My Dear Professor - Part 37 in Hindi Love Stories by Vartika reena books and stories PDF | माई डियर प्रोफेसर - भाग 37

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माई डियर प्रोफेसर - भाग 37















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स्टेज से भागकर चारू युनिवरासिटि के एक सुनसान केन्द्र मे आ गई थी। वो एक पिलर से टिक कर घुटनो मे सर छुपा कर रोए जा रही थी। उसके गले मे हिचकिया बंध गई थी। शरीर कांप रही था। रात भर की थकान अब शरीर पर जोर डाल रही थी। 

उसे एंग्जायटी और जकडती उससे पहले ही चारू की नाक से जंगल और कॉफी की खुशबू टकराई । वो सिहर उठी । तभी एक हाथ आकर उसके कंधो के इर्द-गिर्द लिपट गया। चकरू की सांस अटक गई।  उसने सर उठाकर देखा तो, सामने जो इंसान था उसे देख पिछले पांच साल फ्लैशबैक की तरह उसे जहन मे कौंध गए।  उसे अपनी तडप , रातो की नींद सब याद आने लगा।

चारू कांपने लगी । वो लडखडाती आवाज मे बोली , " अमर !"


चारू को अपनी बांहो मे लिए अमर बैठा था। अमर के चेहरा शांत था किंतु उहकी आंखे अत्यंत विचलित थी। उहकी सांसे तेज थी। 

" मिस चारू...ब्रीथ! ", वो नियंत्रित लहजे मे बोला। 

अमर को महसूस कर चारू टूट गई।  एक साथ साढे पांच साल का बोझ उसे अपने कंधो पर महसूस होने लगा। 

" ह..हटिए ! ", चारू अमर के सीने पर हाथ रख उसे धकेलते हुए बोली ।

अमर ने अपनी बांहो का कसाव उसके चारो तरफ कस लिया। 
" लड बाद मे लेनी..अभी खुद की सांसो पर ध्यान दो। ब्रीथ विद मी । " 


चारू ने कांपते हुए दूर जाना चाहा तो अमर ने खींच कर उसे सीने से लगा लिया। चारू का सारा शरीर ठंडा पड गया। हिचकिया धीमी पड गई।  

" आप..आप नही हो । ये..ये सपना है। मै..मै..जानती हूं ! हर बार..हर बार ऐसे ही होता है। ", चारू टूटी आवाज मे बोली। वो थक चुकी थी। और ये उसके झुके हुए कंधे बता रहे थे की वो कितना टूटी हुई जान पडती है। 

अमर के माथे पर बल पड जाते है। उसने अपनी पकड चारू के कंधो पर कस दी। चारू सिसक पडी। उसने अमर की शर्ट मुट्ठियों मे कस लिया। 

" चारू मेरी धडकनों पर ध्यान दो। और गहरी सांसे लो। ", अमर चारू की पीठ सहलाते हुए बोला। 

चारू ने अमर की धडकनो पर ध्यान देना शुरू किया । वो अमर की सांसो के साथ ताल मिलाते हुए सांस लेने लगी। कुख समय बाद चारू संभलने लगी । उसका चेहरा छ्डा पड गया। सांसे संयत होने लगी। 

उसने सर उठाकर अमर के देखा। अमर सर झुकाए उसे ही देख रहा था। चारू की आंखे नम थी। 

" थैंक्स! " ,वो हल्की आवाज मे बोली।

अमर मुस्कुरा दिया। उसने चारू का सर सहला दिया। 
" अब ठीक हो ? " 

चारू ने हां मे सर हिला दिया और अमर से अलग हो गई।  उसने अपनी बिखरी हालत सवांरी और पिलर का सहारा लेकर खडी हो गई।  वो बहुत थकी हुई थी। 

अमर भी खडा हो गया। उसने चिंता से चारू को देखा।
" ये सब कैसे ? " 

अमर समझ नही पा रहा था कि हमेशा उच्छलती कूदती , चुलबुल सी चारू की ये हालत कैसे हो गई।

चारू ने नजर उठाकर अमर को देखा और दुख से मुस्कुरा दी। अमर पलके झपकाते हुए देखता रहा। शायद वो समझ गया था। शायद चारू ने सब अपनी आंखो से ही कह दिया था। 

अमर ने एक कदम आगे बडाया , " चारू...मैने उस दिन। जो भी कहा वो तुम्हारा अपमान करने के लिए नही था। कारण था मेरे पास ! " 

अमर ने उम्मीद से चारू को देखा मानो वो चाह रहा हो की चारू उसकी बात सुनेगी। चारू ने जहर बुझी नजर अमर पर डाली और पलट कर जाने लगी। लेकिन वो अभी चल भी पाती की थकान और अभी आए पैनिक अटेक के कारण उहके कदम लडखडा गए । 

अमर ने तेजी से आकर उसे सभांला।", ध्यान से मिस चारू । आप फिर से गिर जाएंगी । "

चारू ने गुस्से सु अमर का हाथ झटक दिया । " आपकी जरूरत नही है मुझे। मै चल सकती हूं। आपने एक बार मदद कर दी इसका मतलब ये नही बार बार आपकी मदद लुंगी मै। "

कहकर चारू जाने लगी। अमर ने उसके कमजोर कदम देखे। वो किसी भी पल गिर सकती थी। जिस प्रकार से वो चल रही थी उससे साफ पता चल रहा थी की उसे चक्कर आ रहे है। अमर ने गहरी सांसे छोडी और कुछ लंबे डग भरते हुआ चारू की बगल मे चलने लगा । उसने चारू की कलाई पकडी और उसके सामने घुटनो के बल बैठ गया। 

चारू की आंखे बडी हो गई । 
" ये क्या.." वो पीछे हटने लगी तो अमर नु उहकी कलाई पर अपनी उंगलियो का कसाव बडा दिया। चारू रूक गई। अमर ने चकरू की सैंडल उतार कर हाथ मे पकड ली। 

फिर दूसरे हाथ से उसे गोद मे उठा लिया। चारू की सांसे मानो रूक गई।  उसने अमर को आंखे बडी कर देखा। 


" ये क्या बद्तमिजी है। छोडिए! ", चारू अमर की पकड से आजाद होने की कोशिश करती हुई बोली। 

अमर ने अपनी पकड उसपर कस दी। 
" चुपचाप बताओ घर कहा है तुम्हारा । आज आराम करने वाली हो तुम। " 

चारू ने भवंए उचका कर उसे देखा । " और ये आप तय करेंगे ? " 

अमर ने चारू की तरफ हल्के से चेहरा झुका दिया। चारू हडबढा गई । 
अमर के होंठो पर तिरछी मुस्कान आ गई। 

" शायद आप भूल रही है.,आई एम दि ओनर माई डियर प्रोफेसर। " 

चारू ने मुंह बना लिया । 



क्रमशः 

इस भाग मे इतना ही। अगले भाग के लिए कमेंट कर दिजिए।  
पांच कमेंट का टार्गेट है। इतना कर सकते हो। कोई जमीन जायदाद नही चली जाएगी एक समीक्षा मे । थोडी शर्म करो और समीक्षा कर दो।