बांसुरी की वह धुन
भाग — प्रथम
भारत को आज़ाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे।
देश स्वतंत्र हो चुका था, लेकिन गाँवों की गरीबी अभी भी वैसी ही थी, जैसे आज़ादी की किरण पहाड़ों के उस पार कहीं रुक गई हो। पेट की आग, कर्ज का बोझ और अभाव से भरा जीवन करोड़ों लोगों की नियति बना हुआ था।
जिस धरती पर वीर सिद्धू-कान्हू मुर्मू ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका था, उसी संताल परगना के एक पहाड़ी इलाके में जिलिंग टांडी नाम का एक छोटा-सा गाँव था।
चारों ओर पहाड़ थे, घने जंगल थे और लाल मिट्टी की सँकरी पगडंडियाँ।
उसी गाँव में बिरसा मुर्मू का परिवार रहता था।
मिट्टी की दीवारें, फूस की छत और बाँस की किवाड़ वाला छोटा-सा घर।
घर के एक कोने में बड़ी-सी ढेंकी थी और उसके पास पत्थर की चक्की। बाँस की टोकरियों में धान, बाजरा और मड़ुआ रखा रहता। यही उस परिवार की संपत्ति थी।
उन दिनों गाँव की स्त्रियाँ दूर तालाब से पानी भरकर लाती थीं। उसी पानी से खाना बनता और वही पीने के काम आता। कुएँ और चापानल पूरे इलाके में गिने-चुने थे। गाँव तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं थी।
स्कूल भी किसी पक्के भवन में नहीं, कभी किसी पेड़ की छाँह में तो कभी किसी खुले आँगन में लग जाता था।
संताल समुदाय के अधिकांश परिवार पहाड़ियों और जंगलों के आसपास बसे थे। जंगल ही उनका बाजार था, जंगल ही उनका सहारा। लकड़ी, फल, कंद-मूल और पत्ते प्रकृति सहज ही दे देती थी। लोग गाय-बकरियाँ पालते और कहीं-कहीं सूअर भी रखते।
लेकिन प्रकृति के इतने निकट रहने के बाद भी गरीबी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा था।
कई घरों में तीन समय का भोजन भी निश्चित नहीं था।
बिरसा मुर्मू का परिवार भी खेती, मजदूरी और बकरी पालन पर निर्भर था। घर का प्रत्येक सदस्य श्रम करता था। किसी के पास आराम करने का समय नहीं था।
इसी परिवार में एक दिन एक बालक ने जन्म लिया।
उसका नाम रखा गया—रामलाल मुर्मू।
तीन भाई-बहनों में वह सबसे छोटा था।
रामलाल के जन्म पर बिरसा ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार चावल की हँड़िया बाँटी। गाँव के कुछ बुजुर्ग और पड़ोसी जुटे। किसी ने बच्चे को देखकर कहा—
“यह बालक बड़ा भाग्यवान लगता है। इसकी माँ को प्रसव के समय बहुत कष्ट नहीं हुआ। देखना, यह आगे चलकर लोगों का दुःख दूर करेगा।”
किसी ने इसे आशीर्वाद माना, किसी ने संयोग।
लेकिन उस दिन कही गई बात समय की स्मृतियों में कहीं गहरे दब गई।
किसे पता था कि वही वाक्य एक दिन इस बालक के जीवन का प्रश्न बन जाएगा।
माँ का आधा पेट
रामलाल धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।
घर में भोजन सीमित था, लेकिन माँ के प्रेम की कोई सीमा नहीं थी।
एक दिन रूपी मुर्मू ने माड़-भात की थोड़ी-सी मात्रा तीनों बच्चों के सामने रखी। बच्चों ने खाना शुरू किया।
रामलाल ने पूछा—
“माँ, तुम नहीं खाओगी?”
रूपी ने मुस्कराकर कहा—
“मैं तो पहले ही खा चुकी हूँ बेटा।”
रामलाल ने विश्वास कर लिया।
लेकिन रात में उसने देखा—माँ चुपचाप पानी पीकर सो गई थी।
उस दिन उसे पहली बार समझ में आया कि गरीबी केवल भूख का नाम नहीं है। गरीबी वह भी है जिसमें माँ अपने बच्चे के लिए अपना हिस्सा छिपा देती है।
पहाड़ के उस पार का स्कूल
गाँव से कुछ दूर, पहाड़ी के उस पार एक सरकारी स्कूल था।
रामलाल रोज बच्चों को किताबें लेकर जाते देखता।
उनके कंधों पर बस्ता होता, हाथ में स्लेट होती और पैरों में कभी-कभी जूते भी।
रामलाल दूर खड़ा उन्हें देखता रहता।
उसके भीतर भी पढ़ने की इच्छा उठती।
लेकिन इच्छा और परिस्थिति के बीच बहुत बड़ी दूरी थी।
उसे रोज बकरियाँ चराने ऊँची पहाड़ियों पर जाना पड़ता।
बिरसा अपनी पत्नी और बड़े होते बच्चों के साथ मजदूरी भी करता था। सरकार ने इलाके में मिट्टी और पत्थर की खुदाई का काम शुरू कराया था। मशीनें और डायनामाइट बहुत कम थे। लोग गैंती, कुदाल और सब्बल से धरती खोदते।
दिनभर की मेहनत के बदले थोड़ा अनाज और कुछ पैसे मिलते।
खेती भी भरोसे की चीज नहीं थी। न आज जैसी उन्नत किस्में थीं, न सिंचाई की अच्छी व्यवस्था। कभी अतिवृष्टि फसल बहा ले जाती, कभी अनावृष्टि खेतों को सुखा देती।
गरीब किसान जमींदारों के कर्ज में दबे रहते।
एक दिन रामलाल ने हिम्मत करके पिता से कहा—
“बाबा, मैं भी स्कूल जाना चाहता हूँ।”
बिरसा कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, पढ़ने की इच्छा बुरी नहीं है। मेरी भी इच्छा है कि तू पढ़े। लेकिन हम पर जमींदार का कर्ज है। तेरी बहन बड़ी हो रही है, उसकी शादी करनी है।”
वह कुछ क्षण रुका।
“दुर्गा पूजा आने वाली है। इस बार हमारे पास बारह पाठे हैं। अगर अच्छे दाम मिल गए तो कर्ज का बड़ा हिस्सा उतर जाएगा। तू फिलहाल बकरियों को ठीक से चराया कर।”
रामलाल का चेहरा उतर गया।
बिरसा ने बेटे की आँखों में देखा और धीरे से कहा—
“गरीबी आदमी को छोटा नहीं करती बेटा, हार मान लेना आदमी को छोटा करता है।”
रामलाल ने कुछ नहीं कहा।
उसने अपनी इच्छा मन में दबा ली।
जंगल और बांसुरी
अब उसकी दिनचर्या तय थी।
सुबह माड़-भात खाकर घर से निकलना, बकरियों को लेकर जंगल पहुँचना और शाम तक वहीं रहना।
उसके कुछ साथी भी साथ रहते।
लेकिन रामलाल का मन बकरियों से अधिक किसी और चीज में लगने लगा।
एक दिन उसने बाँस का एक टुकड़ा उठाया और उसमें फूँक मारी।
पहली ध्वनि बेसुरी थी।
फिर उसने दोबारा कोशिश की।
धीरे-धीरे उसने अपने आप सुर निकालना सीख लिया।
कोई गुरु नहीं।
कोई किताब नहीं।
केवल जंगल, पहाड़, हवा और उसका अपना मन।
कुछ ही समय में उसकी उँगलियाँ बाँसुरी पर ऐसे चलने लगीं जैसे वे किसी पुराने संगीत को पहचानती हों।
वह ऊँची चट्टान पर बैठकर बांसुरी बजाता।
उसकी धुन सुनकर पक्षी कुछ देर शांत हो जाते। हवा जैसे थमकर सुनती। पेड़ों की पत्तियाँ भी उस संगीत के साथ हिलतीं।
रामलाल स्वयं अपनी धुन में खो जाता।
उसे समय का पता नहीं चलता।
उधर बकरियाँ धीरे-धीरे कमजोर होने लगीं।
एक दिन बिरसा ने चिंता से पूछा—
“बेटा, बकरियाँ दुबली क्यों होती जा रही हैं? दुर्गा पूजा सिर पर है। इस बार इन्हीं से कर्ज चुकाने की उम्मीद है। तू इन्हें ठीक से चराता भी है या नहीं?”
रामलाल ने मासूमियत से कहा—
“बाबा, मैं तो ठीक से चराता हूँ। पता नहीं क्यों ये दुबली हो रही हैं।”
बिरसा ने गंभीर होकर कहा—
“ध्यान रखना बेटा। इस बार कर्ज चुकाना ही है।”
रामलाल चुप हो गया।
उसे क्या पता था कि उसकी बांसुरी किसी दिन उसे स्वयं उसके जीवन का अर्थ सुनाएगी।
पहाड़ का रहस्यमय वृद्ध
एक दिन रामलाल बकरियों को लेकर जंगल पहुँचा।
दोपहर ढल रही थी।
उसने बांसुरी निकाली और जंगल के बीच एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया।
उस दिन उसकी धुन कुछ अलग थी।
वह केवल संगीत नहीं लगती थी।
मानो किसी अदृश्य शक्ति का आह्वान हो।
रामलाल इतना डूब गया कि उसके साथी कब चले गए, उसे पता ही नहीं चला।
बकरियाँ कब वापस लौट गईं, इसका भी उसे भान नहीं रहा।
अचानक नीचे से आवाज आई—
“बेटा!”
रामलाल चौंका।
उसने नीचे देखा।
पेड़ के नीचे एक वृद्ध खड़ा था।
सिर पर पगड़ी, सफेद धोती, नंगे पैर और कंधे पर धनुष-बाण।
रामलाल नीचे उतरा।
वृद्ध ने पूछा—
“बेटा, तेरा नाम क्या है?”
“रामलाल मुर्मू।”
“कहाँ रहता है?”
“पास के गाँव में।”
रामलाल ने वृद्ध को ध्यान से देखा।
“लेकिन बाबा, मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा।”
वृद्ध मुस्कराया।
“मैं यहीं रहता हूँ। उस ऊँचे पहाड़ को देख रहे हो? वहीं।”
रामलाल ने पहाड़ की ओर देखा।
“लेकिन बाबा, वहाँ तो कोई घर दिखाई नहीं देता।”
“पहाड़ बहुत ऊँचा है बेटा। दूर से घर दिखाई नहीं देता।”
फिर वृद्ध ने पूछा—
“तुझे बांसुरी बजाना किसने सिखाया?”
“किसी ने नहीं बाबा। मैंने खुद सीखी है। उस बड़ी चट्टान पर बैठकर।”
वृद्ध ने उसकी ओर गहरी दृष्टि से देखा।
“तेरी बांसुरी की धुन साधारण नहीं है। इसमें देवताओं के आह्वान का स्वर है। उनकी कृपा के बिना ऐसा राग कोई नहीं बजा सकता।”
रामलाल उन बातों का पूरा अर्थ नहीं समझ पाया।
लेकिन वृद्ध का व्यक्तित्व उसे साधारण नहीं लगा।
उसे अपने बुजुर्गों से सुनी मरांग बुरु और लुगु बाबा की कथाएँ याद आने लगीं।
वह झुककर वृद्ध के चरणों में प्रणाम करने लगा।
वृद्ध ने उसके सिर पर हाथ रखा।
फिर कहा—
“बेटा, तुम्हारे लोग सीधे और सरल हैं। इसी कारण उनका शोषण होता है। हँड़िया और दारू ने बहुतों को रास्ते से भटका दिया है।”
वह कुछ क्षण रुका।
“तुम बड़े होकर उन्हें रास्ता दिखाना।”
रामलाल ने सिर झुका दिया।
“जी बाबा।”
वह दो कदम पीछे हटा।
फिर अचानक उसने मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
न वृद्ध।
न कोई पदचिह्न।
रामलाल के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
उसके बाल मन ने उसी क्षण मान लिया—
वह कोई साधारण मनुष्य नहीं था।
शायद मरांग बुरु।
शायद लुगु बाबा।
एक प्रश्न ने जन्म लिया
संध्या होने लगी थी।
बिरसा को चिंता हुई कि रामलाल अभी तक घर नहीं लौटा।
वह उसे खोजने निकल पड़ा।
दूर पगडंडी पर रामलाल दिखाई दिया।
वह धीरे-धीरे चल रहा था, जैसे कोई बहुत लंबी यात्रा करके लौट रहा हो।
बिरसा दौड़कर उसके पास पहुँचा।
“बेटा, तू ठीक तो है?”
उसने उसके शरीर को छूकर देखा।
रामलाल स्वस्थ था।
लेकिन उसकी आँखों में कुछ बदल गया था।
कुछ देर बाद उसने धीरे से पूछा—
“बाबा... हम लोग इतने गरीब क्यों हैं?”
बिरसा चुप रह गया।
रामलाल ने कहा—
“मैं स्कूल जाना चाहता हूँ।”
उस रात घर में देर तक चर्चा हुई।
रूपी ने बेटे का पक्ष लिया।
“मैं लाख कष्ट सह लूँगी, लेकिन रामलाल को पढ़ाऊँगी।”
बिरसा ने पूछा—
“बकरियाँ कौन चराएगा?”
रूपी ने कहा—
“बेटा पढ़-लिखकर साहब बन गया तो जिंदगी भर बकरी ही चराएगा क्या?”
बिरसा ने कोई उत्तर नहीं दिया।
शिक्षा की पहली सीढ़ी
कुछ दिनों बाद रामलाल स्कूल जाने लगा।
नंगे पैर।
साधारण गंजी और हाफ पैंट में।
कुछ बच्चे उसके कपड़ों को देखकर हँसते।
रामलाल चुप रहता।
एक दिन एक बच्चे ने उसके पुराने कपड़ों पर हँसते हुए कहा—
“तू भी पढ़ेगा?”
रामलाल कुछ कह पाता, उससे पहले शिक्षक ने बच्चे को रोक दिया।
उन्होंने रामलाल को पास बुलाकर कहा—
“कपड़ा आदमी को बड़ा नहीं बनाता बेटा। ज्ञान बनाता है।”
यह वाक्य रामलाल के मन में हमेशा के लिए बैठ गया।
वह पढ़ता गया।
इसी बीच बिरसा को सरकारी विभाग में कैटल गार्ड की दैनिक मजदूरी पर काम मिल गया।
काम कठिन था, लेकिन भविष्य की थोड़ी आशा थी।
बिरसा ने पूरी ईमानदारी से काम किया।
धीरे-धीरे घर की हालत सुधरने लगी।
रामलाल आगे पढ़ने के लिए दुमका हाईस्कूल पहुँच गया।
अब उसके पास एक पुरानी साइकिल थी।
वह साइकिल उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं थी।
बिरसा की बेटी का विवाह हो गया।
बड़े बेटे बागुन को भी उसकी कोशिश से कैटल गार्ड की नौकरी मिल गई।
अब घर में खाने की पहले जैसी कमी नहीं रही।
रामलाल ने मेहनत से पढ़ाई पूरी की और उसे सरकारी शिक्षक की नौकरी मिल गई।
जिस दिन यह खबर घर पहुँची, बिरसा की आँखें भर आईं।
उसने बेटे को गले लगाकर कहा—
“बेटा, आज तेरी माँ की तपस्या सफल हुई।”
घर में जैसे उत्सव था।
बागुन की शादी हो चुकी थी। उसके दो छोटे बच्चे घर में खेलते थे। जिन दिनों इस घर में भूख का सन्नाटा था, उन्हीं दिनों की जगह अब बच्चों की किलकारियाँ सुनाई देती थीं।
बिरसा ने चैन की साँस ली।
गाँव में उसकी सूझबूझ और संघर्ष की मिसाल दी जाने लगी।
कुछ समय बाद बिहार सरकार ने कैटल गार्ड की नौकरियाँ स्थायी कर दीं।
अब परिवार में तीन सरकारी नौकरियाँ थीं।
धीरे-धीरे संताल परिवारों के बच्चे पढ़ने लगे।
हर कोई रामलाल का उदाहरण देता—
“देखो, पढ़ोगे तो रामलाल मास्टर जैसे बनोगे।”
लेकिन जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी।
उत्सव की छाया
संताल समाज के पर्व प्रकृति और जीवन के उत्सव थे।
बाहा, सोहराय, दसाईं और दूसरे पर्वों पर माँदल की थाप, गीत और नृत्य से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता।
लेकिन अनेक सामाजिक आयोजनों में हँड़िया और महुआ की शराब भी गहराई से जुड़ी हुई थी।
जन्म हो, मृत्यु हो, छठी हो या कोई पर्व—कई बार लोग कई दिनों तक लगातार पीते।
रामलाल अब कमाने लगा था।
उसकी संगति कुछ ऐसे युवकों से होने लगी जिन्हें शराब के बिना कोई उत्सव पूरा नहीं लगता था।
पहले उसने छिपकर पीना शुरू किया।
फिर कभी दोस्तों के साथ।
फिर दुःख में।
फिर खुशी में।
धीरे-धीरे शराब अवसर नहीं रही।
आदत बन गई।
पिता का जाना
एक दिन बिरसा ड्यूटी से लौट रहा था।
अचानक आकाश में बिजली चमकी।
वज्राघात ने उसे उसी रास्ते में छीन लिया।
घर पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा।
रामलाल पिता की मृत्यु सह नहीं पाया।
गहरे दुःख में उसने पहली बार खुलकर शराब पी।
कुछ देर के लिए उसे लगा कि दर्द कम हो गया है।
लेकिन दर्द कहाँ जाता?
वह भीतर बैठा रहा।
और शराब उस दर्द पर केवल पर्दा डालती रही।
समय बीता।
घर के भीतर कलह बढ़ी। भाभी से मनमुटाव हुआ और दोनों परिवार अलग हो गए।
रामलाल अकेला पड़ गया।
उसकी बूढ़ी माँ ने छह महीने तक किसी तरह उसके लिए खाना बनाया।
फिर एक दिन वह भी थककर बैठ गई।
इसी बीच रामलाल ने अपने पुराने मित्र दिलीप हेंब्रम की छोटी बहन से विवाह कर लिया।
नई शादी और नौकरी ने कुछ समय के लिए जीवन में फिर रंग भर दिए।
उसे लगा, शायद अब सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन शराब उसके साथ थी।
पहले थोड़ा।
फिर कभी ज्यादा।
जब उसकी पत्नी माँ बनी, उसने पति की आदत का विरोध करना शुरू किया।
घर में तू-तू, मैं-मैं होने लगी।
एक दिन दिलीप ने उसे कड़े शब्दों में समझाया—
“शर्म करो! तुम मास्टर हो। बच्चों को पढ़ाते हो। तुम्हारे अपने बच्चे तुमसे क्या सीखेंगे? मेरी बहन भले कुंवारी रहती, लेकिन मैं तुम्हें अंतिम बार समझा रहा हूँ—अगर तुमने फिर गाली-गलौज की तो मैं तुम्हें संताल समाज के सामने ले जाऊँगा।”
रामलाल को बात बुरी लगी।
लेकिन भीतर उसे अपनी गलती का एहसास भी था।
उसने वचन दिया—
“अब शिकायत का मौका नहीं दूँगा।”
कुछ दिन सब ठीक चला।
फिर वही पुरानी चाल लौट आई।
बेकाबू घोड़ा
रामलाल तीन बच्चों का पिता बन चुका था।
उसकी माँ अब बहुत बूढ़ी हो चली थी।
जिस बेटे को उसने भूखे रहकर पढ़ाया था, उसे शराब में डूबते देख उसका हृदय टूटने लगा।
वह अक्सर बीमार रहने लगी।
पड़ोसियों के पास बातें थीं।
भाभी मौका मिलते ही रामलाल की बुराई करती।
ससुराल वाले भी उससे तंग आ चुके थे।
स्कूल में उसकी इज्जत समाप्त हो गई थी।
जिस शिक्षक को कभी बच्चे आदर्श मानते थे, अब वही लड़खड़ाते कदमों से घर लौटता।
उसके कई पीने वाले दोस्त बन गए थे।
पैसा रामलाल देता और वे सब मिलकर शराब पीते।
कई घरों में उसकी उधारी चलती।
शराब ने धीरे-धीरे उससे सब कुछ छीन लिया—
पैसा, प्रतिष्ठा, परिवार का विश्वास और माँ का चैन।
एक दिन उसने बहुत अधिक शराब पी ली।
उसकी साइकिल एक नाले में पड़ी मिली।
और वह स्वयं कुछ दूर एक गोबर के गड्ढे में औंधे मुँह पड़ा था।
उसकी पत्नी ने उसे खोजने की कोई कोशिश नहीं की।
बूढ़ी माँ ने कहा—
“बहू, जाकर देख तो आ... पता नहीं कहाँ पड़ा होगा।”
पत्नी ने कटु स्वर में कहा—
“ऐसे पति से तो विधवा होना अच्छा है। मुझे कोई गरज नहीं।”
लेकिन जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ता गया, माँ का हृदय काँपने लगा।
उसने बड़े बेटे से रोते हुए कहा—
“बेटा, तू ही जाकर उसे खोज ला।”
भाई गया।
किसी तरह उसने रामलाल को गोबर के गड्ढे से बाहर निकाला और घर ले आया।
पंचायत
अगली सुबह रविवार था।
घर का चूल्हा नहीं जला था।
बच्चे अलग-अलग कोनों में मुँह फुलाए बैठे थे।
पत्नी चुप थी।
एक कोने में रामलाल की बूढ़ी माँ लकड़ी के पीढ़े पर लाठी के सहारे बैठी थी।
बीच में गाँव के माझी बाबा चातुर मांझी मिट्टी के पीढ़े पर बैठे थे।
रामलाल का बड़ा भाई भी जमीन पर बैठा था।
चातुर मांझी ने बहू से पूछा—
“बहू, तू क्या चाहती है?”
उसने दो टूक उत्तर दिया—
“मैं अब इसके साथ संसार नहीं करना चाहती। ऐसे संसार में रहने से अच्छा है कि विधवा होकर जीवन बिताऊँ।”
बूढ़ी माँ की काँपती आवाज निकली—
“बहू... तूने आज तक केवल गालियाँ दी हैं। मैंने भी संसार किया है। सेवा से परिवार को जोड़े रखा। तू इस उम्र में घर छोड़कर जाएगी? क्या यही तेरी बुद्धि है?”
बहू भड़क उठी।
रामलाल का बड़ा भाई बोला—
“चाचा, देख रहे हैं? सारी बीमारी की जड़ रामलाल है। मैं अलग रहता हूँ, फिर भी रोज-रोज के कलह से अछूता नहीं हूँ।”
भाभी को जैसे मौका मिल गया।
वह बोली—
“मेरी सास बड़ी मीठी बातें करती हैं! किसी का मर्द जब बेकाबू घोड़े की तरह दौड़ता है तो अच्छे-अच्छे भी उस पर लगाम नहीं लगा सकते। मेरा देवर भी ऐसा ही बेकाबू घोड़ा है। तनिक भी मान-इज्जत का भ्रम होता तो गोबर के गड्ढे में पड़ा मिलता?”
रामलाल सब सुन रहा था।
वह बीच में चुपचाप बैठा था।
जैसे उसकी जुबान ही खो गई हो।
चातुर मांझी ने सबकी बातें सुनीं।
फिर उन्होंने रामलाल की ओर देखा।
“रामलाल बेटा... तुझे याद है?”
रामलाल ने धीरे से सिर उठाया।
“एक समय हम लोग भोर में मिट्टी खोदने जाते थे। पेट में अन्न नहीं होता था, बदन पर ठीक से कपड़े नहीं होते थे। आज तू मास्टर है। अच्छा कमाता है।”
चातुर मांझी की आवाज कठोर हो गई।
“लेकिन आज लोग तुझे देखकर अपने बच्चों को पढ़ाने से डरते हैं।”
रामलाल की आँखें झुक गईं।
“लोग कहते हैं—क्या करेंगे पढ़ाकर? पढ़-लिखकर रामलाल जैसा बन गया तो?”
कुछ क्षण के लिए घर में सन्नाटा छा गया।
फिर चातुर मांझी ने कहा—
“तू केवल अपना भविष्य नहीं बिगाड़ रहा रामलाल। तू उन संताल बच्चों के भविष्य का भी दोषी बन रहा है, जो तुझे देखकर आगे बढ़ना चाहते थे।”
रामलाल का सिर और झुक गया।
तभी उसकी बूढ़ी माँ ने काँपते हुए कहा—
“अच्छा हुआ... तेरा बाप पहले ही चला गया।”
रामलाल ने सिर उठाया।
माँ की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“काश, मैं भी चली जाती। आज वह जिंदा होता और तेरा यह रूप देखता... तो शायद तुझे इस हालत में देखकर फाँसी लगा लेता।”
रामलाल के भीतर जैसे कोई बाँध टूट गया।
वह अचानक उठ खड़ा हुआ।
उसने किसी की ओर नहीं देखा।
तेज कदमों से घर से बाहर निकला।
फिर दौड़ने लगा।
गाँव पीछे छूट गया।
खेत पीछे छूट गए।
पगडंडी समाप्त हो गई।
वह जंगल की ओर भागता चला गया।
उसी जंगल की ओर...
जयगुरु🙏🏻🙏🏻🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम
चंद्रा सत्संग केंद्र
बोकारो झारखंड