Banaras ki khamoshi - 1 in Hindi Love Stories by Neha kariyaal books and stories PDF | बनारस की ख़ामोशी - 1

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बनारस की ख़ामोशी - 1

कानपुर 
जहां गंगा की हल्की हवा के संग आधुनिक शहर की हलचल मिलती है। यहां के कॉलेजों की गलियों में युवा उम्मीदों की खुशबू बस्ती है। और भीड़ भाड़ वाले बाजारों में जीवन की रंगीन कहानियां छिपी हुई हैं। इस शहर में नए और पुराने का अद्भुत संगम है– जहां संस्कृति और उम्मीदें साथ साथ चलती है।

नैना जो बनारस से कानपुर पढ़ने आई थी। एक खुश मिजाज और सुलझी हुई लड़की थी, उसे प्रकृति से बहुत लगाव था उसका बस एक ही सपना था पढ़ लिख कर एक अच्छी सी नौकरी करना और इसके लिए वो मन लगा कर अपनी परीक्षा की तैयारी कर रही थी। 

सब कुछ अच्छा चल रहा था कि एक दिन नैना जल्दी जल्दी तैयार हो कर अपने कॉलेज के लिए निकली, क्योंकि आज उसे परीक्षा के लिए कुछ नोर्स चाहिए थे।
वह जब कॉलेज के अंदर पहुंची, तो कॉलेज के गेट पर खड़ा एक फूलों का पेड़ हवा से झूमने लगा।
उस पर लगे फूल बरसाने लगे,, जैसे कॉलेज में नैना का स्वागत कर रहे हो। 
अपने ऊपर फूलों की बरसा देख कर नैना बहुत ख़ुश हुई,, और मन ही मन सोचने लगी,,  आज इन फूलों ने मेरे दिन को और भी खूबसूरत बना दिया है।
 उसने वहां से थोड़े फूल लिए और अपनी क्लास की ओर चली गई।
जैसे ही वह कॉलेज के परिसर में पहुंची। उसका पैर किसी चीज़ में अटक गया और वो ज़मीन पर गिर गई। अपने ही ख्यालों में खोई हुई नैना ये समझ नहीं पाई, कि ये क्या हो रहा है?
तभी किसी ने उससे पूछा क्या तुम ठीक हो? ये सुनकर उसने देखा,, तो सामने समीर खड़ा था। जो उसे उठने के लिए बोल रहा था,, वह चुप चाप उसे देखती रही। 
समीर ने उसे फिर से कहा… क्या तुम ठीक हो? 
वह हड़बड़ा कर बोली हां मैं ठीक हूँ,, बस पैर अटक गया था। उसने अपना सामान उठाया और खड़ी हो गई। 
नैना तुम्हें ध्यान से चलना चाहिए था। देखो.. यहां एक सीढ़ी है शायद तुमने देखा नहीं,, समीर ने कहा।
नैना थोड़ी दवे स्वर में बोली तुम सही बोल रहे हो मेरा ध्यान ही नहीं था। चलो कोई बात नहीं मैं ठीक हूँ। 
 फिर वे दोनों क्लास में चले गए।
समीर और नैना दोनों एक की क्लास में पढ़ते थे दोनों क्लासमेट्स थे।
 जब वे क्लास में पहुंचे तो प्रोफेसर परीक्षा की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे थे। वे दोनों चुप जाकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गए और प्रोफेसर की बात ध्यान से सुनने लगे। लेक्चर खत्म होने के बाद प्रोफेसर क्लास से चले गए। 
नैना अपने नोर्स पढ़ने लगी। सभी एक दूसरे से कुछ ने कुछ मालूम कर रहे थे। कोई पढ़ाई की बात कर रहा था तो कोई इधर उधर की। 

कॉलेज के बाद समीर और नैना साथ में ही घर आ रहे थे क्योंकि चौराहे तक उनका रास्ता एक ही था। 
समीर बोला… मुझे तो पेपर की टेंशन हो रही है,, पता नहीं क्या होगा? सब अच्छा होगा परेशान मत हो, नैना ने कहा। अपने आप पर भरोसा रखो और खूब मेहनत करो। 
अच्छा एक बात बताओ… यहां से पहले तुम कहां रहते थे? समीर, 
समीर:  हमारा कोई परमानेंट घर नहीं है जहां पिताजी का ट्रांसफर होता है वहीं चले जाते हैं।
वैसे इससे पहले हम दिल्ली में रहते थे। पिता जी का ट्रान्सफर हुआ इसलिए कानपुर रहने आगये।
वहां तो परीक्षा को लेकर इतनी टेंशन नहीं होती थी। पता नहीं यहां क्यों हो रही है?
नैना मुस्कुरा कर बोली दिल्ली के हो कर भी पेपर से डरते हो। मुझे देखो सबकुछ ऊपर वाले पर छोड़ रखा है,, बस दिन रात पढाई करती हूं जिससे अच्छे नंबरों से पास हो जाऊं। 
उसकी बात सुनकर समीर भी हँसने लगा।
उसने पूछा तुम यहां किस के साथ रहती हो? नैना बोली... बुआ के साथ रहती हूँ।
जब कॉलेज की पढ़ाई पूरी हो जाएगी तो मैं वापस अपने घर बनारस लौट जाऊंगी। 
समीर ने पूछा? लगता है… तुम्हें बनारस बहुत पसंद है। 
नैना सुकून भरी आवाज में बोली… बनारस की तो बात ही अलग है,, वैसे कानपुर भी बुरा नहीं है।
समीर: सही कहा अपने घर की बात ही अलग होती है। 
बातों बातों में चौराहा भी आ गया।
 नैना ने समीर को कहा ठीक है.. कल मिलते हैं। फिर वे दोनों अपने अपने घर की ओर चल पड़े।

नैना घर आ कर अपने कमरे में चली गई और पलंग पर बैठ कर कॉलेज का काम करने लगी। 
वो अपने काम में इतनी व्यस्त हो गई थी कि उसे खाना खाने की याद नहीं रही।
थोड़ी देर बाद जब नैना की बुआ सुनीता कमरे में आई तो उन्हों ने देखा नैना थक कर सो गई है और उसका सामान पूरे बेड पर बिखरा हुआ था।
सुनीता ने उसका सामान समेट कर पास में रखी एक मेज पर रख दिया।
और नैना के बालों को सहलाते हुए बोली मेरी बच्ची कितनी मेहनत करती है। 
उन्होंने धीरे से नैना को उठाया और उसे खाना खाने के लिए बोला। नैना आज बहुत थक चुकी थी।
उसने खाना खाने से मना कर दिया और बोली बुआ थोड़ी देर बाद खालुंगी अभी तो मुझे बहुत नींद आ रही है।
सुनीता ने कहा ठीक है जब उठ जाओ तो आ जाना। मैंने खाना बना कर रख दिया है।
इतना कह कर वह कमरे से बाहर निकल आई।
उधर समीर भी अपने घर पहुंचने के बाद अपना काम कर रहा था। तभी उसकी मां उसके पास आकर बोली… तो बेटा कैसा रहा? तुम्हारे आज कॉलेज का दिन समीर ने कहा ठीक था मां, बस सभी लोग परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं।
 मां ने धीरे से पूछा… इस कॉलेज में आए तुम्हें बहुत दिन हो गए हैं। अब तो तुम्हारे नए नए दोस्त भी होंगे।
समीर ने कहा अभी तक तो नहीं मां पर सब लोग बहुत अच्छे हैं, और सभी एक दूसरे की काम में मदद भी करते हैं। 
मां बोली ठीक है चलो,, अब थोड़ा आराम कर लो। तुम भी थक गए होंगे। 
समीर अपने कमरे में चला गया और उसकी मां फिर से अपने काम में लग गई।

शाम के पांच बज चुके थे और नैना अभी तक सो रही थी। दिन ढलने को था सूरज की किरणें कमरे में सुनहरी धूप की तरह फैल रही थी, हर चीज को मृदु और शान्त बना रही थी।
खिड़की के पास बैठी चिड़ियों की चहचहाट से नैना की नींद खुल गई।
उसे लगा शायद अभी शाम ढलने में समय है। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने लगी घड़ी पर पड़ी।
तो वह जल्दी जल्दी उठी और अपने कमरे से बाहर आई… बाहर कोई नहीं था। 
चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। बुआ कहीं भी नहीं थी।
 उसने बुआ को पूरे घर और बाहर आंगन में भी ढूंढा लेकिन उसे वह कहीं नहीं मिली। 
 फिर नैना के मन में ख्याल आया शायद सुनीता बुआ बाजार सामान लेने गई होंगी।
ये सोच कर नैना छत पर घूमने चली गई क्योंकि उसे सूर्यास्त बहुत पसंद था वो नजारा जो आंखों में सिर्फ सुकून दे जाए। जब वह छत पर पहुंची तो उसने देखा… उसकी बुआ कुर्सी पर बैठी है। सूरज धीरे धीरे लाल नारंगी रंग में ढल रहा है, जैसे उसके दिल की बेचैनी आसमान में घुल रही हो। वह खामोश बैठी बस आसमान को देख रही थी जैसे किसी की कमी उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही हो। 
वहीं मेज पर दो कप चाय के रखे हुए थे, उसमें से निकलती भाप हवा में मिल रही थी। सब कुछ शांत था।
बुआ को देख कर नैना मुस्कुराई और मन ही मन कहने लगी। ये लो मैंने इन्हें कहां कहां नहीं ढूंढा और ये हैं कि यहां बैठकर आसमान को निहार रही हैं। 
फिर वह बुआ के पास जा कर बैठ गई। उसने एक लम्बी सांस ली। एक बात पूंछू? थोड़ी व्यक्तिगत है। 
सुनीता ने सिर हिलाया। आप क्यों अकेले चुप चाप बैठी रहती हो। कुछ तो छुपाती हो ना? 
सुनीता ने बड़ी सहजता से कहा… ऐसा कुछ भी नहीं है।
 नैना ने पूछा? आप हर बार मेरे सवाल को मुस्कुराकर टाल देती हो। लेकिन मैंने आपकी आंखों में एक सच्चाई, एक खामोशी देखी है। 
जिसे आप अक्सर हँस कर छुपा लेती हो।
 सुनीता थोड़ी हँसी, बोली तुम आज कैसी बातें कर रही हो। ये लो तुम चाय पियो।
चाय का कप हाथ में लिए नैना ने कहा.. क्योंकि आपके चेहरे से ये साफ दिखाई देता है कि कुछ तो है जो आप बताना नहीं चाहती।
आज मुझे भी जानना है, आपकी मुस्कुराहट के पीछे की वो खामोशी, जिसे आप सबसे छुपा कर रखती हैं।
वो याद जो हर शाम आपको इस सूरज की ओर खींच लेती है।
नैना ने मासूमियत भरी आंखो से बुआ की और देखा।

आख़िर वो क्या बात थी जो सुनीता किसी को बताना नहीं चाहती थी...