अलसुबह का समय था। वातावरण में कोहरा छाया हुआ था और कोहरे के कारण आसपास एकदम ठंडक फैली हुई थी। माउंट आबू हिल स्टेशन के किसी ऊंचे पर्वत पर स्थित थोड़े समतल भाग पर आठ-दस टेंट लगे हुए थे। ये टेंट माउंट आबू शहर की आबादी से काफी ऊंचाई पर होने के कारण, यहाँ से दूर माउंट आबू की लाइटें दिखाई दे रही थीं।
वातावरण में मौजूद कोहरे के कारण वे लाइटें आसमान में टिमटिमाते तारों जैसी लग रही थीं। अभी भी आसमान में बादलों के पीछे छिपा चाँद कभी-कभी क्षितिज पर ओझल हो जाता तो कभी-कभी दिखाई दे रहा था।
मानो किसी कन्या को देखने कोई युवक आया हो और कन्या चुपके-चुपके झाँक रही हो, ऐसे चाँद लुकाछिपी खेल रहा था।
इतनी ऊँची जगह पर इंसान को भी पैदल आते हुए साँस फूल जाए ऐसा था, तो यह सब टेंट का सामान, खाने का सामान और अन्य चीजें यहाँ लाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था।
बुनियादी जरूरत की चीजें यहाँ मुश्किल से पहुँच पाती थीं, तो फिर बिजली की तो बात ही क्या करनी?
बिजली मिलना तो यहाँ असंभव था! टेंट से थोड़ी ऊपर दूसरी समतल जगह पर खाने के लिए बैठने की व्यवस्था की गई थी और वहाँ सोलर लाइट लगाई गई थी, ताकि दिन भर सूरज की गर्मी से चार्ज हुआ बल्ब रात के अंधेरे में उपयोग में लिया जा सके।
सभी ट्रैकर्स को सुबह पाँच बजे इस जगह पर हाजिर होना था और नाश्ता करके आगे की ट्रैकिंग के लिए निकलना था।
इसलिए माउंट आबू पर ट्रैकिंग करने आए ट्रैकर्स की सूरज उगने से पहले ही चहल-पहल शुरू हो गई थी। सबके हाथ में टॉर्च थी, सब उठकर ब्रश करके फ्रेश होने लगे। पहाड़ पर वेस्टर्न स्टाइल वॉशरूम नहीं होते हैं, बस कमोड के चारों ओर टेंट लगाकर खड़ा किया गया स्ट्रक्चर होता है, क्योंकि पहाड़ पर लोग सुविधा के लिए नहीं बल्कि शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण काम यानी ट्रैकिंग का मजा लेने जाते हैं।
वॉशरूम में ऐसी अद्भुत व्यवस्था थी कि अगर आप दरवाजे की जगह बनाए गए चेन वाले पर्दे बंद करने के बजाय साइड पर खुले छोड़ दें, तो प्राकृतिक क्रिया के साथ-साथ सामने मौजूद अद्भुत नजारा देख सकते हैं और सूर्योदय का भी मजा ले सकते हैं!
कुछ समय बाद सभी ट्रैकर्स सुबह का नाश्ता करने पहुँचे। नाश्ता देखकर सब एक पल के लिए आश्चर्यचकित रह गए।
इतनी सुबह-सुबह गरमागरम छोले-पूरी, अचार और उसके बाद चाय और बॉर्नविटा या कॉफी तो थी ही। नाश्ता खत्म करके सभी ट्रैकर्स टाइगर पाथ हिल पर जाने के लिए तैयार थे। दोपहर के भोजन की सामग्री भी सबने साथ ले ली थी।
आगे चल रहे गाइड सबको रास्ता दिखा रहे थे और चेतावनी दे रहे थे कि सबके एक हाथ में टॉर्च होनी चाहिए और दूसरा हाथ खाली होना चाहिए, ताकि अगर कोई गलती से फिसल जाए तो दूसरे हाथ से बैलेंस बना सके।
कोहरे वाला वातावरण होने के कारण आसपास देखकर चलने की भी सलाह दी, क्योंकि यहाँ अक्सर साँप या अन्य जहरीले जीव-जंतु निकलने की संभावना रहती है। आगे गाइड और पीछे ट्रैकर्स की लाइन चल रही थी। अभी भी अंधेरा होने के कारण आसपास कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था, बस धीरे-धीरे सब आगे बढ़ रहे थे।
चढ़ाई एकदम सीधी और कठिन होने के कारण चढ़ने में बहुत तकलीफ हो रही थी और थोड़ी-थोड़ी देर में रुकने की जरूरत पड़ रही थी।
ट्रैकिंग का एक नियम है कि जितनी दूरी अंधेरे में तय होगी, उतनी सूरज की रोशनी में नहीं होगी; इसलिए गाइड साथ चल रहे लड़के-लड़कियों को जल्दी चढ़ाई पूरी करने के लिए समझा रहे थे।
अब धीरे-धीरे दूर क्षितिज पर केसरिया रंग दिखाई दे रहा था जो सूर्योदय से पहले का समय दर्शा रहा था। अब ट्रैकिंग के अंतिम पड़ाव पर पहुँचने से पहले एक जगह पर आधे घंटे का हॉल्ट (विराम) था और वहाँ सूर्योदय देखने के लिए रुकना था।
धीरे-धीरे पूर्व दिशा के आसमान में रंगों की रंगोली सजने लगी। केसरिया रंग और गहरा हो गया और ऐसा आभास होने लगा मानो आसमान में किसी ने सोने का वर्क चढ़ा दिया हो।
थोड़ी ही देर में दो पहाड़ों के बीच से सूर्यनारायण ने झाँका। सूरज की पहली सुनहरी किरण जब पहाड़ों पर पड़ी ओस की बूंदों पर पड़ी, तो पूरा पहाड़ मानो अनगिनत हीरों से जड़ गया हो, ऐसे चमक उठा।
अलसुबह की ठंडी हवा की लहरों के बीच सूरज की गुनगुनी किरणों ने ट्रैकर्स की थकान को पल भर में गायब कर दिया। बादलों से घिरे शिखरों पर से सूरज को उगते देखने का यह नजारा इतना अद्भुत और मनोहर था कि हर कोई मंत्रमुग्ध होकर बस उसे निहारता ही रहा। यह दृश्य देखकर चढ़ाई की सारी थकान मानो हवा में पिघल गई।
जब सूरज लगभग सिर पर आ गया, उस समय ट्रैकर्स टाइगर हिल पर पहुँच गए थे। वहाँ पहले से ही दोपहर के भोजन के लिए टेंट लग चुके थे।
खाना खाने में अभी थोड़ा समय होने के कारण, गाइड ने सबको आसपास साइटसीन के लिए इस शर्त पर अनुमति दी कि सब ग्रुप में ही रहेंगे और आसपास ही रहेंगे, कोई दूर नहीं जाएगा।
ट्रैकिंग में सौरभ भी अपने कॉलेज के दोस्तों सागर, यश, खुशबू, जानवी, रिद्धि, रजनी आदि के साथ आया था। सब आसपास घूम रहे थे और साथ-साथ तस्वीरें भी खींच रहे थे। इन खूबसूरत यादों को कैमरे में कैद कर रहे थे।
सौरभ मस्ती में खुशबू को किसी लड़के के नाम से चिढ़ा रहा था, इसलिए खुशबू उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ रही थी। काफी मेहनत के बावजूद खुशबू सौरभ को पकड़ नहीं पा रही थी, जिससे उसे गुस्सा आ रहा था।
भागदौड़ के बीच वो लोग बहुत दूर आ पहुंचे थे और इसी भागदौड़ के बीच अचानक सौरभ का पैर फिसल गया और सौरभ वहाँ नीचे गहरी खाई में लुढ़क पड़ा और सबके मुँह से एक भयानक चीख निकल गई। दो पल के लिए सबकी जुबान तालू से चिपक गई, किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी। सब सुन्न रह गए।
लेकिन सौरभ की किस्मत अच्छी थी कि वहाँ गहरी खाई शुरू होने से पहले पत्थर का एक छोटा-सा छज्जे जैसा हिस्सा था, जो ऊपर से दिखाई नहीं देता था लेकिन घर की बालकनी की तरह पहाड़ से थोड़ा बाहर निकला हुआ था और उसके आगे से ही सीधी गहरी खाई शुरू होती थी। सौरभ उस छज्जे पर अटक गया था। सौरभ ने नीचे से आवाज दी:
"मैं सुरक्षित हूँ! कोई रस्सी या ऐसा कुछ हो तो ले आओ या गाइड को बुला लाओ।"
सौरभ की बात सुनकर खुशबू ही सबसे पहले उनके गाइड को बुलाने दौड़ी। वे लोग हँसी-मजाक करते हुए काफी दूर निकल गए थे, इसलिए खुशबू उनके गाइड ऋषि सर को बुलाकर लाए इसमें थोड़ा समय लगने वाला था। इसलिए सौरभ ने वहाँ खड़े-खड़े ही डरने के बजाय आसपास का निरीक्षण करके प्रकृति के सौंदर्य को निहारना शुरू किया।
सौरभ जिस जगह पर फँसा था, वहाँ से नीचे की खाई का नजारा भयानक होने के साथ-साथ अत्यंत आकर्षक था और साथ ही रोमांचक भी!
खाई इतनी गहरी थी कि नीचे केवल घने हरे पेड़ों का जंगल और कोहरे के सफेद बादल ही दिखाई दे रहे थे। पहाड़ों की श्रृंखला मानो एक-दूसरे के गले मिल रही हो, ऐसे अडिग खड़ी थी।
दूर कहीं से किसी झरने के कल-कल बहने की आवाज पहाड़ों की इस शांति में मधुर संगीत बिखेर रही थी। चट्टानों की दरारों से उग आए जंगली फूल हवा के थपेड़े खाकर भी मुस्कुरा रहे थे। एक तरफ एक कदम चूके तो जान का खतरा था, और दूसरी तरफ प्रकृति का ऐसा अद्भुत और रौद्र सौंदर्य छाया हुआ था!
सौरभ एक पल के लिए अपना डर और जान का खतरा भूलकर इस विहंगम और रोमांचक दृश्य में पूरी तरह खो गया। पहाड़ों की इस विशालता के सामने उसे अपना अस्तित्व बिल्कुल एक बिंदु के समान लग रहा था।
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माउंट आबू के ट्रैकिंग कैंप में घूमने के लिए निकले युवा सौरभ के साथ ऐसा तो क्या हुआ होगा कि वह बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्टेल के संपर्क में आ गया होगा। यह सवाल स्वाभाविक है।
लेकिन यह राज जानने में लगेगी देर, पर आएगा मज़ा। शुरुआत जितनी साधारण है, अंत उतना ही खौफनाक!
(क्रमशः)
पाठक मित्रों, यह कहानी मेरे लिए पुरानी शराब जैसी है, चढ़ेगी धीरे-धीरे से पर नशा पूरा देगी। पूरी कहानी पढ़कर आप अचंभित रह जाएँगे।
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आप मेरी दूसरी पूरी प्रकाशित उपन्यास "द मिस्ट्री ऑफ स्केलेटन लेक" प्रतिलिपि पर पढ़ सकते हैं।