Meri Jivan-yatra - 1 in Hindi Motivational Stories by Poonam Jain books and stories PDF | मेरी जीवन-यात्रा: अखण्ड ज्योति का चमत्कार - 1

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मेरी जीवन-यात्रा: अखण्ड ज्योति का चमत्कार - 1

विषय-सूची (Table of Contents)

अध्याय 1: नानी का आँगन और ममता की छाँव

अध्याय 2: नया मोड़, पढ़ाई और संस्कारों की नींव

अध्याय 3: पहली मुलाकात और 'चार्ली चैपलिन' की मुस्कान

अध्याय 4: गृहस्थी का आगाज़ और आफ़त की आहट

अध्याय 5: आस्था की शक्ति, अखंड ज्योत और अपनों का साथ

अध्याय 6: समर्पण, संकल्प और अखंड ज्योत का

चमत्कार

अध्याय 7: 15 वर्षों की तपस्या और खुशियों की भोर

अध्याय 8: बच्चों के संस्कार और बेटी की खुशियाँ

अध्याय 9: बेटे का डॉक्टर बनना और नया संघर्ष

अध्याय 10: बाईपोलर का साया और मेरी साधना

अध्याय 11: गुप्त सेवा का पुण्य और अखंड सुहाग की कामना

अध्याय 12: अधूरे सपने और सुरों की भक्ति
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अध्याय 1: नानी का आँगन और ममता की छाँव

मेरी ज़िंदगी की शुरुआत ही एक अनोखे मोड़ से हुई थी। जब मैं महज़ छह महीने की एक नन्हीं बच्ची थी, तब मेरे माता-पिता ने मुझे मेरे नाना-नानी को सौंप दिया। शायद कुदरत को मुझे प्यार और स्नेह के दो अलग-अलग रास्तों से गुज़ारना था।

नाना-नानी के घर में बिताए वे आठ-नौ साल मेरे बचपन का सबसे सुंदर हिस्सा बन गए। नानी की लोरियाँ, नाना जी का दुलार और उस घर का कोना-कोना मेरी सबसे पहली और प्यारी यादें हैं। वहाँ मुझे कभी अहसास ही नहीं हुआ कि मैं अपने जन्मदाता माता-पिता से दूर हूँ; नाना-नानी ने मुझे माँ-बाप से भी बढ़कर ममता और सुरक्षा दी। उनका वह छोटा सा घर मेरे लिए खुशियों का संसार था।


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अध्याय 2: नया मोड़, पढ़ाई और संस्कारों की नींव


आठ-नौ साल की उम्र के बाद मेरी ज़िंदगी में एक नया बदलाव आया। मैं अपने माता-पिता के घर वापस लौट आई। एक बच्ची के लिए बचपन में अपना माहौल और घर बदलना आसान नहीं होता, लेकिन मेरे माता-पिता ने बेहद प्यार और ज़िम्मेदारी से मेरा स्वागत किया।

उन्होंने मेरी पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी नहीं छोड़ी। सही-गलत की समझ, अच्छे संस्कार, बड़ों का सम्मान और हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की हिम्मत - यह सब मुझे अपने माता-पिता के घर आकर मिला। उन्होंने मेरा पालन-पोषण बहुत ही सलीके और आत्मीयता से किया। एक नन्हीं बच्ची से समझदार लड़की बनने का मेरा यह सफ़र अपनों के दुलार के बीच हँसी-खुशी बीत रहा था।



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अध्याय 3: पहली मुलाकात और 'चार्ली चैपलिन' की मुस्कान




शादी से पहले हमारे रिश्ते की बात भी बड़े दिलचस्प तरीके से शुरू हुई थी। रक्षाबंधन का पावन दिन था। मेरी सासू माँ और मेरे माता-पिता दोनों संयोग से बुआ जी के घर गए हुए थे। बातों ही बातों में बच्चों के रिश्ते का ज़िक्र छिड़ गया। बुआ जी ने तुरंत कहा- "क्यों न आप दोनों एक-दूसरे के बच्चों को देख लें? अगर बात जम जाए तो शादी पक्की कर दीजिए।"

सासू माँ जब घर लौटीं, तो उन्होंने अपने परिवार से कहा कि बुआ जी के यहाँ एक लड़की की बात चली है जो मुझे बहुत पसंद आई है। इसके बाद एक दिन मेरे सास-ससुर ने हमें मिलने के लिए बुलाया और हम उनके घर के पास एक होटल में मिले।

वहाँ जब मैंने अपने होने वाले पति को पहली बार देखा, तो वे देखने में बहुत सुंदर थे, लेकिन बेहद दुबले-पतले थे। उन्हें देखते ही मेरे चेहरे पर अचानक एक हँसी आ गई और मेरे मन में ख्याल आया-"ये तो बहुत पतले हैं, बिल्कुल चार्ली चैपलिन की तरह लगते हैं।"

दूसरी तरफ, मेरी उस बेसाख्ता हँसी को देखकर मेरे पति ने सोचा कि यह लड़की कितनी खुशमिज़ाज और हंसमुख है, और उन्होंने तुरंत शादी के लिए हाँ कर दी। शादी के बाद जब मैंने उन्हें हँसने की असली वजह बताई कि मैं तो उन्हें चार्ली चैपलिन समझकर हँसी थी, तो वे ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़े और मज़ाक में बोले-"अच्छा! तो तुम इसलिए हँसी थीं? पर कहावत तो वही सच हुई-हँसी तो फँसी, मुस्कुराई तो जेब में आई!" वह हमारी प्यार भरी शुरुआत की सबसे यादगार मीठी याद थी।