प्रस्तावना: तमस का साम्राज्य और अदृश्य आशा
कलयुग का वातावरण: सन 4,28,126 ईस्वी
सन 4,28,126 ईस्वी का यह भयानक काल-चक्र संपूर्ण ब्रह्मांड का सबसे खौफनाक, क्रूर और घिनौना दौर बन चुका था। मानवीय चेतना पूर्णतः भस्म हो चुकी थी और समूची सृष्टि पर कलयुग का एकछत्र, अजेय अधिकार स्थापित हो चुका था। वायुमंडल में शुद्ध वायु की जगह केवल छह महा-विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—की सड़ांध व्याप्त थी। कलयुगी अस्त्रों और घातक तकनीकों से निकले विषैले काले धुएं ने आकाश को पूरी तरह से निगल लिया था, जिससे धरती पर सूर्य की एक भी किरण पहुँचना पूरी तरह बंद हो गई थी। चारों तरफ केवल अंधकार, विनाश और भय का साम्राज्य व्याप्त था।
मनुष्य अब आत्मा या उच्च भावनाओं से भरा जीव नहीं रहा था, बल्कि इन छह महा-विकारों से संचालित एक बायो-मेकेनिकल दास बन चुका था। कलयुग ने अपनी अधर्मी सत्ता को हमेशा के लिए अजेय रखने हेतु घोर तंत्र, खतरनाक मंत्र और भयंकर ब्लैक मैजिक का सहारा लिया। उसने काम और वासना के महा-कुंड से जन्मी 10,000 तंत्र-सिद्ध असुर-स्त्रियों की एक ऐसी विकराल और निर्दयी सेना खड़ी कर दी, जिसके खौफनाक रूप के समक्ष बड़ी-बड़ी आसुरी शक्तियाँ भी थर-थर काँपने लगती थीं। नदियाँ दूषित होकर केवल लाल रक्त और ज़हर की तरह बह रही थीं, नग्न असुर-स्त्रियाँ विनाश का तांडव कर रही थीं और अधर्म अपने चरम अहंकार में ठहाके लगाकर जोर-जोर से मुस्कुरा रहा था। कलयुग को यह पूर्ण भ्रम हो चुका था कि उसने सनातन धर्म, मर्यादा, पवित्रता और सत्य का नामो-निशान हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया है।
सुंदर वातावरण और कलयुग के विनाश का आरंभ
परंतु, तमस के इस भयानक साम्राज्य के स्थापित होने से ठीक 100 वर्ष पूर्व ही धर्म का सबसे बड़ा, गुप्त और अलौकिक विधान रचा जा चुका था। प्राचीन पावन काशी की पवित्र माटी को मुख्य केंद्र बनाकर, भारतवर्ष के कई ऐतिहासिक तीर्थों और प्रचंड ऊर्जा-क्षेत्रों के भू-भाग को आपस में जोड़ते हुए, भगवान विश्वकर्मा और मयदानव ने 'सिंभाला' नामक एक अत्यंत दिव्य, भव्य और अलौकिक नगरी का निर्माण किया था। अति-उच्च आवृत्ति (High-Frequency) के अदृश्य देव-कवच से ढकी यह नगरी सामान्य कलयुगी आँखों, पापी जीवों और राक्षसों के लिए पूर्णतः अदृश्य थी।
इस अलौकिक सिंभाला नगरी के भीतर केवल सिद्ध साधु, पवित्र आत्माएँ, सातों अमर चिरंजीवी और स्वयं रुद्र-रुद्राणी का परम दिव्य स्वरूप निवास करता था। यहाँ की पावन माटी में सत्य और सनातन का अखंड प्रकाश निरंतर विद्यमान था। कलयुग अपनी जीत का जश्न मना रहा था, पर वह इस परम सत्य से पूरी तरह बेखबर था कि अदृश्य सिंभाला की यही पावन माटी उसके सर्वनाश का महा-बीज बो चुकी है। धर्म नष्ट नहीं हुआ था, बल्कि अधर्म के अहंकार को चूर-चूर करने के लिए एक भयावह महा-प्रलय की तैयारी करने का वक्त आ रहा है अब विनाश निश्चित है समस्त ब्रह्मांड इस संसार में अब कलयुग का विनाश निश्चित है अब वह वक्त आ चुका है जिसका इंतजार इस समस्त ब्रह्मांड को था कलयुग अपने चरम से मां पर आ चुका है अब आगे
अध्याय 1 आगे हमारे साथ जुड़े रहिए। आगे जानिए रुद्र और रुद्राणी का जन्म कैसे होता है। और उनके जन्म के साथ और कौन-कौन आते हैं जन्म लेकर कौन-कौन से देवी देवता आते हैं यह रुद्र और रुद्राणी किसके परम अंशः है