Naagbandhan - 1 in Hindi Mythological Stories by Simran books and stories PDF | नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 1

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नागबंधन: मुक्ति का श्राप - 1

अध्याय 1
जंगल का श्राप

घना जंगल—
इतना घना कि सूरज की सुनहरी किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही थककर बिखर जाती थीं। यहाँ रोशनी का प्रवेश वर्जित था। पत्तों की अनगिनत परतें ऊपर से नीचे तक ऐसे एक-दूसरे में गुथी हुई थीं मानो किसी ने जानबूझकर आकाश को धरती से छिपा दिया हो। यहाँ दिन के बारह बजे भी एक अजीब-सा, मटमैला धुंधलका छाया रहता था—न पूरा उजाला, न पूरी रात। बस एक अंतहीन गोधूलि बेला, जो कभी खत्म नहीं होती थी।
हज़ारों साल पुराने बरगद और सागौन के पेड़ आसमान को चीरते हुए, किसी मूक प्रहरी की तरह खड़े थे। उनका तना इतना चौड़ा था कि दस आदमी मिलकर भी उसे अपनी बाँहों में न भर सकें। उनकी जड़ें ज़मीन के भीतर रहने के बजाय, बाहर निकलकर साँपों की तरह रेंग रही थीं, जैसे धरती की छाती को कसकर जकड़े हुए हों और उसका दम घोंट रही हों। उन जड़ों के बीच गहरा अंधेरा बसता था—गाढ़ा, सर्द और जीवित-सा।
जंगल की हवा भारी थी। उसमें ताज़गी नहीं थी, बल्कि गीली मिट्टी, काई, सड़ी हुई पत्तियों और सदियों पुरानी नमी की एक ऐसी गंध थी जो साँसों के साथ फेफड़ों तक उतर जाती थी और मन में एक अजाना भय पैदा कर देती थी। यहाँ हवा बहती नहीं थी, बस रेंगती थी।
यह जंगल सामान्य नहीं था।
यह जंगल याद रखता था।
यह देखता था।
और सबसे बड़ी बात... यह इंतज़ार करता था।
उसी जंगल के सबसे भीतर, उस 'गर्भ' में जहाँ न तो किसी रास्ते का निशान था और न ही किसी बाहरी नक्शे में कोई रेखा, एक प्राचीन कबीला रहता था। ये लोग आधुनिक दुनिया से, उसकी रफ़्तार से और उसके नियमों से पूरी तरह कटे हुए थे। न वे शहरों की चमकती रोशनियों को जानते थे, न ही समय की बदलती चाल को। उनके लिए जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बहुत छोटी थी, और देवताओं व दानवों के बीच की रेखा बहुत धुंधली। वे प्रकृति के नहीं, बल्कि 'भय' के साये में जीते थे।
उस रात, जंगल असामान्य रूप से शांत था।
यह शांति सुकून देने वाली नहीं, बल्कि डराने वाली थी।
न झींगुरों की चिर-परिचित आवाज़ थी।
न रात के पक्षियों की फड़फड़ाहट।
न भेड़ियों की दूर से आती हुई पुकार।
यहाँ तक कि हवा ने भी पत्तों को छूना बंद कर दिया था।
जैसे पूरा जंगल अपनी साँस रोके, आँखें फाड़े किसी ऐसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा हो, जिसका आना तय था। हर पेड़, हर झाड़ी, हर पत्थर गवाह बनने को तैयार खड़ा था।
और तभी—
सन्नाटे का सीना चीरते हुए एक आवाज़ गूँजी।
"ह्रीं... क्लीं... महाकालाय..."
वह किसी एक गले से नहीं निकली थी। वह आवाज़ न तो पूरी तरह इंसानी थी, और न ही पूरी तरह दैवीय। ऐसा लगा मानो पाताल की गहराइयों से कई आवाज़ें एक साथ फूट पड़ी हों—मंत्र, प्रार्थना और विलाप का मिला-जुला, रोंगटे खड़े कर देने वाला स्वर। वह आवाज़ जंगल की गहराई में उतरती चली गई, पेड़ों के तनों से टकराई, जड़ों की दरारों में समाई और फिर एक गूँज बनकर लौट आई।
महा-अनुष्ठान शुरू हो चुका था।
जैसे-जैसे वह स्वर तेज़ होता गया, जंगल के बीचों-बीच, कबीले की बस्ती के केंद्र में एक साफ़ किया हुआ गोल मैदान अंधेरे में उभरने लगा। वहाँ ज़मीन पर पवित्र राख, रक्सौल (लाल मिट्टी) और सिंदूर से एक विचित्र 'तारे' का चिन्ह बनाया गया था। वह कोई साधारण ज्यामितीय आकृति नहीं थी। तारे की हर रेखा किसी और दिशा की ओर, किसी और आयाम की ओर इशारा कर रही थी—जैसे यह चिन्ह केवल इस धरती के लिए नहीं, बल्कि किसी और लोक के दरवाज़े खोलने के लिए बनाया गया हो।
उस विशाल घेरे के चारों ओर कबीले के सैकड़ों लोग खड़े थे। उनके हाथों में जलती हुई मशालें थीं। उन मशालों की काँपती हुई, पीली रोशनी उनके चेहरों पर नाच रही थी, जिससे उनकी परछाइयां पीछे खड़े पेड़ों पर राक्षसों जैसी लग रही थीं।
किसी की आँखों में मृत्यु का भय था, तो किसी की आँखों में अपने परिवार को खोने का दर्द। और कुछ आँखों में... बस एक आखिरी, टूटती हुई उम्मीद थी।
एक माँ ने अपने नवजात शिशु को छाती से इतना कसकर लगा रखा था कि बच्चा सांस भी मुश्किल से ले पा रहा था। कोई बच्चा डर के मारे सिसक रहा था, लेकिन उसकी आवाज़ को बड़ों के मंत्रोच्चारण ने दबा दिया था। कई पुरुषों के हाथ, जिन्होंने बड़े से बड़े जंगली जानवरों का शिकार किया था, आज थर-थर काँप रहे थे।
वे जानते थे—आज की रात साधारण नहीं है। आज की रात या तो उनका इतिहास समाप्त कर देगी, या उन्हें एक नया जीवनदान देगी। यह 'आर या पार' की लड़ाई थी।
तभी भीड़ से एक आकृति अलग हुई।
कबीले का मुखिया।
उसका शरीर उम्र और ज़िम्मेदारियों के बोझ से झुका हुआ था। उसके चेहरे पर झुर्रियों का जाल बिछा था, जैसे हर रेखा किसी पुराने बलिदान या किसी पुरानी त्रासदी की कहानी कह रही हो। उसने अपने गले में हड्डियों और रुद्राक्ष की माला पहन रखी थी। आज उसकी आँखों में वह तेज नहीं था जो हमेशा होता था, आज वहां केवल एक याचना थी।
वह उस यन्त्र के ठीक बीच में जाकर खड़ा हो गया। उसने काँपते हाथों से अपनी दोनों बाँहें, जो अब सूखी लकड़ी जैसी हो चुकी थीं, आसमान की ओर उठाईं। वह आसमान, जो काले बादलों से ढका था और जहाँ एक भी तारा नहीं दिख रहा था।
“आओ…”
उसकी आवाज़ टूट रही थी, लडखडा रही थी।
“ओ रक्षक... ओ कालों के काल...”
उसका गला भर आया। आँखों से आंसू बहकर उसकी सफ़ेद दाढ़ी में समा गए।
“हमारी बलि स्वीकार करो… या हमारा उद्धार करो। पर हमें इस अंतहीन नरक से बचा लो। हमारे पापों को क्षमा करो, प्रभु!”
उसकी आवाज़ जंगल के कोने-कोने में फैल गई। वह एक प्रार्थना कम, और एक मरते हुए इंसान की आखिरी चीख ज़्यादा थी।
एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ।
सिर्फ सन्नाटा। गहरा, भारी सन्नाटा। 
क्या देवता सो गए थे? क्या उनकी पुकार अनसुनी रह गई थी? कबीले वालों के दिलों की धड़कनें रुकने लगीं। मशालें बुझने की कगार पर आ गईं।
और तभी—
घेरे के बिल्कुल केंद्र से, मुखिया के ठीक सामने से, एक नीली और सफ़ेद रोशनी का स्तंभ फूट पड़ा।
धड़ाम!
आवाज़ ऐसी थी जैसे आकाश ज़मीन पर गिर पड़ा हो। वह प्रकाश इतना तीव्र, इतना प्रखर था कि लोगों को अपनी आँखें हथेलियों से ढकनी पड़ीं। वह सामान्य आग नहीं थी; वह ठंडी थी, मगर इतनी तेजस्वी कि रात का अंधेरा एक पल में दिन में बदल गया।
हवा का दबाव अचानक इतना बढ़ गया कि लोगों का दम घुटने लगा। पेड़ों की मज़बूत शाखाएँ तिनकों की तरह टूटने लगीं। ज़मीन पर पड़ी सूखी पत्तियां बवंडर बनकर आसमान में घूमने लगीं। धरती काँप उठी—हल्का कम्पन नहीं, बल्कि एक भूचाल।
उस अलौकिक रोशनी के बीच से एक स्वर उभरा।
वह स्वर कानों से नहीं सुना गया, वह सीधा आत्मा पर जाकर लगा। वह भारी था, स्थिर था और अनंत था।
“तुम्हारी सदियों पुरानी पुकार ने, और तुम्हारे आंसुओं के तप ने... मुझे जाग्रत किया है।”
मुखिया घुटनों के बल गिर पड़ा। वह उस तेज को सहन नहीं कर पा रहा था।
“हे प्रभु…”
उसकी आवाज़ अब बस एक फुसफुसाहट रह गई थी। वह ज़मीन पर माथा टेककर रो पड़ा।
“उस विषैले काल-नाग से हमारी रक्षा कीजिए, भगवन। वह पाताल का द्वार तोड़कर निकल आया है। वह रक्षक से भक्षक बन गया है। हमारी फसलें जला रहा है, हमारे बच्चों की साँसें छीन रहा है… उसका विष हवा में घुल चुका है। यदि आप नहीं आए, तो वह इस पावन धरती को श्मशान बना देगा।”
एक पल का सन्नाटा फिर छाया। ऐसा लगा जैसे वह शक्ति विचार कर रही हो।
फिर वह दिव्य स्वर गूँजा, जिसमें बादलों की गर्जना जैसा भारीपन था—
“क्रोध और विष को शांत करना होगा। प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है। मैं उसे मार नहीं सकता, क्योंकि वह भी मेरी ही सृष्टि का भाग है... किन्तु मैं उसे बाँध दूँगा। यहीं… इसी मिट्टी की कोख में। युगों-युगों के लिए।”
तभी—
जंगल के उत्तरी छोर से, झाड़ियों के पीछे से एक ऐसी सरसराहट हुई जिसने सबके रोंगटे खड़े कर दिए।
सूखी पत्तियों के टूटने की आवाज़ नहीं थी वह... वह पहाड़ के खिसकने की आवाज़ थी।
धरती फटने लगी। पेड़ों की जड़ें उखड़कर हवा में लहराने लगीं। मिटटी का एक बड़ा हिस्सा ऊपर उठा और—
वह बाहर आया।
विशाल काल-नाग।
उसका आकार कल्पना से परे था। उसका शरीर किसी विशाल देवदार के तने से भी कई गुना मोटा था। उसकी खाल पन्ने जैसी गहरी हरी थी, लेकिन उस पर लाल और काले धब्बे थे जो किसी शाप की तरह चमक रहे थे। जब उसने साँस छोड़ी, तो हवा में पीला, ज़हरीला धुआं फैल गया, जिससे पास के पौधे तुरंत मुरझा कर काले पड़ गए।
उसकी आँखें... वो आँखें किसी को भी पत्थर बना देने के लिए काफी थीं। जलते हुए अंगारों की तरह लाल, जिनमें केवल क्रोध, पीड़ा, और एक ऐसी तड़प थी जिसे सदियां भी शांत नहीं कर पाई थीं।
नाग ने अपना विशाल फन उठाया। वह इतना ऊँचा था कि सबसे ऊँचे पेड़ भी उसके सामने बौने लग रहे थे।
वह फुंकार उठा।
“फुफफफफ......!”
आवाज़ इतनी भयावह और तीखी थी कि कई लोग डर के मारे बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़े। बच्चे चीखना भूल गए।
लेकिन उस नीली दिव्य रोशनी ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। प्रकाश की किरणें जंजीरों का रूप लेने लगीं। वे कोड़े की तरह हवा में लहराईं और नाग के विशाल शरीर से लिपट गईं।
नाग छटपटाया। उसने अपनी पूंछ पटकी जिससे धरती में दरारें आ गईं। वह तड़पा, चीखा, उसने अपना विष उगला, लेकिन वह दिव्य बंधन अटूट था।
धीरे-धीरे... वह विशाल शक्ति कमज़ोर पड़ने लगी।
वह रोशनी उसे नीचे... और नीचे... पाताल की ओर धकेलने लगी।
नाग की आँखों में अब हार नहीं, बल्कि एक वादा था—लौट आने का वादा।
जैसे-जैसे वह ज़मीन के भीतर समा रहा था, कबीले के मुखिया ने काँपते हुए स्वर में पूछा,
“प्रभु... क्या यह अंत है? क्या वह कभी मुक्त नहीं होगा?”
अंतिम बार वह स्वर गूँजा—जो अब एक चेतावनी बन चुका था।
“सत्य और समय को कोई कैद नहीं कर सकता, मानव! यह बंधन शक्तिशाली है, किन्तु अमर नहीं। यह स्थान बाहरी दुनिया से सदा छिपा रहेगा। यदि किसी बाहरी इंसान ने इस सीमा को लांघा… और यदि इस बंधन को छेड़ा गया… तो प्रलय निश्चित है।”
रोशनी मद्धम होने लगी, लेकिन स्वर की गंभीरता अभी भी हवा में थी।
“एक दिन कोई अवश्य आएगा—जिसके लहू में इस मिट्टी की पुकार होगी, जिसके अतीत में यह कबीला होगा। वही इस नाग की मुक्ति... या इस जगत के विनाश का माध्यम बनेगा। नियति लिखी जा चुकी है।”
और इसके साथ ही, एक अंतिम चमक के बाद, वह रोशनी विलीन हो गई।
ज़मीन वापस जुड़ गई, जैसे वहाँ कभी कुछ हुआ ही न हो।
नाग गायब था। रोशनी गायब थी।
अंधेरा लौट आया।
वही जंगल, वही पेड़, वही रात।
पर जंगल की शांति अब पहले जैसी नहीं थी। हवा में अब एक भारीपन था, एक रहस्य था। कबीले वाले जानते थे कि उन्होंने मौत को टाल दिया है, लेकिन उसे हराया नहीं है।
क्योंकि कहीं न कहीं…
समय के गर्भ में, एक नन्ही सी जान का इंतज़ार शुरू हो चुका था जो सदियों बाद इस कहानी को पूरा करने के लिए जन्म लेने वाली थी।
नियति अपना खेल शुरू कर चुकी थी।