संगमरमर से बने उस विशाल और भव्य दरबार में जब ओजस्विनी ओझा के बूटों की आवाज गूंजी, तो वहां मौजूद हर शख्स की सांसें थम सी गईं. बडे- बडे राजनेता, खाकी वर्दी में खडे चापलूस पुलिस अधिकारी और बाबा सर्वानंद के तलवे चाटने वाले अमीर व्यापारी—सबकी नजरें उस युवा और तेजतर्रार महिला आईपीएस अधिकारी पर टिक गईं.
बाबा सर्वानंद अपने सोने के पानी से रंगे सिंहासन पर बैठे- बैठे मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था. उसकी वह मुस्कान मक्कारी और अहंकार से भरी हुई थी. उसने अपनी जिंदगी में ऐसे सैंकडों अधिकारी देखे थे जो पहले अकडकर आते थे, लेकिन उसके दरबार की चौखट पर पहुंचते ही उसके चरणों में लेट जाते थे. उसे पूरा यकीन था कि यह नई एसपी भी उसी पुरानी भीड का हिस्सा बनकर रह जाएगी।
सर्वानंद ने अपने हाथों को हवा में लहराते हुए एक बनावटी आशीर्वाद की मुद्रा बनाई और अपनी भारी, सम्मोहक आवाज में कहा, आइए, देवीजी! आपका इस पावन दरबार में स्वागत है. बक्सर की इस नई धरती पर आपकी तैनाती से हमें बहुत प्रसन्नता हुई है. कहिए, हमारे इस गरीबखाने में आपका आना कैसे हुआ? क्या कोई प्रशासनिक उलझन है, या बाबा के आशीर्वाद से अपनी किसी मुराद को पूरा कराने आई हैं?
हॉल में बैठे लोगों ने बाबा की इस बात पर मंद- मंद मुस्कुराना शुरू कर दिया. उन्हें लगा कि बाबा ने अपने शब्दों के बाण से इस अधिकारी को भी अपने शिकंजे में कस लिया है.
लेकिन ओजस्विनी के चेहरे पर न तो कोई मुस्कान थी और न ही कोई घबराहट. उनकी आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं, लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं को पूरी तरह से नियंत्रण में रखा हुआ था. उन्होंने अपनी ठुड्डी को थोडा और ऊपर उठाया, अपनी सख्त नजरें सीधे सर्वानंद की आंखों में डालीं और बेहद ठंडे, नपे- तुले शब्दों में जवाब दिया
बाबा सर्वानंद. प्रशासन की उलझनें सुलझाना मेरा काम है, और उन्हें कौन सुलझाएगा, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ. मेरा यहां आना किसी आशीर्वाद के लिए नहीं, बल्कि इस बात की तस्दीक करने के लिए हुआ है कि इस जिले की सीमा के भीतर कानून कितना सुरक्षित है और आपके इस तथाकथित आश्रम में नियमों की धज्जियां कैसे उडाई जा रही हैं. आज मैं सिर्फ एक औपचारिक निरीक्षण के लिए आई हूँ. आगे जैसी जरूरत होगी, वैसा कदम उठाया जाएगा।
ओजस्विनी के इन तीखे और बेबाक शब्दों ने दरबार के माहौल का तापमान अचानक गिरा दिया. राजनेताओं के चेहरों की हंसी गायब हो गई. बाबा सर्वानंद के माथे की नसें हल्की सी तन गईं. उसने जिंदगी में पहली बार किसी को अपने सामने इस तरह आंखें मिलाकर बात करते देखा था. उसके भीतर एक हल्का सा शक पैदा हुआ, लेकिन उसने अपनी पुरानी चालाकी के बल पर तुरंत खुद को संभाला और हंसते हुए कहा, बिल्कुल, बिल्कुल! कानून का सम्मान होना चाहिए, और हम हमेशा प्रशासन के साथ हैं।
ओजस्विनी ने एक बार तिरछी नजरों से उस सिंहासन और वहां बैठे हर एक चेहरे को देखा, फिर बिना झुके, अपनी पूरी शान के साथ वहां से बाहर निकल गईं. उसने जानबूझकर अभी कोई बडा टकराव मोल नहीं लिया था, क्योंकि वह जानती थी कि इस विशाल साम्राज्य को अंदर से खोखला करने के लिए पहले इसके गुप्त तहखानों तक पहुंचना जरूरी था.
निरीक्षण के नाम पर ओजस्विनी पुलिस बल के साथ आश्रम के उन हिस्सों में गईं, जहां आम भक्तों के जाने पर सख्त पाबंदी थी. बडे- बडे गार्ड्स और सीसीटीवी कैमरों की निगरानी वाले उस हिस्से में प्रवेश करते ही हवा का मिजाज बदल गया. वहां धूप नहीं पहुंचती थी, केवल पीली और मद्धम रोशनी वाले बल्ब जलते थे, जो इस जगह को और अधिक रहस्यमयी और डरावना बना रहे थे।
यहीं पर बने थे वे गोपनीय कमरे, जिन्हें बाबा सर्वानंद अपनी' विशेष साधना' और व्यक्तिगत कक्ष कहा करता था. इन्हीं कमरों के पीछे एक पुराना, जर्जर और सीलन से भरा कमरा था, जिसे आश्रम के निचले दर्जे के नौकरों और दासों के रहने के लिए छोड दिया गया था।
ओजस्विनी ने अपने एक इशारे से बाकी पुलिसकर्मियों और गार्ड्स को बाहर ही रोक दिया. उन्होंने कहा कि वह इस हिस्से का अकेले व्यक्तिगत निरीक्षण करना चाहती हैं. किसी की हिम्मत नहीं थी कि एक जिले की एसपी को रोक सके।
ओजस्विनी ने धीरे- धीरे उन तंग और अंधेरे गलियारों में कदम बढाए. उनके दिल की धडकनें तेज होने लगी थीं. वह जानती थी कि वह मंजिल के बहुत करीब पहुंच चुकी है. गलियारे के आखिरी कोने में, लोहे की एक बडी सी जंजीर से बंधे दरवाजे के पास एक कमजोर और झुकी हुई काया झाडू लगा रही थी.
वह शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका था. बदन पर एक मैला- कुचला सूती कपडा था, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आंखों के नीचे गहरे गड्ढे थे. वह कोई और नहीं, बल्कि ओजस्विनी की अपनी मां—निर्मला ओझा थीं।
ओजस्विनी के पैर वहीं जम गए. उनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब उमडने को तैयार था, लेकिन उन्होंने अपने होठों को भींचकर खुद को संभाला. उन्होंने अपनी वर्दी के कडे अनुशासन को तोडा और धीरे से आगे बढकर उस बुलाई हुई, कांपती हुई औरत के कंधे पर अपना हाथ रख दिया।
निर्मला ओझा ने चौंककर ऊपर देखा. उन्हें लगा कि शायद आश्रम का कोई गार्ड या मैनेजर उन्हें डांटने आया है. लेकिन जैसे ही उनकी नजर सामने खडी खाकी वर्दी वाली महिला अधिकारी के चेहरे पर पडी, उनकी सांसें अटक गईं. उन्होंने उस चेहरे को हजारों बार सपनों में, आंसुओं में और अपनी टूटी हुई रातों में देखा था।
ओ. ओजू निर्मला के गले से एक दर्दनाक और दबी हुई फुसफुसाहट निकली. उनका शरीर कांपने लगा. उन्होंने अपनी मैली और कांपती हुई हथेलियों से ओजस्विनी के चेहरे को छुआ, मानो उन्हें यकीन ही न हो रहा हो कि उनकी वह पांच साल की बच्ची अब इतनी बडी और ताकतवर आईपीएस अधिकारी बनकर उनके सामने खडी है।
मां. ओजस्विनी अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं. उन्होंने आगे बढकर अपनी मां को अपनी बाहों में भींच लिया. वह दोनों उस अंधेरे, सीलन भरे कोने में फूट- फूटकर रो पडीं—लेकिन उनकी यह रोने की आवाज इतनी धीमी थी कि दीवारें भी न सुन सकें.
निर्मला ने डरते हुए चारों तरफ देखा और घबराकर फुसफुसाते हुए बोलीं, बेटा. तू यहां क्यों आई? पागल हो गई है क्या? यह उस राक्षस की गुफा है! अगर सर्वानंद या उसके चेलों को पता चल गया कि तू मेरी बेटी है, तो वह तुझे भी जिंदा नहीं छोडेगा! जैसे उसने तेरे पिता गोपाल को मार डाला था, वैसे ही वह तुझे भी....
ओजस्विनी ने अपनी मां के मुंह पर अपनी उंगली रखी और उन्हें शांत कराते हुए दृढता से कहा, मां, डरो मत. अब वह दिन गए जब मैं छोटी और बेबस थी. आज मैं इस जिले की कानून हूँ, एसपी ओजस्विनी ओझा! मैं यहां रोने नहीं, इस पाखंडी राक्षस का अंत करने आई हूँ. मुझे सब बताओ मां. इन पंद्रह सालों में उसने तुम्हारे साथ क्या- क्या किया है? उसके काले कारनामों के वे कौन से सबूत हैं, जो इस साम्राज्य को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर सकते हैं?
निर्मला की आंखें डर और दर्द से भर आईं. उन्होंने कांपते हुए हाथों से ओजस्विनी को उस कोठरी के एक कोने में खींचा और धीरे- धीरे बाबा सर्वानंद के उन काले कारनामों की फेरबलि खोली, जिन्हें सुनकर किसी भी इंसान का खून खौल उठे।
निर्मला ने रोते हुए बताया, बेटा, यह बाहर से जितना बडा संत दिखता है, अंदर से उतना ही बडा शैतान है. इस आश्रम के इन गुप्त कमरों में वह क्या- क्या करता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. राजनीति के बडे- बडे धुरंधर, मंत्री और एसपी- कलेक्टर इसके सामने आकर झुकते हैं, क्योंकि सर्वानंद के पास उन सबका काला चिट्ठा है. यह उन सबकी गुप्त वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग अपने तहखाने में छुपाकर रखता है, जिससे यह सबको Blackmail करता है।
निर्मला ने आगे बताया, जो भी लडकी या महिला एक बार इसकी' सेवा' के लिए यहां लाई जाती है, उसकी इज्जत और जिंदगी दोनों हमेशा के लिए खत्म हो जाती हैं. जो इसका विरोध करता है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है—ठीक वैसे ही जैसे तेरे पिता को मारा गया था. इसके पास देश के कोने- कोने में फैले अपराधियों और तस्करों का नेटवर्क है, जो इसके इस पाखंड के बिजनेस को फंड करते हैं।
ओजस्विनी ने अपनी मां की बातें एक- एक करके अपने दिलो- दिमाग में बैठा लीं. उनके भीतर जल रही प्रतिशोध की आग अब एक भीषण दावानल का रूप ले चुकी थी. लेकिन वह जानती थी कि बिना सोचे- समझे सीधे हमला करने से यह चालाक ढोंगी बच निकलेगा. उसे अंदर से इस साम्राज्य की नींव को दीमक की तरह चाटना होगा।
तभी बाहर गलियारे में किसी के चलने की भारी आवाज सुनाई दी. किसी गार्ड के आने की आहट थी.
निर्मला घबरा उठीं और बोलीं, बेटा, कोई आ रहा है! जल्दी जा यहां से!
ओजस्विनी ने एक सेकंड की भी देरी नहीं की. उन्होंने अपने चेहरे पर तुरंत एक अजीब सा भाव लाया—एक ऐसा भाव जिसमें नफरत को छुपाकर चालाकी का पर्दा डाला गया हो. उन्होंने अपनी मां के सिर पर हाथ फेरा और दृढता से कहा, मां, डरो मत. अब खेल मेरी शर्तों पर खेला जाएगा. मैं इस पाखंडी को यह विश्वास दिलाऊंगी कि मैं उसकी सबसे बडी भक्त और शिष्या बनने आई हूँ।
ओजस्विनी ने अपनी वर्दी को दुरुस्त किया, अपने आंसुओं को पूरी तरह पछाडा और उस कमरे से बाहर निकल आईं. ठीक उसी समय, बाबा सर्वानंद का मुख्य मैनेजर और खास चेला भवानंद हाथ में फाइलें लिए हुए उधर से गुजर रहा था. भवानंद बाबा का छोटा भाई था. जो अब बाबा के पैसे का हिसाब किताब रखता था।
भवानंद ने ओजस्विनी को उस वीरान और अंधेरे हिस्से से निकलते हुए देखा तो उसके माथे पर बल पड गए. उसने शक भरी नजरों से पूछा, अरे मैडम! आप इस तरफ. इस गुप्त हिस्से में क्या कर रही थीं? यहां आम लोगों और अधिकारियों के जाने की अनुमति नहीं है।
ओजस्विनी ने जरा भी घबराए बिना, अपने चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लाई और बहुत ही शांत और आत्मविश्वास से भरे लहजे में कहा, भवानंद जी, मैंने सुना है कि बाबा सर्वानंद के दरबार में सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि बडे- बडे ताकतवर लोग भी आकर झुकते हैं. मैं तो बस यह देखना चाहती थी कि इस भव्यता के पीछे की हकीकत क्या है. और सच कहूं तो, बाबा की इस असीम शक्ति ने मुझे अंदर तक प्रभावित कर दिया है. मैं जल्द ही व्यक्तिगत रूप से बाबा से दीक्षा लेने के बारे में सोच रही हूँ।
भवानंद चौंक गया. उसने ओजस्विनी के चेहरे को गौर से देखा, लेकिन उसे उस शातिर महिला के मन में चल रहे तूफान का जरा भी अंदाजा नहीं हुआ. उसने मन ही मन सोचा कि अगर यह तेजतर्रार एसपी खुद बाबा की शिष्या बन जाती है, तो उनके इस साम्राज्य को कानूनी रूप से कभी कोई खतरा नहीं हो सकता.
भवानंद ने मक्कार हंसी हंसते हुए कहा, ओह! अगर ऐसा है, तो आपका स्वागत है मैडम. बाबा की कृपा जिस पर हो जाती है, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता. कल शाम को विशेष दरबार में आपको बाबा से मिलवाता हूँ।
ओजस्विनी ने अपनी तीखी नजरों से भवानंद को देखा और मन ही मन मुस्कुराई—चलो, जाल का पहला धागा तो मैंने खुद इनके हाथ में थमा दिया है. अब देखना यह है कि यह ढोंगी मेरे बिछाए जाल में कितनी जल्दी फंसता है।
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