begnning of chalanges in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | संघर्ष अभी जारी है

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संघर्ष अभी जारी है



संघर्ष अभी जारी है...

खुशबू दो दिन से अस्पताल में भर्ती थी। प्रसव की घड़ी नजदीक थी, पर जटिलताएं बढ़ती जा रही थीं। दर्द की लहरें उसके शरीर को तोड़ रही थीं, चेहरा पीला पड़ गया था। रातभर वह दर्द से कराहती रही।

सुबह डॉक्टर सुधा राउंड पर आईं। उन्होंने जांच की और गंभीर स्वर में कहा, "खुशबू की हालत ठीक नहीं है। बच्चेदानी का मुँह बिल्कुल नहीं खुला है। हम नॉर्मल डिलीवरी का और इंतजार नहीं कर सकते। तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा, वरना जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा है।"

खुशबू के पति रोहन का चेहरा उतर गया। उसके मु्मी पापा गाँव से पहले ही आ चुके थे। कुछ ही घंटों में उसके पिता सोहनलाल और माँ अस्पताल पहुंच गए।

सोहनलाल पुराने, दकियानूसी विचारों के आदमी थे। उनके लिए अस्पताल का बिल इंसान की जान से बड़ा था। डॉक्टर की बात सुनते ही वह भड़क गए और डॉक्टर से ही लड़ने लगे, "क्या बात करती हैं डॉक्टरनी! दिल्ली में ऑपरेशन नहीं कराना हमें। कितना महंगा पड़ेगा, पता है? हम अपने गाँव ले जाएंगे बहू को, वहीं हो जाएगा सब। रोहन, चल एम्बुलेंस बुला!"

रोहन अपने पिता का अंधभक्त था। पिता के सामने उसकी जुबान कभी नहीं खुलती थी। पत्नी की हालत देखकर भी वह पिता की आज्ञा को ही सर्वोपरि मान बैठा। उसने काँपते हाथों से खुशबू के कागज समेटे और नर्स से डिस्चार्ज की जिद करने लगा। डॉक्टर सुधा समझाती रह गईं, पर सोहनलाल ने एक न सुनी।

कुछ ही देर में खुशबू को स्ट्रेचर पर डालकर एम्बुलेंस में लिटा दिया गया। पूरे रास्ते, तीस किलोमीटर लंबे सफर में खुशबू दर्द से तड़पती रही। उसका गला सूख रहा था, सांस उखड़ रही थी। हर झटके पर वह चीख पड़ती। पर आगे बैठे सोहनलाल का कलेजा न पिघला। उनके चेहरे पर शिकन तक न थी, बस एक ही चिंता थी - पैसे कैसे बचें।

गाँव के एक जर्जर, साधारण से अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया। जहाँ उसे रखा गया, वह वार्ड कम, काल-कोठरी ज्यादा लग रही थी। दीवारों पर सीलन थी, हवा में बदबू और अंधेरा था। खुशबू को घुटन से उल्टियां आने लगीं। सोहनलाल ने वहाँ के कंपाउंडर जैसे डॉक्टर से कहा, "देखो डॉक्टर, हमें नॉर्मल डिलीवरी ही चाहिए। ऑपरेशन-वपरेशन में हम पैसे खराब नहीं करेंगे।"

खुशबू ने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और धीरे से अपने पति रोहन का हाथ पकड़कर बोली, "रोहन, मुझे यहाँ नहीं करना अपना बच्चा। मैं मर जाऊंगी यहाँ। मुझे मेरे मायके ले चलो, बिजनौर में। वहाँ हमारी फैमिली डॉक्टर हैं, मैं उन्हीं से डिलीवरी करवाना चाहती हूँ।"

शायद पहली बार रोहन को अपनी पत्नी की आंखों में मौत का डर दिखा। उसका पति-हृदय कांप उठा। उसने पिता की अवज्ञा करने का साहस किया और तुरंत एम्बुलेंस मंगवाई। खुशबू को लेकर वह बिजनौर की ओर भागा।

बिजनौर के अस्पताल में पहुंचते ही रोहन ने डॉक्टर से कहा "डॉक्टर साहब, जल्दी ऑपरेशन कर दीजिए! मेरी बीवी की हालत बहुत खराब है। सारे चेकअप पहले हो चुके हैं।"

डॉक्टरों की टीम तुरंत हरकत में आई। खुशबू को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। उसकी कमर में एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाया गया, आंखों पर पट्टी बांध दी गई। बाहर रोहन बेचैनी से टहल रहा था।

रात के करीब साढ़े बारह बजे, अस्पताल के सन्नाटे को एक नवजात के रोने की किलकारी ने चीर दिया। एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ था। डॉक्टर ने खुशबू के कान में कहा, "बधाई हो, बेटा हुआ है।" खुशबू की आंखों से आंसू बह निकले। डॉक्टर ने रोहन का नंबर मिलाकर फोन उसके कान से लगाया। खुशबू बस इतना ही कह पाई, "बेटा हुआ है..." और गहरी बेहोशी में चली गई।

खुशबू का मायका पास ही था। खबर सुनते ही उसके मम्मी-पापा, भाई-बहन दौड़े चले आए। वे साथ में मिठाई और समोसे के डिब्बे भी लाए थे, खुशी बांटने के लिए। लेकिन खुशी का यह माहौल सोहनलाल को फूटी आंख न सुहाया। उन्होंने अस्पताल के गलियारे में ही खुशबू के माता-पिता से झगड़ा शुरू कर दिया। खूब अपमान किया, उनका लाया सारा सामान वापस कर दिया। बेचारे अपनी जच्चा-बच्चा बेटी से एक झलक मिले बिना ही आंसू पोंछते हुए लौट गए।

अंदर वार्ड में एक और यातना खुशबू का इंतजार कर रही थी। उसकी सास ने रोहन को ही उसके कमरे में जाने से रोक दिया। रोहन जाना चाहता था, पर माँ ने डांट दिया, "वहाँ क्या करेगा? अपने आप ठीक होकर आएगी। हमने भी चार-चार बच्चे पैदा किए हैं। इसके पास मत बैठ, यह अभी अपवित्र है। सवा महीने तक इससे दूर ही रहना।"

खुशबू की आंखों में आंसू आ गए। जैसे-जैसे एनेस्थीसिया का नशा उतर रहा था, उसके पूरे शरीर में असहनीय दर्द हो रहा था। टांके खिंच रहे थे। वह हिल भी नहीं पा रही थी। जिस समय उसे अपने पति के एक स्पर्श, एक सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उसका पति बाहर माँ के पल्लू में बंधा आज्ञाकारी बेटा बना बैठा था।

सास पोते को गोद में लेकर खुश तो थी, पर खुशबू की परवाह किसी को न थी। उसने ताना भी मारा, "यह तो अच्छा हुआ बेटा हो गया, नहीं तो ऑपरेशन के पैसे भी बेकार जाते।"

अगले दिन दोपहर में खुशबू की मम्मी उससे मिलने आईं। माँ का हाथ पकड़कर खुशबू फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने सारी व्यथा कह सुनाई। माँ भी समय की नजाकत देखकर चुप रह गईं, बस बेटी के सिर पर हाथ फेरती रहीं।

सास तो जैसे जेलर बन गई थी। उसने दो दिन तक खुशबू को पीने के लिए पानी तक नहीं दिया। वह बेचारी प्यास से तड़पती रही। उसकी बहन उसे देखने आई और उसका हुलिया ठीक करने के लिए बालों में कंघा करने लगी, तो सास ने उसका भी अपमान कर दिया, "रहने दो! हमारे यहाँ जब तक बारही नहीं होती, बाल भी नहीं काढ़े जाते।"

चार दिन बाद खुशबू का जन्मदिन था, पर सास ने बड़ी चालाकी से रोहन को वापस दिल्ली भेज दिया। खुशबू शरीर से लाचार, चुपचाप यह मानसिक शोषण सहती रही। सात दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली। सास-ससुर उसे अपने गाँव ले गए और वहाँ एक छोटे, अंधेरे कमरे में चारपाई पर ला पटका। पोते को भी सिर्फ दूध पिलाने के लिए उसके पास दिया जाता। दिन में बस एक बार मूंग की दाल का पानी पीने को मिलता। सवा महीने तक उसकी थाली और गिलास भी अलग रख दिए गए। सास ने सबको बोल रखा था, "जब तक सवा महीने की रस्म नहीं होगी, यह अपवित्र रहेगी।"

पंद्रह दिन बाद उसे चेकअप के लिए फिर डॉक्टर के पास जाना था। डॉक्टर को दिखाकर खुशबू ने धीरे से रोहन से कहा, "मम्मी का घर पास में ही है। मेरा बहुत मन है मम्मी से मिलने का। जब यहाँ तक आए हैं तो उनसे भी मिल आऊं।" रोहन ने हाँ कर दी और ड्राइवर को साथ भेज दिया।

खुशबू ने सोचा था, मम्मी से मिलकर आधे घंटे में आ जाऊंगी। वह ड्राइवर के साथ चली गई। लेकिन पीछे से सास ने रोहन के कान भर दिए। रोहन ने फोन करके ड्राइवर को आदेश दिया, "खुशबू को बीच सड़क पर छोड़कर ही वापस आ जाओ।"

ड्राइवर ने पंद्रह दिन की जच्चा को, उसके नवजात बेटे के साथ, बीच सड़क पर उतार दिया और कार लेकर वापस चला गया। विडंबना देखिए, वह कार खुशबू की ही थी, जो रोहन को दहेज में मिली थी।

खुशबू हतप्रभ सी सड़क पर खड़ी रह गई। उसे कुछ समझ नहीं आया। न उसके पास पैसे थे, न कपड़े। वह दो खाली हाथ थी। पास ही गली में उसका मायका था। वह असमंजस में लड़खड़ाते कदमों से अपने मायके ही चली गई।

घर पहुंचकर उसने रोहन को फोन किया। उधर से हाल पूछने के बजाय रोहन गालियां बकने लगा, "मरो अपने बाप के घर जाकर! हम लोग शहर से बाहर निकल गए हैं, अब लेने नहीं आऊंगा।" खुशबू ने भी गुस्से में फोन काट दिया। गाली क्यों सुने, जब उसकी कोई गलती ही नहीं थी।

पांच दिन तक खुशबू अपने मायके में ऐसे ही बिना कपड़ों के, बिना दवाई के पड़ी रही। ससुराल से किसी का फोन नहीं आया। छठे दिन ससुराल से जेठानी का लड़का और वही ड्राइवर उसे लेने आए। खुशबू का स्वाभिमान जाग उठा। उसने मना कर दिया, "जो छोड़कर गया है, वही लेने आएगा।"

तभी रोहन का फोन आया। वह दिल्ली से ही बोल रहा था, "मैं दिल्ली में हूँ, नहीं आ सकता। पिताजी बाहर चौराहे पर खड़े हैं, तुम उनके साथ गाँव चली जाओ।" कहकर उसने फोन काट दिया।

खुशबू असमंजस में पड़ गई। उसका मन तो बिल्कुल नहीं था जाने का। वह सोच रही थी, पांच दिन से किसी ने खबर नहीं ली। अब लेने आए हैं। लेकिन मायके में भी कब तक रहा जा सकता है? "जो होगा, देखा जाएगा," सोचकर वह उनके साथ ससुराल चली गई।

जैसे ही वह ससुराल पहुंची, सास ने उसकी गोद से पोता छीन लिया और उससे कोई बात नहीं की। उस क्षण खुशबू के अंदर की दब्बू लड़की मर गई और एक मां जाग उठी। उसने रोहन को फोन किया और दृढ़ स्वर में कहा, "मैं तुम्हारे घर आ गई हूँ, लेकिन तुम्हें माफ नहीं किया है। बोल दो अपने घरवालों से, मेरे साथ या मेरे बेटे के साथ कुछ भी गलत किया, तो मैं सीधा पुलिस को फोन करूंगी।"

रीति-रिवाज के नाम पर सास ने दो महीने तक रोहन को खुशबू से मिलने नहीं दिया। खुशबू अपमान का घूंट पीकर, अपने बच्चे की खातिर सब सहती रही। जिसका पति ही साथ न दे, उसकी कोई सहायता नहीं करता।

दो महीने बाद रोहन उसे अपने साथ दिल्ली ले गया। बस की खिड़की से बाहर देखते हुए खुशबू यही सोच रही थी - _अब तक जो सहा, वो आगे नहीं सहूंगी। मैं दूसरा बच्चा भी नहीं करूंगी। मुझे अपने हक के लिए यह जंग स्वयं ही लड़नी है।_

संघर्ष अभी जारी है...
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 
Vandna.reporter@gmail.com