Antarnihit 53 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 53

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अन्तर्निहित - 53

[53]

सारा के साथ शैल निकल पडा गुरु जी के आश्रम को जाने के लिए। मार्ग में ही सूर्यास्त हो गया तो एक स्थान पर दोनों रुक गए। 

“इस मार्ग पर पूर्व में भी हम यहीं रात्री निवास कर चुके हैं। आज भी यहीं करना होगा।”

“हाँ। आश्रम अभी भी दूरी पर है अंधेरा भी हो गया है।”

“आज हमारे पास वाहन है, आप उसके भीतर सो जाइए।”

“और तुम?” शैल ने कोई उत्तर नहीं दिया। नदी में डूब रहे सूर्य को देखता रहा। 

प्रात: काल होते ही निकल पड़े, आश्रम वाले स्थान पर जा पहुंचे। 

“यहीं था न वह आश्रम, सारा जी?”

“हाँ, था तो यहीं किन्तु ...।” सारा ने चारों तरफ देखा और कहा। 

“किन्तु यह तो वैसा नहीं है जैसा हमने देखा था, हम रुके थे। यह तो भिन्न लग रहा है। कहीं हम भटक तो नहीं गए?”

“स्थान तो यही है। देखो उस छोटी सी पहाड़ी को, नदी के इस प्रवाह को भी देखो। सब वही है। हम भटके तो नहीं हैं। तो वह आश्रम है कहाँ?” सारा पुन: आश्रम खोजने लगी। दूर दूर तक दृष्टि डाली।

“शैल, वहाँ देखो। दूर कुछ आश्रम जैसा दिख तो रहा है। कदाचित वही होगा।”

दोनों उस दिशा में चल पड़े। 

एक अत्यंत छोटी कुटिया के समीप दोनों रुके। कुटिया के द्वार पर एक साधु सा व्यक्ति अपने कार्य में व्यस्त था। 

“स्वामीजी, नमस्ते।”

शैल के अभिवादन के प्रत्युत्तर में स्वामीजी ने कहा, “नमस्ते। आप दोनों अतिथि प्रतीत हो रहे हैं। यात्रा से थके होंगे। आइए, भीतर आइए। थोड़ा विश्राम कर लें। जल पान कर लें। तब तक मैं भोजन का प्रबंध करता हूँ।”

“धन्यवाद स्वामीजी।” सारा के साथ शैल भीतर गया। 

प्रवेश करते ही दोनों चौंक गए। एक कोने में पड़े चित्र को देख सारा ने पूछा, “स्वामीजी यह चित्र किसका है?”

“मेरे गुरु जी का। लाहोर में उनका आश्रम था।”

“जिसे विधर्मियों ने नष्ट कर दिया था? गुरु जी का वध कर दिया था? वही न?”

“जी, यही तो हुआ था उनके साथ। किन्तु आप यह कैसे जानती हैं?”

“मैं लाहोर से हूँ। मेरा परिवार गुरु जी से सदैव आशिष प्राप्त करता रहता था।”

“आप गुरु भक्त हैं? आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई।”

“किन्तु स्वामीजी, हमें आश्चर्य हो रहा है।” शैल ने सशंक कहा। 

“कैसा आश्चर्य?” 

“इस स्थान पर कुछ दिन पूर्व भी हम आए थे।”

“इसमें आश्चर्य की क्या बात है?”

“तब यहाँ जो था वह आज कहीं नहीं है। यही आश्चर्य की बात है।”

“क्या तात्पर्य है?”

“मैं बताती हूँ। जब हम यहाँ आए थे तब यहाँ एक विशाल आश्रम था। अनेक कक्ष थे। हम जिस गुरु जी से मिले थे वह भी स्वयं को इसी गुरुजी के शिष्य बताते थे। उसने हमें नाम से ही पहचान लिया था। यहाँ तक कि जब मैं और मेरा परिवार हिन्दू थे तब बचपन का मेरा जो नाम था मुझे उसी नाम से संबोधित भी किया था। वह जो आश्रम था वह लाहोर के आश्रम के समान ही था। पश्चिम दिशा वाले कक्ष में हमने रात्री निवास किया था। स्वामी जी ने हमसे अनेक बातें की थी। किन्तु आज इस स्थान पर कुछ भी नहीं है।”

“बस, आपकी यह एक कुटिया ही है। न जाने वह कहाँ लुप्त हो गया?” 

शैल और सारा की बातें सुनकर स्वामीजी हंसने लगे। उनके हास्य में प्रसन्नता थी। कुछ क्षण वह हँसते रहे। उनका इस प्रकार हँसना शैल और सारा को नहीं खला। उस हास्य में उन्हें उस स्वामीजी के होने का भास होने लगा। 

स्वामीजी ने हँसना रोककर कहा, “धन्य हैं। आप दोनों धन्य हैं।” दोनों को कुछ समझ नहीं आया तो स्वामीजी को देखते रहे। 

“आप दोनों को स्वयं गुरुजी का साक्षात्कार हो गया। मैं तो दशकों से साधना में लगा हूँ किन्तु मुझ पर अभी तक गुरुजी की कृपा नहीं हुई है।” 

“इस प्रकार हमें गुरु जी का दर्शन देना किस बात का संकेत है? इन घटनाओं का अर्थ क्या है?” शैल ने पूछा। 

“इसका अर्थ है कि गुरु जी ने अपने योगबल से लाहोर के मूल आश्रम का अनुभव करवाया है। स्वयं आपसे बात की है। गुरु कृपा से बड़ी कोई कृपा नहीं हो सकती।”

“हम पर ऐसी कृपा क्यों?”

“गुरु जी ने आपसे कोई विशेष बात की थी क्या?”

“विशेष? विशेष तो ...।” सारा ने प्रयास किया किन्तु उसे स्मरण नहीं हो सका। 

“एक बात उन्होंने कही थी कि हम जिस रहस्य का उत्तर जानना चाहते हैं वह हमें अवश्य मिलेगा। किन्तु ...।” शैल ने कहा। 

“किन्तु वह रहस्य आप दोनों अकेले प्राप्त नहीं कर सकते। इस हेतु आपको अन्य दो व्यक्तियों का साथ मिलेगा तभी यह संभव होगा।” संत ने बाकी बात कही। 

“ऐसा ही कहा था गुरु जी ने। आपने यह सब कैसे जाना?” सारा ने पूछा। 

“इतनी कृपा तो गुरु जी ने मुझ पर की है।” स्वामीजी हंस पड़े। 

“किन्तु यह सब हुआ कैसे? क्या कोई भ्रमणा थी या सत्य? या कोई चमत्कार था?” शैल ने आशंका व्यक्त की। 

“सब सत्य था। कोई भ्रमणा नहीं। चमत्कार या जादू जैसा कुछ नहीं होता इस संसार में।”

“तो वह क्या था?”

“सत्य। सत्य ही था।”

“वह सत्य अब कहाँ है?”

“सत्य अपना कार्य कर चुका। पश्चात विलुप्त हो गया।”

“यह तो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। ऐसा कैसे संभव हो सकता है?”

“कोई भी बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध नहीं होती है।”

“किन्तु यह तो ...।”

“हम प्रकृति के नियमों को कितना जानते हैं?”

“विज्ञान के नियमों का ज्ञान है हमें। यही प्रकृति के नियम हैं।”

“यह हमारी मिथ्या अवधारणा है, शैल और सारा। प्रकृति के जिस नियम से हमारा परिचय नहीं है उसका अर्थ यह नहीं है कि उस नियम का अस्तित्व ही नहीं है। प्रकृति के जिन नियमों को हम जानते हैं वह तो केवल अंशमात्र भी नहीं है। हमारा विज्ञान जिन नियमों की बात करता है, जानता है वह अति अल्प ज्ञान ही है। और जिसका हमें ज्ञान नहीं है उसका अस्तित्व नहीं ऐसा मानना हमारी अल्प मति है। 

प्रकृति अपने नियमों को जानती है, भली भांति मानती भी है। विज्ञान के नियम जैसे गुरुत्वाकर्षण का नियम, गति के नियम आदि हमारे जानने से पहले भी विद्यमान थे। उसी का अनुसरण प्रकृति युगों युगों से करती आ रही है। आपने जो अनुभव किया था वह भी प्रकृति के नियम के अंतर्गत ही है, किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। केवल उस नियम से हम अनभिज्ञ हैं।”

“अर्थात प्रकृति का रहस्य अगाध है?”

“नि:संदेह।”

“ठीक है स्वामीजी। गुरुजी ने हमें कहा था कि दो और व्यक्ति हमारे साथ जुड़ेंगे तब हम रहस्य तक पहुँच सकेंगे। कौन हैं वे दो व्यक्ति जो साथ जुडने वाले हैं? कैसे हैं? कहाँ, कब, कैसे मिलेंगे?” 

“और हमें अब क्या करना चाहिए उस पर भी हमारा मार्गदर्शन कर दें तो?” सारा। 

“गुरु कृपा रही तो अवश्य मार्गदर्शन करूंगा। किन्तु वह सब भोजन के पश्चात। अभी भोजन कर लो।”

स्वामीजी ने भोजन परोसा। दोनों ने ग्रहण किया। तृप्त हो गए। 

“आप दोनों नीम के वृक्ष के नीचे विश्राम करें। मैं अभी वहाँ उपस्थित होता हूँ।”

दोनों नीम के वृक्ष तले आ गए। अपना अपना स्थान देख बैठ गए। 

“इतना सारा भोजन और इतना स्वादिष्ट! कुछ तो है स्वामीजी की इस कुटिया में। बड़ी बड़ी भोजन शाला में बड़े बड़े व्यंजन का स्वाद लिया है किन्तु इस सादे भोजन के स्वाद के समान कुछ नहीं। क्या विशेष बात होगी इसमें?”

“शैल, आश्रमों के भोजन ऐसे ही होते हैं, उनकी तुलना अन्य किसी से क्या करनी?”

“ऐसा क्या है?” 

“धान की शुद्धधता और आश्रमवासियों के मन की निर्मलता। बस और कुछ नहीं।”

“सत्य कह रही हो सरिता।” स्वामीजी ने आते हुए कहा। दोनों खड़े हो गए। 

“बैठे रहिए।” स्वामीजी ने आसन ग्रहण किया पश्चात दोनों बैठ गए। 

“आप दोनों के लिए गुरु जी का संदेश है।”

“क्या है?”

“पूर्व की भांति आप दोनों नदी के साथ साथ उलटी दिशा में नदी के मूल तक यात्रा करो। उसी दिशा में आपको आपके प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे।”

“कहाँ तक चलना होगा? कब तक चलना होगा?”

“कब उत्तर मिलेंगे?” 

“कब वे अन्य दो व्यक्ति जुड़ेंगे?”

“शांत हो जाओ। इतने सारे प्रश्नों का होना स्वाभाविक है। किन्तु इस समय आपके लिए गुरुजी का यही आदेश है। वे दोनों जुड़ जाएंगे, बस आप अपने मार्ग पर चलते रहिए।”

“क्या उन दोनों के बिना ...?”

“नहीं हो सकता। उन दोनों के बिना लक्ष्य प्राप्ति नहीं हो सकती।”

“किन्तु हमें ...।”

“उन दो व्यक्तियों की चिंता त्याग कर लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो। लक्ष्य का मार्ग स्वयं समय समय पर मार्गदर्शन करेगा। जाओ, अब विलंब न करो और कार्य आरंभ करो।”

“गुरुजी, मुझे तो सात दिन में देश छोड़कर जाना है। इन सात दिनों में हमारा लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा न?”

“इस देश को छोड़कर तुम कहीं नहीं जाओगी, कभी नहीं।”

“वह कैसे संभव होगा?”

“कुछ प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में रहने दो, सरिता।” स्वामीजी ने सस्मित कहा। उस स्मित का स्वीकार करते हुए दोनों फिरोजपुर लौट आए।