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सरिता शीला से उतरने ही वाली थी कि सहसा रुक गई। शैल के तर्क ने उसके चित्त को विचार करने के पर विवश कर दिया। सोचने लगी, ‘सनातन विचारधारा कितनी विशाल और गहन है! अब तो मैं भी मुस्लिम सारा से सनातनी सरिता बन चुकी हूँ किन्तु अभी मेरा वह मुस्लिम संस्कार नष्ट न होने से मैं मछलियाँ खाने को तत्पर हो गई। मुझे उन संस्कारों का त्याग करना होगा। जब तक वे संस्कार रहेंगे, मैं सनातनी कैसे बन सकती हूँ। सारा से सरिता कैसे बन सकती हूँ?’
“मैं भी मांसाहार नहीं करूंगी। कभी नहीं। इसी समय से मैं उसका त्याग करती हूँ।”
“ऐसा क्या हो गया, सरिताजी?”
“मुझे स्मरण हो आया कि अब मैं सनातनी हूँ, मुस्लिम नहीं। इस स्मरण मात्र से मेरे मुस्लिम संस्कार नष्ट हो गए और सनातनी संस्कार जाग गए हैं।”
“वाह, सरिताजी। ईश्वर आपका कल्याण करे।”
“पानी का स्तर घटने के पश्चात हम कुछ प्रयास करेंगे, कदाचित कुछ प्राप्त हो जाय। अन्यथा ...।” सरिता रुक गई।
“अन्यथा क्या?”
“उपवास कर लेंगे।”
दोनों हंस पड़े। तभी कुछ पक्षी कन्दरा के भीतर उड़कर आ गए। पानी पर बैठ गए और जल क्रीडा करने लगे। दोनों उन्हें ध्यान से देखने लगे। कुछ समय क्रीडा करके पक्षी उड गए तब उनका ध्यान भंग हुआ।
“देखो, पानी उतर चुका है।”
“नदी का पानी पुन: नदी में लौट गया है क्या?”
“चलो आगे जाकर देखते हैं।”
दोनों कन्दरा के मुख के प्रति चलने लगे। उन्होंने देखा कि नदी का पानी अब अल्प मात्रा में ही शेष था। दोनों कन्दरा से बाहर आ गए।
“कहाँ चला गया इतना सारा पानी? कहाँ से आया था? वर्षा भी नहीं हुई है!”
“नदी ने स्वयं को समेट लिया है। हाँ, वर्षा तो नहीं हुई है।”
“चलो आसपास देखते हैं। फल के वृक्षों पर दृष्टि बनाए रखना। खाने लायक कुछ अवश्य मिल जाएगा।”
वृक्षों को देखते देखते दोनों चल रहे थे तभी सहसा शैल गिर पडा।
“क्या हुआ शैल?”
“ठोकर लगी है।”
सरिता शैल के समीप गई, “चोट लगी है क्या?”
“है थोड़ी सी।”
“थोड़ा विश्राम कर लो। पश्चात आगे बढ़ते हैं।” सरिता भी वहीं बैठ गई। शैल का ध्यान अपनी चोट पर था, सरिता आसपास निरीक्षण कर रही थी। एक स्थान पर जाकर उसकी दृष्टि स्थिर हो गई।
“शैल, वहाँ देखो। किसी गाड़ी के पहिये के निशान लग रहे हैं, हैं न?”
“कोई बड़ी गाड़ी इस मार्ग से निकली है।”
“और वह भी अभी अभी। यह निशान ताजा हैं।”
“जब हम कन्दरा में घुसे थे तब यह निशान नहीं थे। अर्थात कोई हमें ढूंढते हुए यहाँ से गया है।”
“क्या?”
“हाँ सरिता जी।”
“तो उठो, भागों। चलो पुन: कन्दरा में घुस जाओ।”
“चलो।“” दोनों भीतर जाने लगे।
“वहाँ उस वृक्ष पर कुछ फल है, तोड़ते चलते हैं। खाने योग्य होंगे तो कन्दरा में जाकर खाएंगे नहीं तो नदी का पानी ही पी लेंगे।”
“एक बात समज में आई शैल?”
“कौन सी बात?”
“यह फल खाने योग्य नहीं है।”
“वह तो ठीक है। और कुछ?”
“जब हम कन्दरा से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे थे, जब नदी ने हमारा मार्ग अपने जल स्तर से रोके रखा था, ठीक उसी समय वह गाड़ी यहाँ से निकली होगी।”
शैल ने विचार किया, गणना की और अनुमान लगाया, “गाड़ी के यहाँ से जाने का समय ठीक वही होना चाहिए।”
“अर्थात...कुछ समझे?”
“नहीं।”
“समजाती हूँ। जब गाड़ी यहाँ से निकल रही थी, हम भी उसी समय कन्दरा से बाहर जाने का प्रयास कर रहे थे। यदि नदी ने हमारा मार्ग न रोका होता तो?”
“तो हम पकड़े जाते। हैं न?”
“यही तो। न कोई वर्षा, न कहीं से अतिरिक्त पानी आया। तथापि नदी ने अपने जल स्तर को बढ़ाया और उस जल स्तर से हमें रोके रखा। जब तक गाड़ी यहाँ से दूर न चली गई, नदी हमारे मार्ग की बाधा बनकर कन्दरा में रही।”
“जब संकट टल गया तो ...।”
“मार्ग खोल दिया नदी ने।”
“नदी ने ऐसा कैसे किया? क्यों किया?”
“नदी नहीं, मैया कहो, मैया। मैया ने हमें बचाने के लिए ही कन्दरा को पानी से भर दिया। न हम बाहर जा सकें, न कोई भीतर आ सके। कन्दरा को पानी से भरा देखकर किसी ने उसमें प्रवेश करने की न चेष्टा की होगी न साहस।”
“और हम बच गए।”
“मैया ने हमें बचाया है। धन्य हैं आप माता शुतुद्री।”
“शुतुद्री नहीं, सतलज नाम है मैया का।”
“मैया का मूल नाम शुतुद्री है।“”
दोनों ने मैया को हाथ जोड़े।
“जय मा शुतुद्री।”