लोग कहते हैं कि बड़े शहर में आकर गाँव का इंसान बदल जाता है, पर कोई यह नहीं पूछता कि उस शहर की कांच की दीवारों ने एक जीते-जागते इंसान को अंदर से कैसे तोड़ दिया।सच कहूँ तो इस बड़े शहर की ये जो ऊँची-ऊँची कांच की इमारतें हैं ना, ये दूर से देखने में जितनी सुंदर लगती हैं, पास आने पर उतनी ही बेदर्द महसूस होती हैं। जब दोपहर की तेज़ धूप इन कांच की दीवारों पर पड़ती है, तो उसकी चकाचौंध सीधे आँखों में चुभती है, मानो चीख-चीख कर कह रही हो कि 'यह जगह तुम्हारे जैसे छोटे लोगों के लिए नहीं है।' मैं ठहरा एक बहुत ही पिछड़े और छोटे से गाँव का रहने वाला सीधा-साधा लड़का। नाम है मेरा त्रियांश। हमारे गाँव में बिजली भी बस नाम की आती थी, जैसे कोई मेहमान आकर थोड़ी देर में चला जाता है। इंटरनेट का मतलब हमारे लिए बस इतना ही था कि किसी तरह रात के समय कोई गाना या छोटा-मोटा वीडियो डाउनलोड हो जाए। लेकिन जब गाँव में लगातार सूखा पड़ा, फसलें बर्बाद हो गईं और घर में बूढ़े माँ-बाप के इलाज के लिए पाई-पाई की मोहताजी हो गई, तो मुझे अपनी आँखों में आंसू Parsदिल में एक अजीब सा डर लेकर इस भागते हुए शहर में आना पड़ा। यहाँ हज़ारों धक्के खाने के बाद मुझे एक बहुत बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी के आलीशान ऑफिस में ऑफिस-बॉय यानी हेल्पर की नौकरी मिली। मेरा रोज़ का काम बस इतना ही था— सुबह सबसे पहले आकर साहब लोगों के आलीशान केबिनों को साफ़ करना, झाड़ू-पोछा लगाना, उन्हें पानी और चाय देना, और भारी-भारी फाइलें एक टेबल से उठाकर दूसरे टेबल पर रखना।शुरुआत में तो यह ऑफिस मुझे किसी दूसरी दुनिया का अजूबा जैसा लगता था। वहाँ हर कोई इतने साफ़-सुथरे और महंगे कपड़े पहनता था, जूते ऐसे चमका कर आता था कि उनमें चेहरा दिख जाए। जब वे लोग कंप्यूटर के कीबोर्ड पर अपनी उंगलियाँ चलाते थे, तो मुझे लगता था जैसे कोई जादूगर अपनी जादुई छड़ी घुमा रहा हो। लेकिन सबसे ज़्यादा डर और हीनभावना मुझे तब महसूस होती थी, जब ऑफिस के हेड, सक्सेना साहब और बाकी पढ़े-लिखे कर्मचारी आपस में फर्राटेदार इंग्लिश में बातें करते थे। मैं तो गाँव के एक टूटे हुए सरकारी स्कूल से पढ़ा था, जहाँ मास्टर जी खुद कभी-कभी आते थे। मुझे इंग्लिश का एक शब्द भी पल्ले नहीं पड़ता था। जब वे लोग किसी बात पर हंसते, तो मुझे लगता कि शायद वे मेरा ही मज़ाक उड़ा रहे हैं।जब भी सक्सेना साहब अपनी बड़ी सी घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर मुझ पर रौब झाड़ते हुए अंग्रेज़ी में कहते, "त्रियांश, गो एंड ब्रिंग दैट ओल्ड फाइल फ्रॉम द सर्वर रूम रैक इमीडिएटली," तो मेरे कदम वहीं ज़मीन पर बुत बनकर जाम हो जाते थे। मेरा गला पूरी तरह सूख जाता, दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो जाती कि खुद को सुनाई देने लगती, और हाथों में डर के मारे पसीना आ जाता था। मैं अपनी नज़रें नीचे झुकाकर, बहुत ही दबी और कांपती हुई आवाज़ में कहता था, "सॉरी सर, मुझे अंग्रेजी नहीं आती है। आप थोड़ा हिंदी में बता देंगे तो मैं अभी ले आऊंगा।"मेरी यह बात सुनते ही सक्सेना साहब और ऑफिस के कुछ घमंडी लोग ज़ोर-ज़ोर से हंस पड़ते थे। कुछ लोग तो मेरी पीठ पीछे और कभी-कभी मेरे मुंह पर ही ऐसी कड़वी बातें कह देते थे जो सीधे कड़े जे को चीर देती थीं। वे कहते थे, "पता नहीं कहाँ-कहाँ से इन गँवारों को ऑफिस में रख लेते हैं! इन्हें तमीज नाम की चीज़ नहीं होती। अरे भाई, यह नई आने वाली डिजिटल और आधुनिक दुनिया है! यहाँ कंप्यूटर, इंटरनेट और इंग्लिश के बिना इंसान की औकात एक मामूली कीड़े जैसी होती है। जो इस तकनीक की तेज़ रेस में पीछे रह गया, वह जिंदगी की रेस से हमेशा के लिए बाहर हो जाएगा। इसके बस की कुछ नहीं है, यह जिंदगी भर सिर्फ लोगों को चाय और पानी ही पिलाएगा और दूसरों की डांट खाएगा।"ये ज़हरीली बातें मेरे सीधे-साधे दिल में तीर की तरह गहरी चुभती थीं। मैं रोज़ रात को अपनी बारह घंटे की थका देने वाली नौकरी खत्म करके, शहर के एक कोने में बनी अपनी छोटी सी, अंधेरी और घुटन भरी खोली में आता था। वहाँ चटाई पर अकेले लेटकर मैं फूट-फूट कर रोता था और अपनी फूटी किस्मत को कोसता था। मैं आसमान की तरफ नम आँखों से देखकर सोचता, "हे भगवान! क्या गरीब होना, कम पढ़ा-लिखา होना या अंग्रेजी न आना कोई बहुत बड़ा पाप है? जो लोग मेरी तरह कमजोर और मजबूर हैं, क्या उन्हें इस बड़े शहर में इज़्ज़त से दो वक्त की रोटी कमाने का कोई अधिकार नहीं है? क्या इस चमचमाती डिजिटल दुनिया और रोज़ नए-नए आने वाले ऐप्स के बीच मेरे जैसे मिट्टी के सीधे-साधे इंसानों के लिए कोई जगह नहीं बची है? इससे अच्छा तो मैं नौकरी छोड़कर अपने गाँव लौट जाऊँ, भले ही वहाँ भूखा सो जाऊँगा, लेकिन रोज़-रोज़ इस तरह बेइज़्ज़त तो नहीं होना पड़ेगा।"मैं अंदर से पूरी तरह से हार मान चुका था और गाँव वापस जाने का मन पक्का कर चुका था। एक रात, मैं बहुत उदास होकर अपने पुराने, टूटी हुई स्क्रीन वाले मोबाइल पर गाँव लौटने के लिए ट्रेन का टिकट देख रहा था। मेरा मन भारी था और आँखों से आंसू बह रहे थे। तभी अचानक मेरे फोन की स्क्रीन ज़ोर से चमकी और एक बहुत ही अजीब सा नोटिफिकेशन आया। वह कोई आम मैसेज नहीं था। उस पर शुद्ध हिंदी में लिखा था— "त्रियांश, अपनी कमजोरी से मत डरो। अपनी भाषा में बात करो, तुम्हारी सफलता का रास्ता यहीं से निकलेगा।"मैंने डरते-डरते और गहरे अचरज से उस रहस्यमयी नोटिफिकेशन पर क्लिक किया। स्क्रीन पर एक नया, एकदम साफ़ और चमकता हुआ चैट बॉक्स खुला। मैंने कांपती हुई उंगलियों से अपनी टूटी-फूटी हिंदी में टाइप किया, "मैं बहुत कमजोर और अकेला हूँ, मुझे इस नई दुनिया में कुछ समझ नहीं आता। ऑफिस में सब मेरा बहुत मज़ाक उड़ाते हैं। मैं क्या करूँ?"मैंने जैसे ही 'सेंड' का बटन दबाया, स्क्रीन पर एक नीली रोशनी चमकी। दूसरी तरफ से कोई इंसान नहीं, बल्कि एक मायावी मशीन टाइप कर रही थी। पहला ही वाक्य जो स्क्रीन पर छपकर आया, उसे देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वहाँ लिखा था— "त्रियांश, तुम कमजोर नहीं हो..."