यह कहानी पूरी तरह से मेरी अपनी कल्पना पर आधारित है। कई बार ऐसी घटनाएं हमारे समाज में घटती रहती हैं, यह उसका एक अक्स मात्र हो सकता है। मेरी दो हिट उपन्यासों 'द मिस्ट्री ऑफ स्केलेटन लेक' और 'कलयुग के योद्धा' के बाद, अपना तीसरा उपन्यास 'ऋणानुबंध' आपके सामने प्रस्तुत करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है।
इस कहानी के नाम से ही आप समझ सकते हैं कि इसमें किसी का ऋण (कर्ज) चुकाने की बात होगी, लेकिन आप नायक और नायिका की जगह खुद को रखकर सोचिएगा कि अगर आप इस जगह होते, तो क्या यह 'ऋणानुबंध' चुका पाते?
बस एक बात का अफसोस है, मेरे स्वर्गीय पिता जी यह कहानी नहीं पढ़ पाएंगे। मैं अपना यह उपन्यास अपने स्वर्गीय पिता जी को समर्पित करता हूँ।
लि. पार्थिव पटेल 'अवनिश'
********** उपन्यास प्रारंभ **********

राजस्थान के एक अत्याधुनिक मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल की तीसरी मंजिल। आमतौर पर अस्पताल के गलियारों में मरीजों के कराहने या डॉक्टरों के जूतों की आवाज गूंजती है, लेकिन आज यह पूरी मंजिल किसी सैन्य छावनी में तब्दील हो गई थी। चारों तरफ फैली दवाओं और स्पिरिट की तेज गंध के बीच एक भारी, दम घोंट देने वाला सन्नाटा पसरा हुआ था।
आई.सी.यू. (ICU) रूम नंबर 07 के बाहर का दृश्य किसी हॉलीवुड थ्रिलर फिल्म को भी टक्कर मारने वाला था। कमरे के बाहर, कॉरिडोर में और अस्पताल के मुख्य दरवाजे तक राउंड-द-क्लॉक (24*7) पुलिस का कड़ा पहरा लगा हुआ था। बुलेटप्रूफ जैकेट पहने और हाथों में ऑटोमैटिक AK-47 राइफल ताने ब्लैक-कैट कमांडोज की आंखें किसी भूखे बाज की तरह चारों तरफ घूम रही थीं। जैसे अंदर देश के किसी हाई-प्रोफाइल, खूंखार आतंकवादी या किसी अति-महत्वपूर्ण VVIP इंसान का इलाज चल रहा हो, वैसी 'Z-Plus' लेवल की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। बिना सख्त चेकिंग के किसी भी डॉक्टर या नर्स को अंदर जाने की सख्त मनाही थी।
लेकिन इतनी भयंकर सुरक्षा के बीच, अंदर बेड पर कोई मंत्री या आतंकवादी नहीं लेटा था... वहाँ लेटा था एक साधारण सा दिखने वाला युवक, जिसका नाम था— सौरभ मीनाबेन पाटीदार।
कमरे के अंदर सिर्फ दो ही आवाजें थीं—एक सेंट्रल एसी (AC) की धीमी, बर्फीली भिनभिनाहट और दूसरी, मरीज के बेड के पास रखी लाइफ-सपोर्ट सिस्टम और ECG मशीन की एकतरफा, डरावनी...
'बीप... बीप... बीप...' आवाज।
सफेद चादर के बीच सौरभ का बेहद घायल, क्षत-विक्षत और पीला पड़ चुका शरीर पड़ा था। उसके सिर पर पट्टियों की मोटी परत लिपटी हुई थी, जिनमें अभी भी ताजे बहे खून के सूखे हुए काले धब्बे दिखाई दे रहे थे। सांस लेने के लिए मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ था और हाथ-पैर की नसों में कई जीवनरक्षक नलियां (IV tubes) लगी हुई थीं। बाहर से देखने पर ऐसा लगता था जैसे यह कोई लाश है, जिसे मशीनों के जरिए सिर्फ सांसें दी जा रही हैं। सौरभ एक गहरे, कभी वापस न लौट सकने वाले कोमा (Coma) में चला गया था।
आई.सी.यू. के उस पारदर्शी कांच के दरवाजे से बिल्कुल चिपक कर बाहर चार जिंदगियां पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी थीं। उनमें से एक औरत कोई और नहीं, बल्कि सौरभ की मां मीनाबेन थीं। एक जमाने में अपने रूप और खुद्दारी से दुनिया को झुकाने वाली वह औरत, आज अपने जवान बेटे को इस हालत में देखकर पूरी तरह टूट चुकी थी।
मीनाबेन से लिपटकर एक युवा, खूबसूरत लड़की फूट-फूट कर रो रही थी। वह थी खुशी... सौरभ की खुशी! जिसके चेहरे पर हमेशा एक मासूम मुस्कान खेलती रहती थी, उस खुशी की दुनिया आज जैसे इस कांच के दरवाजे के पीछे मशीनों के सहारे अंतिम सांस ले रही थी। खुशी मीनाबेन के कंधे पर सिर रखकर अपनी सिसकियां रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। सौरभ को इस अचेत अवस्था में देखकर उसकी सांसें घुट रही थीं।
इन दोनों को टूटने से बचाने के लिए उनके पास एक और अधेड़ उम्र की औरत खड़ी थी। वह औरत मीनाबेन के सिर और खुशी की पीठ पर लगातार हाथ फेरकर उन्हें ढांढस बंधा रही थी। उसकी अपनी आंखों में भी दर्द का समंदर छलक रहा था, लेकिन इस वक्त वह अपना दर्द अंदर दबाकर, मजबूत बनकर मीनाबेन का सहारा बन रही थी। वह कोई और नहीं, बल्कि खुशी की मां अंजलिबेन थीं!
सौरभ और खुशी... इन दोनों की जिंदगी में एक अनकही समानता थी। इन दोनों को इनकी शेरनी जैसी माताओं ने अकेले अपने दम पर, दुनिया की अनगिनत ठोकरें खाकर आत्मनिर्भर और मजबूत बनाया था। क्योंकि इन दोनों युवाओं ने बचपन में ही अपने सिर से पिता का साया और प्यार खो दिया था।
इन दोनों परिवारों ने अपनी जिंदगी में बेइंतहा दुखों, गरीबी, संघर्षों और तूफानों का सामना किया था, और फिर भी डटकर खड़े रहे थे। लेकिन... आज...आज आई.सी.यू. के इन बंद दरवाजों के पीछे मौत से जूझ रहे सौरभ को देखकर लगा यह सदमा, उन सबकी सहनशक्ति से बाहर था।
अतीत के सारे दर्द आज इस एक दर्द के सामने बौने लग रहे थे। जिंदगी की बड़ी-बड़ी जंग जीत लेने वाली ये दो माताएं, आज नियति के इस क्रूर मजाक के सामने बिल्कुल बेबस और लाचार हो गई थीं।
मीनाबेन की आंखों से आंसू बह-बह कर अब सूख चुके थे, लेकिन उनके दिल का विलाप पूरे अस्पताल की दीवारों को कंपा रहा था। उनकी फटी, डरी हुई आंखें लगातार सौरभ के ऑक्सीजन मास्क पर टिकी थीं। 'अब क्या होगा? क्या मेरा बेटा कभी होश में आएगा? या फिर जिंदगी भर इन मशीनों के सहारे... एक जिंदा लाश बनकर रह जाएगा?' मीनाबेन के मन में उठ रहे ये सवाल उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहे थे। पास खड़ा आदमी भी लाचार नजरों से यह चीख-पुकार देख रहा था, उसकी अपनी आंखों में भी एक अनकहा डर छिपा था।
अंदर, कमरे का दरवाजा खोलकर एक सीनियर न्यूरोसर्जन दाखिल हुए। उन्होंने सौरभ की आंखें खोलकर उस पर टॉर्च की तेज रोशनी डालकर चेक किया, लेकिन पुतलियों में कोई हलचल नहीं थी। कोई प्रतिक्रिया नहीं। उन्होंने पास खड़ी नर्स की तरफ देखकर एक गहरी सांस छोड़ी और बेहद धीमी, चिंताजनक आवाज में कहा,
"शरीर के बाहरी घाव तो भर रहे हैं सिस्टर, लेकिन पेशेंट अभी कोमा से बाहर आने का कोई संकेत नहीं दे रहा है। इसके ब्रेन मॉनिटर (Brain Monitor) के ग्राफ जरा ध्यान से देखो... यह बता रहा है कि इसका दिमाग अभी भी शांत नहीं है।
बाहर से भले ही इसका शरीर बेहोश है, लेकिन अंदर इसका अर्धजागृत मन कोई भयंकर युद्ध लड़ रहा है! इसकी नसों में खून के साथ कोई अज्ञात खौफ दौड़ रहा है। जैसे यह किसी काली यादों के, किसी दर्दनाक इंतकाम के चक्रव्यूह में फंस गया है!"
डॉक्टर बिल्कुल सही थे। सौरभ का शरीर भले ही अस्पताल के उस बर्फीले बिस्तर पर जकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा, उसका दिमाग... वह इस वक्त इस कमरे में नहीं था!
अस्पताल की उस मौत जैसी शांति के बीच, डॉक्टर के शब्द पूरे होते ही अचानक ब्रेन मॉनिटर पर चलती ग्राफ की लाइनें भयंकर गति से ऊपर-नीचे होने लगीं।
'बीप... बीप... बीप...' की आवाज अब खतरे की घंटी की तरह तेज हो गई।
कोमा के उस घने अंधकार में भटकते सौरभ के दिमाग में अचानक एक जानलेवा ट्रॉमा अटैक (Trauma Attack) का भयानक बवंडर उठा! उसके कानों में अचानक हवा की सनसनाहट सुनाई देने लगी।
आई.सी.यू. की सफेद लाइटें अचानक झपक कर किसी काली SUV गाड़ी की तेज हेडलाइट्स में बदल गईं! उसकी बंद आंखों के पीछे कोई स्पष्ट दृश्य नहीं था, लेकिन एक मौत का काला साया मंडरा रहा था। एक के बाद एक धुंधली और डरावनी झलकियां उसके दिमाग के पर्दे पर बिजली की तरह कौंध रही थीं।
सबसे पहले उसे दिखाई दे रहे थे माउंट आबू के वे कातिल, लहूलुहान मोड़... उस पहाड़ी खाई में धमाके के साथ जलती हुई जीप... जमीन पर पड़ी वह खून से सनी डायरी... और अचानक, अंधेरे से बाहर आता इंस्पेक्टर झाला का वह डरावना चेहरा! उसके बाद एक खूंखार, राक्षसी अट्टहास उसके कानों में गूंजने लगा—अनिकेत चौहान का चेहरा!
लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। ये दृश्य अचानक एक विशाल और अधिक डरावने रूप में बदलने लगे।
धुंधले अंधकार में से किसी अंतरराष्ट्रीय डॉन की परछाई उभरी... मानव अंगों की तस्करी करने वाला एक बेहद खूंखार कार्टेल (Cartel)! उसी अंधकार से बाहर आती 20 रशियन सैनिकों की एक 'डेथ स्क्वाड', जिनके हाथों में आधुनिक और घातक हथियारों के लेजर पॉइंटर्स अंधेरे को चीर रहे थे।
दूसरे ही सेकंड एक नया दृश्य कौंधा... उस डेथ स्क्वाड के सामने मोर्चा संभाले खड़े 30 से 40 हथियारबंद CRPF जवान और ब्लैक यूनिफॉर्म में सजे 'चेतक कमांडोज'!
'खच... क्लिक...'
अर्धजागृत मन में अचानक दर्जनों ऑटोमैटिक राइफल्स के लॉक खुलने की वह सिहरन पैदा करने वाली आवाज गूंजी।
'धड़... धड़... धड़...'
कमांडोज के भारी जूतों की आवाजें उसके दिमाग पर हथौड़े की तरह बजने लगीं। इन आवाजों के साथ ही, अस्पताल के उस बर्फीले बिस्तर पर बेजान पड़े सौरभ की धड़कनें अचानक भयंकर तरीके से बढ़ने लगीं। तभी उस धुंधले बवंडर के बीच एक भयानक चेहरा उभरा... एक ऐसी परछाई जिसके होठों के बीच सुलगती महंगी सिगार का लाल धुआं हवा में उड़ रहा था। उस सिगार की हल्की रोशनी में चमकता वह भयानक चेहरा और उस शैडो (Shadow) की बेहद शातिर, राक्षसी हंसी!
वह हंसी जैसे सौरभ की आत्मा को चीर रही थी।
और फिर... फ्लैशबैक का सबसे हृदयविदारक और डरावना झटका! एक बूढ़ी औरत और एक बूढ़ा आदमी... दोनों के चेहरे गर्म लाल खून से सने हुए थे। उनकी आंखों में मौजूद बिना आवाज की वह चीख सौरभ के दिमाग की नसें फाड़ रही थी।
इन धुंधले लेकिन भयानक दृश्यों के बवंडर ने सौरभ के शरीर को पूरी तरह से जकड़ लिया। उसका पीला पड़ा शरीर अस्पताल के उस बर्फीले बिस्तर पर हवा में उछलकर जोर-जोर से झटके खाने लगा। जैसे कोई अदृश्य शैतानी ताकत उसकी जान खींच रही हो, वह सांस लेने के लिए तड़पने लगा। उसकी सांस लेने की गति तेज हो गई, छाती धौंकनी की तरह फूलने लगी।
आई.सी.यू. के बाहर खड़ी मीनाबेन और खुशी के मुंह से डर के मारे एक चीख निकल गई। बाहर सुरक्षा में खड़े ब्लैक-कैट कमांडोज भी अलर्ट हो गए, उनकी बंदूक पर पकड़ और मजबूत हो गई।
तुरंत ही आई.सी.यू. का कांच का दरवाजा धकेलकर एक सिस्टर (नर्स) और डॉक्टर दौड़कर अंदर आए। स्थिति को हाथ से निकलता देख सिस्टर ने तुरंत सौरभ की नस में लगी आईवी ट्यूब (IV tube) में एक हाई-डोज ट्रैंक्विलाइज़र (मरीज को तुरंत शांत करने का इंजेक्शन) दे दिया।
दवा का असर खून में मिलते ही, चंद सेकंडों में सौरभ का कांपता और तड़पता शरीर धीरे-धीरे वापस उसी सफेद चादर पर शांत होकर गिर पड़ा। कोमा के उस गहरे सन्नाटे में, सौरभ की बिस्तर पर पड़ी निर्जीव सी उंगलियां थोड़ी मुड़ीं और उसकी बंद मुट्ठी अचानक ढीली पड़ गई। उसकी सांसों की गति फिर से नॉर्मल हो गई।
शरीर भले ही शांत हो गया था, लेकिन उस इंजेक्शन ने उसके दिमाग को एक गहरी, शून्य अवस्था में धकेल दिया था। अब उसका अर्धजागृत मन भटकना बंद करके एक ही जगह पर मजबूती से स्थिर हो गया था। एक ही जगह... एक ही याद... एक ही शुरुआत!
अब सौरभ एक ऐसे गहरे फ्लैशबैक में जा रहा था, जहां से इस पूरी बर्बादी की नींव रखी गई थी। अतीत के वे लहूलुहान पन्ने एक के बाद एक किसी थ्रिलर फिल्म की तरह उसकी बंद आंखों के पीछे जीवंत हो रहे थे।
सौरभ के दिमाग में एक ही आग सुलग रही थी—जब तक उस काली रात का पूरा सच उसकी नजरों के सामने नहीं आएगा, जब तक उस शैतान को उसके कर्मों की भयानक सजा नहीं मिलेगी... तब तक सौरभ इस कोमा के अंधकार से बाहर आने वाला नहीं था!
अंतरराष्ट्रीय कार्टेल का वह शैडो कौन है? फ्लैशबैक में दिखाई दे रहे वे बूढ़े दादा-दादी कौन हैं? रशियन सैनिक यहां क्या कर रहे हैं? एक साधारण से युवक के कालभैरव बनने के सफर में ऐसा कौन सा भूकंप आया जिसने उसे सीधे अस्पताल के आई.सी.यू. में धकेल दिया?
इन सवालों के जवाब एक ही जगह छिपे थे। सिस्टर के उस इंजेक्शन के बाद सौरभ के दिमाग की टेप पीछे घूमकर ठीक उसी जगह जाकर रुक गई, जहां से इस रक्तरंजित खेल, इस 'ऋणानुबंध' के पहले अध्याय की शुरुआत हुई थी।
माउंट आबू!
हाँ... माउंट आबू ही वह मनहूस जगह थी। जिन पहाड़ों पर लोग हंसने-खेलने और छुट्टियां बिताने जाते हैं, उन्हीं पहाड़ों ने सौरभ की जिंदगी में मौत का तूफान ला दिया था। सौरभ की मौत और जिंदगी के बीच की यह हालत, आई.सी.यू. का यह बिस्तर, उसके परिवार के आंसू... इन सब घटनाओं के पीछे और कुछ नहीं, बल्कि सिर्फ माउंट आबू की वह पिकनिक... वह मासूम सा दिखने वाला सफर ही जिम्मेदार था!
'टाइगर पाथ हिल' (Tiger Path Hill)!
वही घना जंगल और वही पहाड़ी रास्ता, जिसने सौरभ की नियति हमेशा के लिए बदल कर रख दी।
28 साल पुराने रहस्य, अटूट वफादारी और खून खौला देने वाले इंतकाम के इस भयानक सफर की यह तो सिर्फ एक शुरुआत थी... यहां से शुरू होता है सौरभ के अर्धजागृत मन में कैद, मौत के मुंह तक ले जाने वाला वह सफर...
(क्रमशः)
क्या आप जानना चाहेंगे एक सीधेसादे लड़के के साथ क्या हुआ के वो इतनी बुरी तरह से ज़ख्मी होके कोमा में चला गया ? वो जो भी देख रहा है वो खतरनाक लोग कौन है ?
अगर यह पहले भाग पर ३० से अधिक कमेंट आई तो में पूरी उपन्यास प्रकाशित करूंगा ।
यह कहानी मेरी गुजराती उपन्यास का अनुवाद है जो गूगल जेमिनी द्वारा किया गया है । कोई गलती पर ध्यान दौरने के लिए मेरी गुजारिश है ।
तो कमेंट में बताइए कहानी की शुरुआत आपको कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताइएगा और आपकी प्रतिक्रियाओं (Reviews) का स्वागत है!
मुझे यकीन है कि आपका यह सफर बहुत रोमांचक रहेगा। आपके कमेंट्स और राय का हमेशा स्वागत है।