Antarnihit 58 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 58

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अन्तर्निहित - 58

[58]

शैल ने सरिता के शब्दों को नहीं सुना था। वह नदी की तरफ बढ़ता गया। पानी के समीप वह रुक गया। धीरे धीरे नदी में उतर गया, भीतर भीतर चलने लगा। नदी में आगे बढ़ता गया। 

सहसा किसी ने पीछे से उसे पकड़ लिया। शैल की गति रुक गई। वह पानी में गिर पडा। वह कुछ समजे, स्वयं को संभाले उससे पूर्व दो हाथों ने पकड़कर शैल को उठा लिया। शैल ने मुड़कर देखा। प्रत्यक्ष सरिता थी। 

सरिता की आँखों में तीव्र रोष था। जैसे कह रही हो, ‘मरने का विचार है क्या? इस प्रकार कोई पुलिसवाला आत्महत्या करता है क्या?’ सरिता ने कुछ नहीं कहा। किन्तु उसके मुख पर लिखे शब्दों को शैल ने पढ़ लिया । सरिता शैल को खींचकर तट पर ले आई। शैल वहीं बैठ गया। सरिता भी। शैल के माथे पर अपना हाथ फेरती रही। धीरे धीरे शैल की उद्विग्नता शांत होने लगी। 

“आप उनके साथ ...?”

“तुम्हें छोड़कर मैं कहीं भी जा सकती हूँ क्या? इतने दिनों में तुम्हें बस इतना सा ही मेरा परिचय हुआ है क्या?”

“आप तो नागरिकता के लिए कुछ भी करने को तैयार ...।”

“ऐसा विचार तुम्हारे मन में कैसे आ गया?”

“आपने कल प्रात: आठ बजे का समय ...?”

“विचार करने का समय मांगा है मैंने, कोई स्वीकृति नहीं दी है।” 

“कल जब वे आएंगे तो क्या होगा?”

“कल प्रात: के आठ बजे किसने देखा है?” सरिता मुक्त मन से हंस पड़ी। 

“अर्थात?”

“जब वे यहाँ आएंगे तब हम कहीं और होंगें। उनके हाथों से, उनकी दृष्टि से कहीं दूर, दूर।” सरिता नदी के पानी को दूर दूर तक देखने लगी। 

“रात्री विश्राम को त्याग कर हमें अभी यहाँ से चलना चाहिए। चलो।”

“अभी नहीं शैल। कुछ प्रहर रात्री के बित जाने दो।”

“तब विलंब हो जाएगा।”

“नहीं होगा।”

“आपकी योजना क्या है?”

“अभी तो वे दोनों हम पर दृष्टि रखे होंगें। यदि हम इसी समय यहाँ से चलने लगे तो वे हमारे पीछे आएंगे और कुछ ही दूर जाने पर हमें पकड़ लेंगे। क्यों कि इससे उन्हें हमारी योजना ज्ञात हो जाएगी। अत: उन्हें भुलावे में डालने हेतु अभी मैं सो जाती हूँ। तुम भी चाहो तो सो जाओ।”

“ठीक है। किन्तु मैं सो गया तो आपकी सुरक्षा कौन करेगा?”

“रात्री के दो तीन प्रहर तो मेरी सुरक्षा सपन और निहारिका ही करेंगे।” सरिता के मुख पर स्मित आ गया। शैल ने उस स्मित का संकेत समज लिया। दोनों विश्राम करने लगे। सरिता निश्चिंत हो गई। शैल चिंता में जागता रहा। रात्री के अंतिम प्रहर में निद्रा ने उसे अपनी शरण में ले लिया। 

सूर्य की प्रथम किरण के पूर्व के प्रकाश में सहसा शैल जाग गया। पक्षियों के पंखों की ध्वनि और मधुर गान के स्वर उसके कानों में पड़े। सुनकर वह प्रसन्न हो गया। ठंडी हवा की एक तरंग ने शैल को स्पर्श किया तो उसका शरीर झंकृत हो गया। तभी उसे सरिता का ध्यान आया। उसे देखने के लिए उसने दृष्टि उठाई तो देखा कि सरिता वहाँ नहीं थी। उसने आस पास, दायें – बायें, देखा किन्तु वह नहीं दिखाई दी। 

वह उठा। जहां तक दृष्टि जा सकती थी, दूर दूर, वहाँ तक देखा। 

‘सरिता जी कहीं नहीं दिख रही। कहाँ होगी? सपन – निहारिका उसे लेकर तो नहीं गए? मैं सोता रहा और वे दोनों सरिता जी को उठाकर ले गए।’ 

‘नहीं। ऐसा तो नहीं होना चाहिए। उन दोनों को तो आठ बजे आना था। अभी तो?’ शैल ने समय देखा। 

‘अभी तो छ: भी नहीं बजे हैं। यहीं कहीं होंगी। चलो जाकर देखता हूँ।’

शैल किसी एक दिशा में चलने लगा। 

‘नहीं। इस दिशा में नहीं। या तो गाँव में ढूँढना है या नदी के तट पर। मैं गाँव की तरफ ही जाता हूँ।’ 

शैल गाँव की तरफ चलने लगा। तभी किसी ने उसका नाम पुकार, “शैल, शैल।” 

शैल रुका। ध्वनि की दिशा में देखा। 

अर्ध प्रकाश में एक युवा दृष्टिगत गुआ। उसने अंगवस्त्र से अपना शरीर ढंका था। अंगवस्त्र और शरीर भीगे थे। वह थोड़ा कांप रहा था। 

“कौन हो तुम? क्या बात है?” 

वह कुछ नहीं बोल सका। वह नदी की तरफ चल पडा। असमंजस के साथ शैल भी उसके पीछे पीछे चलने लगा। शैल बार बार पूछने लगा कि क्या बात है? तुम कौन हो? उस पर वह मौन ही रहा, चलता रहा। 

दो सौ चरण चलने पर वह रुक गया। उसने एक दिशा में संकेत कर वहाँ देखने को कहा। शैल अचंभित रह गया। नदी के तट पर अचेत सी अवस्था में सरिता लेटी हुई थी। देखते ही शैल सारी बात समझ गया। वह दौड़ा। सरिता के समीप जाकर उसके नाक पर ऊँगलीयां रख दी। उसे संतुष्टि हो गई कि सरिता अभी जीवित है, साँसे ठीक चल रही हैं। 

शैल ने युवक की तरफ देखा, आँखों से प्रश्न किया किन्तु वह मौन रहा। शैल उत्तेजना से युवक की तरफ बढ़ा, वह दो चरण पीछे हट गया। शैल ने उसे पकड़ा और पुन: पूछा, “क्या हुआ है इसके साथ? जो भी हो पूरी पूरी बात बताओ।” 

युवक ने उत्तर नहीं दिया। वह बोलना चाहता था किन्तु बोल न सका।