गरीब के बहते आँसू ,भाग :+05 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | गरीब के बहते आंसु - 5

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गरीब के बहते आंसु - 5


हरखू — जिंदगी और याददाश्त के बीच
कई दिन बीत चुके थे।
शहर के एक निजी अस्पताल में हरखू जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था। उसके सिर के बाएँ हिस्से में लगी चोट बेहद गंभीर थी। भीतर रक्त जम गया था, जिसके कारण मस्तिष्क के एक महत्वपूर्ण हिस्से में रक्तसंचार प्रभावित हो गया था।
डॉक्टर रंगनाथन और उनकी टीम लगातार उसके इलाज में जुटी थी।
उधर, सैकड़ों किलोमीटर दूर उसका घर जैसे हरखू के बिना धीरे-धीरे अपनी आवाज खो रहा था।
हर सुबह हरखू घर के आँगन में मुर्गियों और कबूतरों को दाना डालता था। उसके कदमों की आहट सुनते ही मुर्गियाँ दौड़कर उसके पास आ जातीं और कबूतर छत से उतरकर आँगन में बिखर जाते।
लेकिन अब कई दिनों से आँगन में दाना नहीं बिखरा था।
मुर्गियाँ इधर-उधर भटकतीं, फिर खाली बर्तन के पास खड़ी होकर जैसे किसी का इंतजार करतीं।
कबूतर भी छत की मुंडेर पर बैठे रहते।
शायद वे भी उस आदमी को खोज रहे थे, जिसकी हथेली से रोज उन्हें दाना मिलता था।
घर के बाहर लगे गेंदे के फूल भी जैसे उदास हो गए थे।
हरखू को फूलों से बहुत लगाव था। सुबह उठते ही वह पौधों के पास जाता, सूखे पत्ते हटाता और पानी डालता।
अब कई दिनों से पौधों को पानी तो मिल जाता था, लेकिन वह अपनापन नहीं था।
हवा चलती तो गेंदे के फूल झूमते जरूर थे, मगर उस आँगन में पहले जैसी महक नहीं रही थी।
जैसे फूल भी पूछ रहे हों—
“वह आदमी कहाँ चला गया, जो हमें देखकर मुस्कुराता था?”
घर का पालतू कुत्ता मोती तो मानो हरखू की प्रतीक्षा में ही जी रहा था।
हरखू की आवाज सुनते ही मोती अपनी पूँछ हिलाता हुआ दरवाजे तक दौड़ जाता था। कई बार तो वह हरखू के पीछे-पीछे खेत तक चला जाता और शाम को उसके साथ ही लौटता।
अब मोती अक्सर घर के बाहर जाकर सड़क की ओर देखता रहता।
कोई आदमी दूर से आता दिखाई देता तो वह अचानक उठ खड़ा होता।
कुछ कदम आगे बढ़ता...
फिर रुक जाता।
वह आदमी हरखू नहीं होता।
मोती वापस आकर दरवाजे के पास बैठ जाता।
इन दिनों उसने खाना भी कम कर दिया था।
बिमला उसे पुकारती—
“मोती... आ, खाना खा ले।”
मोती उसकी ओर देखता, लेकिन पहले जैसी उत्सुकता से बर्तन के पास नहीं आता।
शायद जानवर शब्दों को नहीं समझते, लेकिन घर के बदलते वातावरण को जरूर महसूस करते हैं।
मोती ने भी बच्चों की हँसी में आए बदलाव को महसूस कर लिया था।
पहले रूपाली और उसके छोटे भाई-बहन आँगन में दौड़ते रहते थे। उनकी हँसी से पूरा घर गूँजता था।
अब वही बच्चे चुपचाप बैठे रहते।
कभी-कभी रूपाली दरवाजे की ओर देखती और फिर बिना कुछ कहे अंदर चली जाती।
मोती बच्चों के चेहरों को देखता रहता।
शायद उसके मन में भी कोई अनकहा सवाल था—
“आखिर घर में ऐसा क्या हो गया है?”
उसे क्या मालूम था कि जिस आवाज का वह इंतजार कर रहा है, उसी आवाज के लौटने का इंतजार पूरा परिवार कर रहा है।
और किसी को नहीं पता था—
हरखू कहाँ है।
वह जीवित है या नहीं।
उधर अस्पताल में...
कई घंटे की मेहनत के बाद डॉक्टर रंगनाथन की टीम ने हरखू का ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था।
डॉक्टर बाहर आए और गंभीर स्वर में बोले—
“ऑपरेशन सफल रहा है, लेकिन अभी खतरा टला नहीं है।”
उन्होंने सबको समझाया—
“चोट मस्तिष्क के उस हिस्से के बहुत करीब है, जिसका संबंध स्मरण-शक्ति से है। अगले तीन-चार घंटे बेहद महत्वपूर्ण होंगे।”
तीन घंटे बीत गए।
फिर चार।
फिर पाँच।
हरखू अब भी अचेत था।
अचानक उसकी उँगली हिली।
नर्स ने तुरंत डॉक्टर रंगनाथन को बुलाया।
डॉक्टर ने उसकी आँखों पर रोशनी डाली।
“हरखू... मेरी आवाज सुन पा रहे हो?”
कुछ क्षण तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।
फिर उसकी पलकें काँपीं।
धीरे-धीरे उसकी आँखें खुलीं।
हरखू होश में आ रहा था।
डॉक्टर ने राहत की साँस ली।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
उन्होंने धीरे से पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
हरखू के होंठ काँपे।
बहुत धीमी आवाज निकली—
“हर...खू...”
डॉक्टर की आँखों में उम्मीद की एक किरण चमकी।
लेकिन अगले प्रश्न का उत्तर...
शायद इस पूरी कहानी की दिशा बदलने वाला था।
“तुम्हें अपने घर के बारे में कुछ याद है?”
हरखू ने डॉक्टर की ओर देखा।
उसकी आँखों में एक अजीब-सी खालीपन था।
मानो स्मृतियों का एक विशाल दरवाजा उसके सामने खड़ा हो...
लेकिन उसकी चाबी कहीं खो चुकी हो।
उसी रात, अपने घर में बिमला की आँख लग चुकी थी।
अचानक उसने स्वयं को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा पाया...
और फिर—
घने जंगल से सिंह की भयानक गर्जना सुनाई दी।
कुछ शिकारी उसकी ओर बढ़ रहे थे।
वह पीछे हटने लगी।
तभी दूर से आवाज आई—
“माँ...! माँ...!”
रूपाली उसकी ओर दौड़ती हुई आ रही थी।
“रूपाली! रुक जा!”
लेकिन वह नहीं रुकी।
अचानक उसका पैर फिसला और वह गहरी खाई में गिरने लगी।
“रूपालीऽऽऽ!”
बिमला चीखते हुए उसकी ओर दौड़ी—
और उसी क्षण उसकी आँख खुल गई।
वह पसीने से तर-बतर थी।
उसने घबराकर पास सो रही रूपाली को देखा।
रूपाली सुरक्षित थी।
बिमला ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि उसने ऐसा सपना क्यों देखा।
उसे हरखू की कोई खबर नहीं थी।
उसे यह तक मालूम नहीं था कि वह जीवित है या नहीं।
फिर भी उस रात उसके भीतर एक अनजाना भय जाग उठा था।
बाहर मोती अचानक उठकर दरवाजे की ओर देखने लगा।
और दूर कहीं...
रात के सन्नाटे में किसी अनजान पक्षी की आवाज सुनाई दी।
बिमला ने काँपते हुए दरवाजे की ओर देखा।
क्या यह केवल एक सपना था...
या कहीं दूर घट रही किसी घटना की अदृश्य आहट?