिया सीधे रानी माँ और राजमाता के कक्ष में पहुँची। 

पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने उसे उनसे दूर-सा कर दिया था।आज वो बस उनके साथ कुछ सुकून भरे पल बिताना चाहती थी।

तीनों ने साथ बैठकर चाय पी। ☕

राजमाता ने हमेशा की तरह उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए ढेर सारी बातें कीं।रानी माँ उसे देखकर बार-बार मुस्कुरा रही थीं।

उन कुछ घंटों में...

महल की सारी परेशानियाँ जैसे कहीं खो गई थीं। 🌸

लेकिन...शाम ढलने लगी। सिया अपने कमरे की ओर लौट रही थी।

आज पूरा दिन बीत गया था...और एक बात बार-बार उसके मन को खटक रही थी।

अर्जुन...

आज वो एक बार भी उसके सामने नहीं आया। न उसने हमेशा की तरह पूछा—

"राजकुमारी, आपको कहीं जाना है?"

न ही उसने उसकी सुरक्षा को लेकर कोई सवाल किया।

सुबह जिम में जो उदासी उसने उसकी आँखों में देखी थी...

वो अब भी उसके मन में कहीं अटक गई थी। 

सिया ने धीरे से एक लंबी साँस छोड़ी।

"इतना दर्द आखिर अपने अंदर कैसे छिपा लेते हो, अर्जुन...?" 🥺

वो अपने ही ख़यालों में खोई आगे बढ़ रही थी।

तभी...

उसके कदम अचानक रुक गए। सामने...

अर्जुन का कमरा था। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।महल में अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।सिया ने कुछ पल उस दरवाज़े को देखा।फिर जाने किस अनजानी बेचैनी ने उसके कदम उसी ओर मोड़ दिए...

धीरे-धीरे...

वो कमरे के अंदर चली गई।कमरा हमेशा की तरह बिल्कुल सजा हुआ था। हर चीज़ अपनी जगह पर... बिल्कुल अर्जुन की तरह — शांत, अनुशासित और भावनाओं से कोसों दूर। 

कमरे के एक कोने में एक पुराना लकड़ी का बक्सा रखा था। उस पर धूल की हल्की परत थी, मगर उसे बड़ी सावधानी से संभालकर रखा गया था। 

सिया की नज़र फिर मेज़ पर रखी एक पुरानी चमड़े की डायरी पर जाकर ठहर गई। 

उसने धीरे से उसे हाथ में उठाया।

उसकी उंगलियाँ कुछ पल के लिए ठिठक गईं।

"मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिससे किसी का विश्वास टूटे... लेकिन अर्जुन कुछ छुपा रहा है। और शायद उस दर्द को जाने बिना मैं उसे कभी समझ नहीं पाऊँगी..." 🥺

उसने गहरी साँस ली... और धीरे से डायरी का पहला पन्ना खोल दिया। 💗

डायरी का पहला पन्ना... 

"15 नवंबर...
उस दिन सर्दियाँ अपने पूरे शबाब पर थीं। 
माँ ने सुबह मुझे आख़िरी बार गले लगाया था... और मुस्कुराकर कहा था—"जल्दी लौट आना बेटा... आज रात तुम्हारी पसंद की खीर बनेगी।" 
पापा ऑफिस के लिए निकल चुके थे... माँ मंदिर जा रही थीं।
लेकिन शायद किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था।
अचानक पूरे में हड़कंप मच गया।एक ज़ोरदार धमाका हुआ।
जब मैं दौड़ते हुए बाहर पहुँचा... तो देखा— हमारी गाड़ी आग की लपटों में घिरी हुई थी। 🔥
मैं चीखता रहा... भागता रहा... लेकिन आग मेरी आवाज़ से कहीं ज़्यादा तेज़ थी।उस दिन सिर्फ मेरी दुनिया नहीं जली थी...
उस आग ने मेरे अंदर बची हर मासूमियत, हर मुस्कान और हर भरोसे को भी राख कर दिया था। 
उस हादसे के बाद मैंने एक बात सीख ली—
जिससे सबसे ज़्यादा प्यार करो... उसे खुद से सबसे दूर रखो।
क्योंकि मेरी किस्मत मेरे अपने लोगों को मुझसे छीन लेती है..."
सिया की आँखें धुंधली हो गईं। 🥺
एक गर्म आँसू डायरी के पन्ने पर गिर पड़ा। 
उसका दिल जैसे किसी ने कसकर जकड़ लिया हो।
अब उसे समझ आने लगा था कि अर्जुन हमेशा इतना ठंडा क्यों रहता है... क्यों उसकी मुस्कान कभी उसकी आँखों तक नहीं पहुँचती... और क्यों उसने अपने चारों ओर खामोशी की इतनी ऊँची दीवार खड़ी कर रखी है। 
सिया ने काँपते हाथों से डायरी बंद कर दी|

उसी पल...क्लिक... दरवाज़ा खुला।
सिया का दिल जैसे धड़कना भूल गया। कोई आया...............

जारी(...)

 © कॉपीराइट : Diksha 

 रेटिंग देना न भूलें!
अपनी प्यारी-सी समीक्षा (Review) ज़रूर साझा करें।
❤️ ऐसे ही नए एपिसोड पढ़ने के लिए मुझे Follow करें।