One Look, One Story - 3 in Hindi Love Stories by nupur shah books and stories PDF | एक नज़र, एक कहानी - 3

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एक नज़र, एक कहानी - 3

भाग 3 – खामोश नज़रें

उसकी मुस्कान देखने के बाद भी मेरा दिल अब तक शांत नहीं हुआ था। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि माताजी ने मेरी प्रार्थना इतनी जल्दी सुन ली। शायद इसलिए कहते हैं कि अगर दुआ सच्चे दिल से माँगी जाए, तो उसका जवाब किसी न किसी रूप में ज़रूर मिलता है।

कुछ देर बाद हम सब घर के अंदर चले गए। वहाँ सभी रिश्तेदार एक-दूसरे से मिल रहे थे। घर मेहमानों से भरा हुआ था। मम्मी, मामा और बाकी सब लोग बातचीत में इतने व्यस्त हो गए कि किसी को समय का पता ही नहीं चल रहा था। हमने भी सबसे मिलकर पानी पिया और कुछ देर वहीं बैठे रहे।

लेकिन घर में इतनी भीड़ थी कि बैठने की जगह ही नहीं बची थी।

इसलिए मैं, मेरी कज़िन बहन और मेरा कज़िन भाई घर के बाहर लगे टेंट के नीचे आ गए, जहाँ कई कुर्सियाँ लगी हुई थीं। हल्की-हल्की हवा चल रही थी और सामने लगा पंखा गर्मी को थोड़ा कम कर रहा था। हम तीनों एक साथ बैठ गए। मेरी कज़िन मुझसे बातें कर रही थी। कभी हम हँसी-मज़ाक करते, तो कभी लूडो खेलने लगते।

लेकिन सच कहूँ...

मेरा ध्यान उन बातों में बिल्कुल भी नहीं था।

मेरी नज़रें तो बस एक ही चेहरे को ढूँढ़ रही थीं।

मैं बार-बार इधर-उधर देख रही थी, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। एक पल के लिए लगा कि शायद वह घर के अंदर होगा या फिर किसी काम से बाहर गया होगा।

तभी अचानक मेरी नज़र दरवाज़े की ओर गई।

वह अपने एक दोस्त के साथ बाहर से अंदर आ रहा था।

उसे देखते ही मेरी धड़कनें फिर से तेज़ हो गईं। पता नहीं क्यों, लेकिन उसे देखते ही मेरे चेहरे पर अपने-आप मुस्कान आ जाती थी।

दोनों कुछ देर के लिए घर के अंदर चले गए। मैं बस उन्हें जाते हुए देखती रही। फिर मैंने खुद को संभाला और दोबारा अपनी कज़िन के साथ बातें करने लगी।

कुछ ही देर बाद वह फिर से बाहर आया।

और इस बार...

वह आकर बिल्कुल मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

उस पल मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी साँसें ही थम गई हों।

हमारे बीच बस कुछ कदमों की दूरी थी।

न उसने कुछ कहा...

न मैंने।

लेकिन हमारी नज़रें बार-बार एक-दूसरे से मिल रही थीं।

कभी वह अपने फ़ोन की स्क्रीन देखने लगता, फिर धीरे से मेरी तरफ़ नज़र उठा लेता। और मैं... मैं भी हर बार नज़रें चुराने की कोशिश करती, लेकिन कुछ ही पलों बाद अनजाने में फिर उसी की तरफ़ देखने लगती।

ऐसा लग रहा था जैसे समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो।

उस भीड़ में इतने सारे लोग थे, फिर भी मुझे सिर्फ़ वही दिखाई दे रहा था।

तभी मेरा भाई वहाँ आ गया।

मैं तुरंत संभल गई और अपनी मुस्कान छिपा ली। मुझे डर था कि कहीं उसे कुछ शक न हो जाए। थोड़ी ही देर में वह पबजी खेलने लगा। एक छोटा-सा बच्चा भी उसके पास आ गया और दोनों खेल में इतने खो गए कि उन्हें आसपास की किसी चीज़ का होश ही नहीं रहा।

उन्हें देखकर वह और उसका दोस्त भी कुछ देर तक खेल देखने लगे।

फिर दोनों अपनी जगह से उठकर बाहर चले गए।

मेरी कज़िन ने धीरे से कहा, "चल... हम भी बाहर चलते हैं।"

एक पल के लिए मेरा भी मन हुआ कि मैं भी उनके पीछे चली जाऊँ।

लेकिन अगले ही पल मैंने खुद को रोक लिया।

पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे लगा कि अगर मैं बिना किसी वजह के उसके पीछे गई, तो शायद वह मुझे गलत समझ ले।

इसलिए मैंने वहीं बैठना सही समझा।

कभी-कभी किसी को पसंद करना आसान होता है...

लेकिन अपनी इज़्ज़त और उसकी सोच का ख़याल रखते हुए अपनी भावनाओं को छिपा लेना उससे भी ज़्यादा मुश्किल होता है।

मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था...

कि उस रात किस्मत ने हमारी कहानी का एक और खूबसूरत पल अभी संभालकर रखा था।

आख़िर ऐसा क्या होने वाला था... जो उस रात को मेरी ज़िंदगी की सबसे यादगार रातों में से एक बना देगा?

क्रमशः... ❤️