तीसरी कक्षा में पहुँचते-पहुँचते विभा के मन में एक सवाल उठने लगा—
“हमें पढ़ना क्यों जरूरी है?”
वह सोचती, आखिर सभी लोग एक जैसे क्यों नहीं होते?
कुछ बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे थे। उनके टेस्ट में अच्छे अंक आते, शिक्षक उनकी प्रशंसा करते और वे हर काम जल्दी सीख लेते। लेकिन विभा के साथ ऐसा क्यों नहीं था?
उसके मन में बार-बार यही सवाल उठता—
“मेरे नंबर दूसरों से कम क्यों आते हैं? मैं दूसरों की तरह होशियार क्यों नहीं हूँ? मैं उनसे पीछे क्यों रह जाती हूँ?”
यह सवाल धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगा।
वह किसी से कुछ कहती नहीं थी। अपनी परेशानी के बारे में माँ को भी बताने से बचती। उसे लगता था कि अगर माँ को पता चला कि वह पढ़ाई को लेकर परेशान है, तो माँ भी चिंता करने लगेंगी।
विभा की माँ अपनी बेटी को सफल देखना चाहती थीं। वह चाहती थीं कि उनकी बेटी जीवन में आगे बढ़े, अपने पैरों पर खड़ी हो और एक दिन अपनी अलग पहचान बनाए।
लेकिन माँ के इन सपनों के बीच विभा अपने भीतर ही भीतर कुछ और महसूस कर रही थी।
वह दोस्तों के साथ रहती थी, उनके साथ हँसती थी, बातें करती थी, खेलती थी—फिर भी कई बार उसे ऐसा लगता जैसे वह भीड़ में होकर भी अकेली है।
उसे लगता था कि उसके मन की बात समझने वाला कोई नहीं है।
उसकी दोस्तियाँ भी धीरे-धीरे उसे उलझाने लगी थीं।
विभा चुप रहती।
वह दोस्ती खोना नहीं चाहती थी, लेकिन अपने मन की स्वतंत्रता भी नहीं खोना चाहती थी।
कभी-कभी दोस्ती में ऐसी बातें भी कही जाती हैं, जो कहने वाले के लिए केवल मज़ाक होती हैं, लेकिन सुनने वाले के मन में वे बहुत गहरी जगह बना लेती हैं।
बचपन में दोस्त कभी-कभी एक-दूसरे के रंग, रूप या शारीरिक बनावट को लेकर भी टिप्पणी कर देते हैं—
“तुम बहुत पतली हो।”
“तुम बहुत मोटी हो।”
“तुम्हारा रंग साँवला है।”
“तुम्हारी आँखें ऐसी क्यों हैं?”
कहने वाला हँसकर तुरंत कह देता—
“अरे, मैं तो मज़ाक कर रहा था।”
लेकिन सामने वाला बच्चा उस समय उस बात को केवल मज़ाक की तरह नहीं ले पाता। वह उन शब्दों को अपने भीतर कहीं रख लेता है।
धीरे-धीरे उसे अपने ही रूप को लेकर संकोच होने लगता है। वह दूसरों से स्वयं की तुलना करने लगता है और कभी-कभी अपने भीतर यह सवाल भी उठने लगता है—
“क्या मुझमें सचमुच कोई कमी है?”
बचपन में कही गई ऐसी बातें किसी बच्चे के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए दोस्ती में मज़ाक भी ऐसा होना चाहिए, जिससे किसी के मन को चोट न पहुँचे।
विभा भी धीरे-धीरे यह समझने लगी थी कि दोस्ती केवल साथ रहने या हर बात मान लेने का नाम नहीं है। दोस्ती में एक-दूसरे की भावनाओं और सीमाओं का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है।
समय बीतता गया।
विभा धीरे-धीरे बड़ी होती गई और सातवीं कक्षा में पहुँच गई।
यहीं उसकी मुलाकात निशा से हुई।
निशा और विभा की दोस्ती की शुरुआत एक बहुत छोटी-सी घटना से हुई।
एक दिन निशा ने देखा कि विभा पेन को बाकी बच्चों से थोड़ा अलग तरीके से पकड़ती है।
ऐसा नहीं था कि विभा को पेन पकड़ना आता ही नहीं था। वह लिख सकती थी, लेकिन उसका तरीका अलग था।
निशा ने उसे प्यार से समझाया और पेन पकड़ने का दूसरा तरीका बताया।
विभा ने उसकी बात ध्यान से सुनी और फिर उसी तरह पेन पकड़ने की कोशिश की।
वह छोटी-सी बात विभा के मन में रह गई।
धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होने लगी।
अब निशा उसकी सबसे अच्छी दोस्तों में से एक बन गई थी।
वे साथ बैठतीं, बातें करतीं, पढ़तीं और छोटी-छोटी बातें एक-दूसरे से साझा करतीं।
विभा को लगा था कि शायद उसे आखिरकार एक ऐसी दोस्त मिल गई है, जो उसे समझ सकेगी।
लेकिन समय के साथ दोस्ती का एक दूसरा रूप भी सामने आने लगा।
वह चाहती थी कि विभा उसी से अधिक बात करे, उसी की बात माने और वही करे जो उसे अच्छा लगे।
कभी-कभी निशा की बात विभा को अच्छी नहीं लगती, लेकिन वह दोस्ती बचाने के लिए चुप रह जाती।
फिर भी उसके भीतर कुछ कहता—
“मैं दोस्ती निभाना चाहती हूँ, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं।”
विभा किसी के साथ रहना चाहती थी, पर किसी के बंधन में नहीं।
वह चाहती थी कि दोस्त उसे समझे, उसकी पसंद का सम्मान करे और उसे अपने जैसा बनने के लिए मजबूर न करे।
शायद विभा तब इतनी बड़ी नहीं थी कि इन भावनाओं को पूरी तरह शब्द दे सके।
लेकिन उसके मन में स्वतंत्रता की यह छोटी-सी चाह धीरे-धीरे मजबूत होती जा रही थी।
और उसे अभी यह नहीं पता था कि जीवन में आगे आने वाली कई दोस्तियाँ उसे यही सिखाने वाली थीं—
सच्ची दोस्ती वह नहीं, जिसमें हम किसी को अपने अनुसार बदल दें; सच्ची दोस्ती वह है, जिसमें हम एक-दूसरे को उसकी अपनी पहचान के साथ स्वीकार करें।
विभा के जीवन में दोस्ती का यह पहला गहरा अनुभव था।
उसे क्या पता था कि यही अनुभव आगे चलकर उसके व्यक्तित्व पर ऐसी छाप छोड़ेगा, जिसे वह वर्षों बाद भी अपने भीतर महसूस करेगी।