**📖 हीरो...!**
**भाग 1 : पहली मुलाक़ात**
सुबह के ठीक 7:15 बजे शहर के एक शांत मोहल्ले में एक छोटी-सी आवाज़ गूँज उठी।
“दीदी… उठ जाइए ना… कॉलेज नहीं जाना क्या?”
दरवाज़े पर हल्के-हल्के लेकिन लगातार ठक-ठक हो रही थी। अंदर कमरे में बिस्तर पर कोई चादर ओढ़े लेटा था। कमरे में हल्की रोशनी थी। खिड़की से सुबह की पहली किरणें अंदर घुस रही थीं और दीवार पर टंगी बाइक की फोटो को छू रही थीं।
“दीदी… पाँच मिनट बोलते-बोलते आधा घंटा हो गया…”
आवाज़ और तेज़ हो गई। छोटी लड़की अब दरवाज़ा पीटने के साथ-साथ पैर भी पटक रही थी।
अचानक चादर हटी। छोटे-छोटे काले बाल बिखरे हुए थे। काली टी-शर्ट और ग्रे ट्रैक पैंट में एक लड़की उठी। नींद से भरी लेकिन बेहद शांत आँखें थीं उसकी। आँखों में न कोई गुस्सा था, न कोई जल्दबाजी। बस एक शांत थकान।
“रिया… अगर अभी भी दरवाज़ा पीटा ना…”
रिया मुस्कुराई। उसकी आँखों में शरारत चमक रही थी।
“तो क्या कर लोगी?”
अगले ही पल तकिया उड़कर दरवाज़े से टकराया। रिया खिलखिलाकर हँसते हुए नीचे भाग गई।
“मम्मी… दीदी जाग गईं…!”
बिस्तर पर बैठी लड़की ने गहरी साँस ली। उसने दोनों हाथों से चेहरा धोया और आईने के सामने खड़ी हो गई। आईने में एक साधारण चेहरा दिख रहा था—छोटे बाल, साफ त्वचा, और आँखें जो बहुत कुछ देख चुकी थीं लेकिन फिर भी शांत थीं।
उसका नाम था आर्या।
लेकिन पूरे शहर में शायद ही कोई उसे इस नाम से बुलाता था। सब उसे “हीरो” कहते थे।
क्यों?
क्योंकि आर्या को कभी किसी “लड़की” की तरह रहने का शौक नहीं था। ना लंबे बाल बढ़ाने की चाह, ना मेकअप की बोतलें, ना गहने, ना रंग-बिरंगी ड्रैसेस। उसे बाइक चलाना पसंद था। फुटबॉल खेलना पसंद था। किसी की मदद करना पसंद था। और सबसे ज़्यादा—दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना पसंद था।
नीचे पहुँचते ही उसकी माँ ने प्लेट सामने रख दी।
“नाश्ता कर लो।”
“लेट हो रही हूँ माँ…”
“रोज़ यही बोलती हो।”
“आज सच में…”
माँ ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दीं। उनकी आँखों में प्यार और थोड़ी सी हँसी दोनों थी।
“अच्छा… ये टिफ़िन ले जाओ।”
“माँ…”
“कोई बहाना नहीं।”
आर्या ने मुस्कुराकर टिफ़िन उठाया।
“यस मैम…”
माँ हँस पड़ीं।
“पता नहीं मेरी बेटी है या बेटा…”
आर्या ने आँख मारते हुए कहा—
“दोनों का कॉम्बो पैक हूँ।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“आज नया कॉलेज है। ध्यान रखना। और हाँ… किसी से झगड़ा मत करना।”
आर्या ने हल्के से सिर हिलाया।
“मैं झगड़ा नहीं करती माँ। बस रोकती हूँ।”
बाहर बाइक खड़ी थी। काली स्पोर्ट्स बाइक। आर्या ने हेलमेट पहना, इंजन स्टार्ट किया और धीरे से गली से निकल गई। सुबह की हवा उसके चेहरे पर लग रही थी। शहर जाग रहा था। दुकानें खुल रही थीं, स्कूली बच्चे भाग रहे थे, और आर्या चुपचाप कॉलेज की तरफ बढ़ रही थी।
उधर… शहर के दूसरे कोने में…
एक घर से ज़ोर-ज़ोर की आवाज़ें आ रही थीं।
“नहीं… मुझे आज भी वही गुलाबी क्लिप चाहिए…”
“मिशा… तुम अब कॉलेज जाती हो…”
“तो क्या हुआ?”
मिशा आईने के सामने खड़ी थी। उसने अपनी दोनों चोटियाँ पकड़कर खुद को देखा। गोल-गोल बड़ी आँखें, गुलाबी होंठ, चेहरे पर हर समय मुस्कान। उसने गुलाबी क्लिप लगाई और मुस्कुरा दी।
“मैं ऐसी ही अच्छी लगती हूँ।”
उसकी माँ ने माथा पकड़ लिया।
“हे भगवान… इतनी बड़ी हो गई लेकिन हरकतें पाँच साल की बच्ची जैसी हैं।”
मिशा मुस्कुरा दी।
“क्योंकि मैं स्पेशल हूँ…”
इतना कहकर उसने अपनी माँ के गाल पर किस किया और भाग गई। बैग उठाया—किताबों से ज़्यादा चॉकलेट भरी हुई थीं उसमें। दरवाज़े पर खड़े होकर उसने एक बार फिर आईने में देखा।
मिशा वर्मा।
उसे दुनिया की हर छोटी चीज़ में खुशी मिल जाती थी। तितली दिख जाए तो उसके पीछे भाग जाएगी। बारिश शुरू हो जाए तो भीगने लग जाएगी। केक दिख जाए तो बिना खाए नहीं मानेगी। और अगर कोई उदास मिले तो उसे हँसाने की पूरी कोशिश करेगी।
आज दोनों का कॉलेज का पहला दिन था।
लेकिन दोनों को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आज उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
कॉलेज…
सैकड़ों नए छात्र। हर तरफ़ भीड़। कोई फ़ोटो ले रहा था, कोई नए दोस्त बना रहा था, कोई अपनी क्लास ढूँढ रहा था। गार्डन में फूल खिले थे। मुख्य द्वार पर बैनर लगा था—“Welcome Freshers”。
तभी…
कॉलेज के मेन गेट पर एक काली स्पोर्ट्स बाइक आकर रुकी। इंजन की आवाज़ थम गई। हेलमेट उतरा।
और सबकी नज़रें एक साथ उसी तरफ़ चली गईं।
“यार…”
“ये लड़का है या लड़की?”
“लड़की है…”
“सीरियसली?”
“हाँ… देखो बाल छोटे हैं।”
“लेकिन चाल तो बिल्कुल…”
आर्या ने किसी की तरफ़ ध्यान भी नहीं दिया। बैग कंधे पर डाला और सीधे अंदर चली गई। उसे लोगों की बातें सुनने की आदत थी। सालों से सुन रही थी। कभी जवाब नहीं दिया। कभी पलटकर नहीं देखा। बस चलती रही।
उसी समय… दूसरी तरफ़…
“अरे… तितली… रुको…”
मिशा सच में एक पीली तितली के पीछे भाग रही थी। उसकी चोटियाँ हवा में उड़ रही थीं। बैग कंधे से लटक रहा था। आँखों में चमक थी।
“बस एक बार पकड़ लूँ… प्लीज़…”
तितली उड़ते-उड़ते कॉलेज के गार्डन से निकलकर मेन रास्ते पर आ गई। मिशा भी उसके पीछे दौड़ पड़ी। उसे ये भी याद नहीं रहा कि सामने से कोई आ रहा है।
धड़ाम…!
दोनों ज़ोर से टकरा गए।
मिशा पीछे गिरने ही वाली थी… कि किसी मज़बूत हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली।
उसकी आँखें बंद थीं। दिल तेज़ी से धड़क रहा था। धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं…
सबसे पहले उसे काली शर्ट दिखाई दी… फिर एक चेन… फिर सामने वही शांत चेहरा… छोटे बाल… गहरी आँखें… और हल्की-सी मुस्कान।
आर्या ने उसका हाथ छोड़ा।
“अब ठीक हो?”
मिशा कुछ सेकंड तक बस उसे देखती रह गई। जैसे कोई सपना देख रही हो।
“हैलो?”
“ह… हाँ…”
“दिखाई नहीं देता?”
मिशा ने मासूमियत से उँगली आगे की।
“दिखाई तो देता है… लेकिन तितली ज़्यादा सुंदर थी…”
आर्या ने पहली बार किसी को इतना मासूम जवाब देते सुना था। वह चाहकर भी अपनी हँसी नहीं रोक पाई। हँसी उसकी आँखों तक पहुँच गई।
“तो तितली मिल गई?”
मिशा ने उदास होकर सिर हिला दिया।
“नहीं… वो उड़ गई…”
आर्या ने आसमान की तरफ़ देखा। सूरज निकल चुका था। आसमान साफ था।
“कुछ चीज़ों को पकड़ने की कोशिश मत किया करो… उन्हें आज़ाद रहने दो…”
मिशा ने होंठ फुला लिए।
“लेकिन वो मेरी दोस्त बन सकती थी…”
आर्या फिर हँस दी। इस बार हँसी थोड़ी लंबी थी।
“तुम हर किसी को दोस्त बना लेती हो क्या?”
मिशा ने बिना सोचे जवाब दिया—
“हाँ… क्योंकि दोस्त ज़्यादा होंगे तो खुशियाँ भी ज़्यादा होंगी।”
आर्या कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने पहली बार किसी को इतनी सादगी से खुशियों की परिभाषा देते सुना था। आसपास की भीड़, शोर, सब कुछ एक पल के लिए दूर हो गया था।
उसी समय कॉलेज की घंटी बज गई।
“ओह… मैं लेट हो गई!”
मिशा घबरा गई। भागते-भागते अचानक वापस मुड़ी।
“वैसे… थैंक यू… मुझे गिरने नहीं दिया…”
आर्या ने बस सिर हिलाया।
“ध्यान से जाना… बाय…”
मिशा हाथ हिलाते हुए भाग गई। उसकी चोटियाँ फिर से हवा में उड़ने लगीं। आर्या वहीं खड़ी उसे जाते हुए देखती रही।
पहली बार… किसी अजनबी को देखकर उसके चेहरे पर बिना वजह मुस्कान आई थी।
और उधर… भागते-भागते मिशा भी मन ही मन बुदबुदाई—
“ये लड़की… नहीं… ये तो सच में किसी फिल्म की हीरो लगती है…”
कक्षा में पहुँचकर मिशा ने अपनी सीट संभाली। दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा था। तितली तो नहीं मिली, लेकिन कुछ और मिल गया था। कुछ ऐसा जो उसके दिमाग से उतर ही नहीं रहा था।
वहीं आर्या ने अपनी क्लास ढूँढ ली। वह खिड़की के पास बैठ गई। बाहर गार्डन दिख रहा था। वही गार्डन जहाँ थोड़ी देर पहले एक छोटी-सी लड़की तितली के पीछे भाग रही थी।
आर्या ने खिड़की से बाहर देखा और हल्के से मुस्कुरा दी।
शायद आज का दिन सिर्फ कॉलेज का पहला दिन नहीं था।
शायद आज कुछ और शुरू हो रहा था।
कुछ ऐसा… जो दोनों की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था।
…जारी रहेगा (भाग 2)
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