The Third door -part 3 in Hindi Thriller by Nisha Choudhary books and stories PDF | वो तीसरा दरवाज़ा - भाग 3

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वो तीसरा दरवाज़ा - भाग 3

शीशे के अंदर कैद शेखर ने जब देखा कि उसका हमशक्ल उसकी पूरी दुनिया छीनने जा रहा है, तो उसने समय के उस खौफ़नाक चक्रव्यूह को तोड़ने का एक ऐसा तरीका खोज निकाला... जिसकी कीमत उसकी अपनी जान भी हो सकती थी!

शीशे के पीछे की बर्फीली दुनिया में शेखर लाचार खड़ा था। काँच की दूसरी तरफ उसका हमशक्ल शेखर का कोट पहनकर मुस्कुरा रहा था और हवेली का मुख्य दरवाज़ा बंद करके बाहर निकलने ही वाला था।
"नहीं! तुम मेरी जगह नहीं ले सकते!" शेखर ने पागलों की तरह शीशे पर घूंसे मारे, लेकिन बाहर कोई आवाज़ नहीं जा रही थी। शीशे पर सिर्फ उसकी साँसों की भाप जम रही थी।
शेखर को समझ आ गया था कि चीखने-चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। उसने कमरे को ध्यान से देखना शुरू किया। मेज़ पर अब भी वही मोमबत्ती जल रही थी और दीवार पर खून से लिखा था: "अंगुलियों के निशान मत मिटाना, अगला नाम तुम्हारा है।"
अचानक शेखर के दिमाग में एक कौंध कौंधी। उसके हमशक्ल ने कहा था कि इस चक्रव्यूह की शुरुआत तब होती है जब कोई मेज़ से अपने निशानों को मिटाता है। यानी निशानों का मिटना ही इस कमरे की जादुई कैद को सक्रिय (activate) करता है। अगर वह इस नियम को ही उल्टा कर दे तो?
शेखर तुरंत उस शीशम की मेज़ के पास गया। उसकी उंगलियाँ अब भी खून से सनी हुई थीं। उसने बिना एक पल गँवाए अपने ही खून से सने हाथों को वापस मेज़ पर ज़ोर से छापा। उसने पूरे मेज़ पर अपनी हथेलियों के अनगिनत निशान बना दिए।
जैसे ही शेखर ने मेज़ को अपने निशानों से भर दिया, कमरे में भूचाल आ गया!
हवेली की दीवारें थरथराने लगीं। शीशा तेज़ी से चटकने लगा। बाहर निकलता हुआ हमशक्ल अचानक दरवाज़े पर ही ठिठक कर रुक गया। उसकी चमड़ी पर खरोंचे आने लगीं और वह तड़पने लगा।
"तुमने यह क्या किया?!" हमशक्ल चीखा। उसकी आवाज़ में अब खौफ़ था। "तुमने निशानों को मिटाने के बजाय और बढ़ा दिया! यह चक्र तोड़ देगा!"
"यही तो मैं चाहता था," शेखर ने काँच पर अंतिम वार करते हुए कहा।
एक ज़ोरदार धमाके के साथ वह बड़ा सा शीशा हज़ारों टुकड़ों में टूटकर बिखर गया। एक ज़बरदस्त हवा के झोंके ने शेखर को बाहर की तरफ फेंक दिया। जब शेखर की आँखें खुलीं, तो वह हवेली के गलियारे में ज़मीन पर पड़ा था।
उसका हमशक्ल धुएँ की तरह हवा में गायब हो रहा था, उसकी चीखें धीरे-धीरे सन्नाटे में बदल गईं। शेखर ने राहत की साँस ली। वह इस समय चक्र के जाल से बाहर निकल चुका था।
शेखर तुरंत उठ खड़ा हुआ और बिना पीछे मुड़े हवेली के बाहर अपनी कार की तरफ भागा। उसने कसम खाई कि वह इस श्रापित जगह पर कभी वापस नहीं आएगा। लेकिन जैसे ही उसने कार स्टार्ट करने के लिए चाबी लगाई, कार के बैक-व्यू मिरर (मिरर) पर उसकी नज़र पड़ी।
शीशे पर भाप से धीमी सी लिखावट उभर रही थी: "खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, शेखर..."

क्या शेखर सच में उस खौफ़ से आज़ाद हो पाया या यह सिर्फ एक नए खेल की शुरुआत थी?
'वो तीसरा दरवाज़ा' का यह क्लाइमेक्स आपको कैसा लगा? अपनी राय कमेंट (Comment) करके ज़रूर बताएं!
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