अध्याय 1 : बारह बजने से पहले
सर्दियों की उस रात शहर रंग-बिरंगी रोशनियों में नहा रहा था। हर सड़क पर जश्न था। होटल, क्लब और फार्महाउस संगीत की तेज़ धुनों से गूँज रहे थे। हर कोई पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्वागत करने की तैयारी में था लेकिन उसी शहर के बाहर, घने साल के जंगलों के बीच बने पुराने सरकारी विश्राम गृह में एक ऐसा सन्नाटा पसरा था, जो किसी तूफ़ान के आने की सूचना दे रहा था। कमरा नंबर पाँच...दीवार घड़ी की सेकंड वाली सुई लगातार आगे बढ़ रही थी।
रात के 10 बजकर 47 मिनट।
दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।अंदर बैठे व्यक्ति ने बिना उठे कहा—"दरवाज़ा खुला है।"
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। गहरे भूरे रंग की शॉल में लिपटी एक महिला भीतर आई। उसने कमरे में प्रवेश करते ही पीछे मुड़कर देखा, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया।उसके चेहरे पर घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
"तुम देर से आई हो..."कुर्सी पर बैठा व्यक्ति मुस्कुराया।
वह था—महेश्वर प्रताप सिंह। राज्य का सबसे ताकतवर मंत्री। जिसकी एक आवाज़ पर अफसरों के तबादले हो जाते थे और जिसकी नाराज़गी से सरकार तक हिल जाती थी। महिला ने धीमे स्वर में कहा—
"रास्ते भर डर लगा... किसी ने देख लिया तो?"
महेश्वर हँस पड़ा।"मुझे मिलने आने वालों को कोई नहीं देखता... और अगर देख भी ले, तो बोलने की हिम्मत किसमें है?"
महिला ने उत्तर नहीं दिया।वह खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगी। बाहर घना अँधेरा था। दूर कहीं पटाखों की आवाज़ें आने लगी थीं। शहर नए साल का इंतज़ार कर रहा था लेकिन इस कमरे में समय जैसे ठहर गया था। महेश्वर उसके पास आया।
"प्रमीला..."
उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ना चाहा। प्रमीला ने हाथ पीछे खींच लिया।
"आज मुझे ज़्यादा देर नहीं रुकना है।"
"विक्रम?"
"वह पार्टी में है... लेकिन कब लौट आए, कहा नहीं जा सकता।"
महेश्वर मुस्कुराया।
"उसे तो लगता है कि उसकी पत्नी किसी सहेली के घर गई है।"
प्रमीला की आँखों में क्षणभर के लिए अपराधबोध झलका।
तभी...बाहर किसी वाहन के रुकने की आवाज़ आई। दोनों एक साथ चौंक पड़े। महेश्वर खिड़की तक गया। बाहर अँधेरा था। कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
"शायद चौकीदार होगा।"
उसने सहज बनने की कोशिश की लेकिन उसे भी पहली बार बेचैनी महसूस हुई। कमरे में लौटते समय उसने देखा—प्रमीला का चेहरा पीला पड़ चुका था।
"क्या हुआ?"
"मुझे अच्छा नहीं लग रहा..."
"डर रही हो?"
"हाँ..."
कुछ क्षण दोनों चुप रहे। दीवार घड़ी ने ग्यारह बजाए। ठीक उसी समय...कमरे की बिजली एक पल के लिए झपकी। फिर सामान्य हो गई। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और तभी...दरवाज़े के बाहर किसी के धीमे कदमों की आहट सुनाई दी। एक...दो...तीन...फिर सन्नाटा। महेश्वर तेज़ी से दरवाज़े की ओर बढ़ा। दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ लंबा बरामदा...और ठंडी हवा। उसे लगा जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से हटकर अँधेरे में छिप गया हो। वह वापस कमरे में लौटा लेकिन लौटते ही उसके कदम रुक गए। प्रमीला वहाँ नहीं थी। वह कमरे के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल चुकी थी। महेश्वर ने उसे पुकारना चाहा...उसी क्षण...पूरा शहर बारह बजने की उलटी गिनती करने लगा।
"दस... नौ... आठ..."
आतिशबाज़ी शुरू हो गई और उसी शोर में...विश्राम गृह के कमरे नंबर पाँच से एक दबा हुआ स्वर निकला—"नहीं...!"
फिर...एक भारी चीज़ गिरने की आवाज़।
उसके बाद...पूर्ण सन्नाटा।
शेष अगले अंक में........ प्रति मंगलवार
आलोक मिश्रा " मनमौजी"