चैप्टर 4: आंखों के सामने चमकती सफेद स्क्रीन।
समीर के गले में अटका हुआ थूक बहुत मुश्किल से नीचे उतरा।
कमरे में पसरा सन्नाटा उसे अंदर तक डरा रहा था।
उसने नजरें घुमाकर जमीन पर लेटे अपने भाई को देखा।
उसका भाई अभी भी सो रहा था और उसकी नींद में कोई खलल नहीं पड़ा था।
समीर ने डरते हुए कमरे के हर कोने में अपनी नजर दौड़ाई।
वहां कोई परछाई नहीं थी और ना ही कोई इंसान मौजूद था।
उसने हवा में देखते हुए अपनी कांपती आवाज में पूछा।
"क... कौन है?"
उसकी आवाज दीवार से टकराकर वापस लौट आई।
कमरे में कोई भी नहीं था जो उसकी बात का जवाब दे सके।
समीर ने अपनी मुट्ठियां कस लीं और खुद को मजबूत दिखाने की एक कोशिश की।
उसने फिर से हवा में देखते हुए अपनी बात दोहराई।
"स... सामने आओ।"
उसकी सांसें तेज चल रही थीं और वह बार-बार अपनी नजरें अलमारी पर घुमा रहा था।
फिर वह दरवाजे की तरफ देखता मानो कोई वहां से निकल कर आएगा।
उसने अपने लहजे को थोड़ा कड़क किया।
"देखो इस तरह छुपकर मुझे डराने की जरूरत नहीं है।"
उसका डर उसकी आवाज से साफ झलक रहा था पर वह हार नहीं मानना चाहता था।
"मुझे पता है कि इस दुनिया में कोई भूत वूत नहीं होता है।"
उसने अपना सीना आगे किया और कमरे के बीच में खड़ा हो गया।
"तो जो भी तुम हो बस सामने आओ।"
समीर यह बातें बोल जरूर रहा था पर असलियत कुछ और ही थी।
समीर असल में किसी आवाज को सुनकर नहीं घबरा रहा था।
कमरे में किसी इंसान के छुपे होने का उसे कोई डर नहीं था।
वह बस मन ही मन एक दुआ कर रहा था।
वह गॉड से प्रार्थना कर रहा था कि उसकी सोच सच ना निकले।
उसे महसूस हो रहा था कि वह आवाज कमरे से नहीं आ रही है।
तभी वह आवाज समीर को फिर से सुनाई दी।
इस बार वह आवाज एकदम साफ थी और उसमें कोई कंपन नहीं था।
"मैं शारीरिक तौर पर तुम्हारे सामने नहीं आ सकता।"
उस आवाज में कोई भावना नहीं थी और वह पूरी तरह से शांत थी।
"क्योंकि मेरा कोई शरीर नहीं है।"
यह सुनकर समीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।
इस बार समीर ने उस आवाज को बहुत ध्यान से सुना था।
समीर जिस बात को लेकर डर रहा था वह आखिरकार सच हो गई।
उसे डर था कि वह आवाज कहीं बाहर से नहीं आ रही है।
जब दूसरी बार वह आवाज आई तो उसका शक यकीन में बदल गया।
वह आवाज सच में उसके अंदर से आ रही थी।
वह आवाज उसके कानों के बाहर नहीं गूंज रही थी।
वह आवाज सीधा उसकी खोपड़ी के भीतर गूंज रही थी।
उसके जबड़े में एक हल्का कंपन महसूस हो रहा था।
यह अहसास होते ही समीर के पैर बुरी तरह कांपने लगे।
उसके घुटनों की ताकत खत्म होने लगी और वह लड़खड़ा कर पीछे की तरफ हटा।
पीछे हटते हुए उसकी पीठ अलमारी से टकरा गई।
अलमारी के लोहे से एक खट की आवाज पैदा हुई।
वह डर के मारे हकलाते हुए बोला।
"त... तुम वही बरगद के पेड़ वाले भूत हो न?"
उसका गला सूख चुका था और उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।
"देखो मैंने आज तक उस पेड़ को कभी नुकसान नहीं पहुंचाया है।"
समीर के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया था।
"तो फिर तुम क्यों..."
समीर अपनी बात पूरी नहीं कर पाया और वह बीच में ही रुक गया।
उसके होंठ डर के मारे कांपने लगे थे।
उसके दिमाग में बचपन की यादें तेजी से घूमने लगीं।
उसकी मां उसे इस बात को लेकर बचपन से ही डराती आई थी।
समीर बचपन में बार-बार उसी पेड़ के पास जाकर खेलता था।
वह पेड़ उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था।
उस पेड़ की जड़ें जमीन तक लटकती थीं और वहां हमेशा एक अजीब सा शांत माहौल रहता था।
उसकी मां उसे हमेशा एक बात कहकर डराती थी।
“तू बार बार उस बरगद पर जात है न।”
"देखना एक दिन तुझ पर उस बरगद का भूत चढ़ जाएगा।"
उसकी मां की वह बात आज उसे एकदम सच होती दिख रही थी।
आज इतने साल बाद उसने सच में एक भूत की आवाज सुनी थी।
यह सुनते ही उसका दिमाग पूरी तरह से घूम गया।
समीर का दिमाग सबसे पहले उसी दिशा में सोचने लगा था।
उसे लगा कि पेड़ से गिरते वक्त किसी आत्मा ने उसके शरीर पर कब्जा कर लिया है।
वही आत्मा अब उसके दिमाग से बात कर रही है और शायद उसकी कोई आखिरी इच्छा पूरी करवाना चाहती है।
पर तभी उस आवाज ने समीर की सोच को बीच में ही काट दिया।
उस आवाज ने इस बार बहुत चिढ़कर कहा।
"ये क्या फालतू की बकवास कर रहे हो?"
समीर अपनी जगह पर सहम कर सिकुड़ गया।
"तुम्हें क्या मैं कोई भूत लगता हूं?"
उस आवाज का लहजा अब सख्त हो चुका था।
उसमें अब एक साफ नाराजगी झलक रही थी।
समीर उस कमरे में बुत बनकर खड़ा रह गया।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे या क्या कहे।
वह अनजाने में कभी हां में अपना सिर हिलाता।
फिर वह अनजाने में कभी ना में अपना सिर हिलाता।
उसका शरीर उलझन में फंसा हुआ था।
उसे सच में समझ नहीं आ रहा था कि वह उस आवाज को आखिर क्या जवाब दे।
वह किसी इंसान से बात नहीं कर रहा था जो उसे सुन सके।
वह एक ऐसी चीज से बात कर रहा था जो उसी के अंदर मौजूद थी।
कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया।
सिर्फ छत पर चलते पंखे की चर चर की आवाज वहां गूंज रही थी।
समीर ने एक लंबी सांस ली और अपनी आंखें बंद कीं।
उसने अपनी हिम्मत को बटोरा और अपने डर को पीछे धकेल दिया।
कुछ देर के बाद उसने हवा में देखते हुए फिर से पूछा।
"तो तुम कौन हो?"
उसने अपनी मुट्ठियां कस लीं और अपनी सांस को रोक लिया।
"और मेरे अंदर क्या कर रहे हो?"
तभी कमरे का माहौल एकदम से बदल गया।
अचानक समीर की आंखों के सामने एक स्क्रीन चमकने लगी।
वह स्क्रीन सफेद थी और उसमें से एक हल्की रोशनी निकल रही थी।
वह स्क्रीन कांच की तरह हवा में तैर रही थी।
उससे निकलती रोशनी से समीर का चेहरा पूरी तरह चमक उठा।
वह रोशनी समीर की आंखों में चुभ नहीं रही थी।
वह स्क्रीन बिल्कुल किसी गेम के इंटरफेस की तरह लग रही थी।
उसकी बनावट बहुत आधुनिक थी।
उस सफेद स्क्रीन पर कुछ काले अक्षर लिखे हुए थे जो लगातार बदल रहे थे।
समीर ने अपनी आंखें चौड़ी कर लीं।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया और वह बिना पलक झपकाए उस स्क्रीन को घूरने लगा।
वह समझ नहीं पा रहा था कि यह कोई जादू है या उसके दिमाग का कोई खेल।
या वो दिन दहाड़े कोई सपना देख रहा है।