hukm aur hasarat in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत -34

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हुक्म और हसरत -34

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 34 — सिर्फ हमारे लिए 🌸

शाम का समय था।

रायगढ़ कार्यालय का काम लगभग खत्म हो चुका था।

एक-एक करके कर्मचारी अपने घर जाने लगे थे।

काव्या आखिरी कुछ फाइलें समेट रही थी।

सिया अपनी मेज़ पर बैठी सामने रखे दस्तावेज़ देख रही थी।

लेकिन पिछले दस मिनट से उसने एक भी पन्ना नहीं पलटा था।

काव्या ने उसे ध्यान से देखा।

“क्या हुआ?”

सिया ने तुरंत सिर उठाया।

“कुछ नहीं।”

“आप दस मिनट से उसी पन्ने को देख रही हैं।”

सिया ने नीचे देखा।

वही पन्ना।

वह थोड़ा झेंप गई।

“मैं सोच रही थी।”

काव्या ने मुस्कुराकर पूछा—

“किसके बारे में?”

“काम के बारे में।”

“अच्छा?”

“हाँ।”

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

“पक्का?”

सिया ने आँखें छोटी कर दीं।

“काव्या…”

“जी?”

“बहुत सवाल पूछने लगी हो।”

काव्या हँस पड़ी।

“मैं तो बस पूछ रही थी।”

तभी दरवाज़ा खुला।

अर्जुन अंदर आया।

सिया की नज़र तुरंत उस पर गई।

अर्जुन ने कमरे में आते ही पूछा—

“काम खत्म हुआ?”

काव्या ने तुरंत कहा—

“मेरा तो हो गया।”

सिया ने उसे देखा।

“तुम जा रही हो?”

“जी।”

“इतनी जल्दी?”

काव्या ने मुस्कुराकर कहा—

“मुझे लगा आज आप दोनों को मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी।”

सिया ने तुरंत समझ लिया कि काव्या क्या कहना चाह रही है।

“काव्या!”

काव्या हँसते हुए बाहर निकल गई।

“कल मिलते हैं, राजकुमारी जी।”

दरवाज़ा बंद हो गया।

कमरे में अब सिर्फ सिया और अर्जुन थे।

सिया ने अर्जुन की तरफ देखा।

“ये काव्या भी ना…”

अर्जुन ने शांत स्वर में पूछा—

“क्या किया उसने?”

“कुछ नहीं।”

“तो?”

“बस ऐसे ही।”

अर्जुन ने उसे कुछ पल देखा।

फिर मेज़ पर रखी फाइल उठाई।

“चलें?”

सिया ने कुर्सी से उठने के बजाय हाथ बाँध लिए।

“नहीं।”

अर्जुन रुक गया।

“क्यों?”

“आज नहीं।”

“क्यों?”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“आज मैं आपके साथ थोड़ा समय बिताना चाहती हूँ।”
अपना दोस्त चाहिए.......
आपने कहा था ना की हम दोस्त है अब,अर्जुन को कुछ दिन पहले की याद आई,सिया ने उसे दोस्ती के लिए हाथ बदाया था|

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

“घर चलकर बिताइए।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि वहाँ सब होंगे।”

अर्जुन ने उसकी बात समझ ली।

सिया ने धीरे से कहा—

“मुझे कभी-कभी सिर्फ आपके साथ रहना अच्छा लगता है।”

अर्जुन की आँखें एक पल के लिए उसके चेहरे पर ठहर गईं।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

बस फाइल मेज़ पर वापस रख दी।

सिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“मतलब रुक रहे हैं?”

“कुछ देर।”

“सिर्फ कुछ देर?”

“जी।”

सिया ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा—

“ठीक है।”

---

कुछ देर तक दोनों चुप बैठे रहे।

कमरे में सिर्फ घड़ी की हल्की आवाज़ थी।

सिया सामने बैठी अर्जुन को देख रही थी।

अर्जुन कुछ दस्तावेज़ पढ़ रहा था।

सिया ने धीरे से कहा—

“अर्जुन।”

“जी?”

“आपको पता है…”

“क्या?”

“आप बहुत अच्छे लगते हैं जब चुपचाप काम करते हैं।”

अर्जुन ने नजरें उठाईं।

“और?”

सिया मुस्कुराई।

“और कुछ नहीं।”

अर्जुन ने फिर फाइल की तरफ देखा।

सिया ने कुछ सेकंड बाद फिर कहा—

“अर्जुन।”

“जी?”

“अब आप बहुत गंभीर लग रहे हैं।”

“मैं हमेशा ऐसा ही रहता हूँ।”

“नहीं।”

सिया उठकर उसके पास चली गई।

“जब मैं आपके सामने होती हूँ, तब आप थोड़े अलग होते हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“कैसे?”

सिया ने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए कहा—

“थोड़े कम गंभीर।”

अर्जुन के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

सिया तुरंत खिल उठी।

“देखा!”

“क्या?”

“आप मुस्कुराए।”

“नहीं।”

“मैंने देखा।”

“आपको भ्रम हुआ।”

सिया ने आँखें घुमाईं।

“आप हर बार यही कहते हैं।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

सिया ने उसके सामने मेज़ पर रखी फाइल बंद कर दी।

“अब काम बंद।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने कहा।”

“आप आदेश दे रही हैं?”

“हाँ।”

“और अगर मैं नहीं माना?”

सिया थोड़ा झुककर बोली—

“तो मैं आपको मजबूर कर दूँगी।”

अर्जुन ने भौंह उठाई।

“कैसे?”

सिया कुछ पल सोचने लगी।

फिर उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई।

वह उसके बिल्कुल पास गई और उसकी टाई पकड़कर हल्का-सा अपनी तरफ खींचा।

अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।

“ये क्या कर रही हैं?”

“आपको गंभीरता से बाहर निकाल रही हूँ।”

“काम करना है।”

“आज नहीं।”

सिया ने उसकी टाई सीधी की।

“आज सिर्फ मैं।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“बहुत जिद्दी हैं आप।”

“आपके साथ।”

“पता है।”

सिया मुस्कुराई।

“और आपको बुरा नहीं लगता?”

अर्जुन ने धीमे से कहा—

“नहीं।”

सिया एक पल के लिए चुप हो गई।

उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।

“अच्छा…”

वह पीछे हटने लगी।

लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

सिया रुक गई।

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

बस उसका हाथ अपने हाथ में थामे रखा।

सिया उसकी तरफ देखती रही।

कुछ पल तक दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।

फिर सिया ने धीरे से पूछा—

“आपको पता है, मुझे आपकी ये आदत बहुत पसंद है।”

अर्जुन ने पूछा—

“कौन-सी?”

“जब मैं दूर जाती हूँ…”

वह हल्की मुस्कान के साथ बोली—

“…तो आप रोक लेते हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि आप बिना बताए चली जाती हैं।”

सिया ने हँसते हुए कहा—

“तो अगली बार बता दूँगी।”

“ठीक है।”

“फिर भी रोकेंगे?”

अर्जुन चुप रहा।

सिया उसकी खामोशी देखकर मुस्कुराने लगी।

“समझ गई।”

वह उसके पास बैठ गई।

कुछ देर तक दोनों साथ बैठे रहे।

---

कुछ देर बाद सिया ने अपना सिर धीरे से अर्जुन के कंधे पर रख दिया।

अर्जुन एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया।

फिर उसने अपनी फाइल एक तरफ रख दी।

सिया ने आँखें बंद कर लीं।

“बहुत थक गई हूँ।”

अर्जुन ने धीमे से पूछा—

“काम से?”

“हाँ।”

कुछ पल बाद सिया ने कहा—

“लेकिन अच्छा लग रहा है।”

“क्या?”

“ये सब।”

अर्जुन चुप रहा।

सिया ने आँखें खोले बिना कहा—

“मुझे लगता था कि मैं इतने बड़े काम नहीं संभाल पाऊँगी।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“लेकिन अब?”

“अब लगता है… शायद संभाल लूँगी।”

अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा—

“आप संभाल लेंगी।”

सिया ने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा।

“आपको इतना भरोसा कैसे है?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“क्योंकि मैंने आपको देखा है।”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर धीरे से मुस्कुराई।

“आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें कर लेते हैं।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

सिया ने फिर अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“ऐसे ही रहिए।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

फिर बिना कुछ कहे अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

कमरे में फिर से खामोशी फैल गई।

लेकिन इस बार वह खामोशी अजीब नहीं थी।

उसमें सुकून था।

---

कुछ देर बाद सिया ने धीरे से कहा—

“अर्जुन।”

“जी?”

“कल भी मेरे साथ रहेंगे?”

“हाँ।”

“पूरा दिन?”

“काम होगा।”

“काम के बीच?”

“देखेंगे।”

सिया ने मुस्कुराते हुए कहा—

“मैं समझ गई।”

“क्या?”

“आप मुझसे ज्यादा देर तक दूर नहीं रह सकते।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“बहुत गलतफहमी है आपको।”

सिया हँस पड़ी।

“है तो रहने दीजिए।”

अर्जुन के चेहरे पर फिर वही हल्की मुस्कान आई।

और इस बार…

सिया ने उसे पकड़ने की कोशिश नहीं की।

बस चुपचाप उसे देखती रही।

क्योंकि कुछ पल ऐसे होते हैं…

जिन्हें शब्दों की जरूरत नहीं होती।

उनके बीच भी आज वैसा ही एक पल था।

बाहर रायगढ़ की रात गहरी हो रही थी।

लेकिन उस छोटे-से कमरे में…

दो लोगों के बीच की दूरी पहले से थोड़ी और कम हो चुकी थी।

— एपिसोड 34 समाप्त —


जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

Follow me for the next episode…

✨ मेरी रचनाएँ ✨

 1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed

 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸