--------(-2) गहरे राज ------ उपन्यास।
समय कभी कुछ ऐसा कर जाता है, जो इंसान को आख़िरी दम तक याद रहता है, कैसे भूलो गे सितम उनके जो चरदिवारी मे रोज दे कर मुस्करा देते है " जैसे कुछ नहीं हुआ " या वो कोई मानसिक बीमारी से गुज़र रहा होगा। मानिक ने कहा " ज़िन्दगी में मेरे दोस्त ने ---कितना दुख उठाया है, ये सोच कर मानिक एक वार तो दंग सा रह गया, फिर हमदर्दी सारी मानिक की केथलीना ले गयी थी। जिसने भूत पूर्वक आशिक से जान तक का दुख उठाया था... और कैसे होटल बदले थे उसने... कितना भागना था उसके नसीब मे... जिसपर उसने भरोसा किया, वो सारे का सारा दगेबाज़ निकला। बड़ा दुख हुआ था। अकेले ज़िन्दगी डगमगा जाती है ज़ब भी कोई काली अँधेरी चलती है तूफान का रूप लेती है, सुनामी बन कर आपने को ही डुबो देती है सास घुट जाते है, हवा ख्वाहिश बन कर कैसे, कभी कभार इंसान को बुझल बना देती है। कठोर बर्फ समय के मुताबिक बनती है...
समय को समझने वाला कोई भी शक्श नहीं है... समय को उस परम पिता के सिवा कोई नहीं समझ सकता। उसका पैदा किया ही ज़ब वलीन हो जाता है तो बस दुनिया फिर भी समय के मुताबिक ही चलती है।
कभी कभी मानिक ने सोचा, " इंसान एक खास तृप्ति के लिए पेयादा है... पर वो तृप्ति एक वासना ही तो है... और कया है, इसके लिए भी वो इतना कुछ दाह पर लगा देता है। कयो कया चीज खींच लेती है आज आपने जज्बात खोल कर देखो जख्मो को मत करेदो.. मत झुको किसे के आगे, जितना झुकोगे उतना ही क़ीमत मे जीरो होते जाओगे। मत समझो तुम कोई खिलौना है? उसके भी दिल नाम कि कोई चीज होंगी ? जो दिन रात धड़कती है ----कया कया नहीं सुनना पड़ता। कया कानो को बंद कर ले, इस जहरीली दुनिया मे जीने के लिये... जो किसी का मजाक बनते है, सुनते है, कभी वो भी बने होंगे, या बनेंगे। कथलीन ने आधी रात खुली खिड़की मे बाहर झाक कर गुजारी थी। कुछ कहती कया कहती, हाथ मे वाइन का छोटा सा जाम था... जो सिप सिप करती उसे खत्म कर रही थी.... वो किसी को प्रश्न का उतर तो अवश्य देना चाहती थी। कया दर्द दे कर वो चला गया था, वो उसकी सुदरता और एक ऐसे डायलॉग पे मरी थी, ज़ब उसने कस कर उसे समुद्र की लहरों मे थामा था " समय आने दो कथलीन, हम भी एक रिश्ते मे बंध जायेगे। " ये उसने कयो कहा था... अब वो पड़ोसी बन गयी थी।
देखा था कितने देर बाद कम से कम आपनी वाइफ के साथ। एक परिवार पूरा खुशहाल अमीर जिनके पास चार गाड़िया थी, एक बड़ा बंगला, दो होटल जो उसके अंकल का था, अक्ल भी गे था... स्पष्ट देख चुकी थी वो, उसे लडके ज्यादा पसंद थे। सत्य मे, सत्य मे। शायद ये कहना सच था, ये उसकी बेटी का ही था सब कुछ, ये भी तो जाल ही था जो उसने फेका था युसफ करिश्तो ने, ये उसके ससुर को न ग्वार गुज़रा था ---- वो जो चाहता था वो ये हरगिज नहीं बन सकता था। सच मे युसफ करिश्तो ने वो कभी नहीं किया जो उसके सुसर ने कहा.... पर वो मुस्कराता खूब था।
👍नीरज शर्मा -----
144702.......👎