समय का पहिया घूमता रहो। देखते-देखते घर को सगरा अनाज, धन-दौलत ओर सामान खतम हो गओ।
पुरखान ने ठीकई कहो हातो—
"जिस घर में कमाई को दाना न आवै ओर खर्चा की मुट्ठी रोज खुलती रहै, उस घर के भरे कोठार भी एक दिन चूहा न सही, खाली जरूर हो जात हैं।"
पर रांड के संड को इन बातन की जरा-सी भी चिंता नई थी।
उसके वास्ते दुनिया में दोई चीज जरूरी थीं—पेट दुउर उसकी तेल पिलाई लट्ठ।
हर सवेरे उसकी बहू जैसे-तैसे कुछ जुगाड़ करके उसके लाने रोटी बना देती।
रांड को संड रोटी देखके ऐसे टूट पड़ता जैसे बरसों से उपवास कर रहो हो।
पेट भरके खाता, फिर बची रोटियन कपड़े में बाँधके अपनी गठरी में ठूँसता, तेल पिलाई लट्ठ कंधे पे धरता ओर हमेशा की तरह पुलिया की तरफ चल देता।
घर में का हो रओ है, बहू भूखी है कि सास भूखी है—इन बातन से उसको उतनोई मतलब था जितनो भैंस को बीन बजाने से।
उसे तो बस पुलिया दिखनी चाहिए थी।
इधर बूढ़ी सास ओर उसकी बहू पानी पी-पी के अपनी भूख को समझाती रहीं।
पहले दिन बहू बोली—
"अम्मा, चलो आज पानी पीके काम चला लेते हैं।"
बूढ़ी बोली—
"हाँ बेटी, आज तो चला लेत हैं।"
दूसरे दिन भी पानी पीके दोनों ने पेट को समझा दिया—
"बेटा, आज छुट्टी मना ले।"
तीसरे दिन तक पेट ने भी कह दिया—
"अबे, मजाक मत करो!"
चौथे दिन तो हालत ऐसी हो गई कि पेट अंदर से ढोल बजाने लगा।
चार दिन हो गए थे। दोनों के मुँह में अन्न को एक दाना तक नई गओ था।
फिर भी रांड के संड के सामने दोनों ने दुःख की एक बात तक नई कही।
सेठ की बेटी भले घर की, संस्कारी ओर धीरज वाली मोड़ी थी।
बचपन से बाप ने समझाओ था—
"बिटिया, ब्याह के बाद ससुरालई तेरो घर है। सुख मिले तो साथ रहियो, दुःख मिले तो भी साथ रहियो। मायके में ससुराल की बुराई मत करियो।"
मोड़ी ने बाप की बात गाँठ बाँध ली थी।
इसलिए उसने अपने पिता से कभी कुछ न कहो।
न भूख की बात, न गरीबी की, न घर की तंगी।
ओर रांड के संड की निकम्मी आदतों की तो बात ही छोड़ो।
उधर बूढ़ी सास बहू की हालत देख-देखकर परेशान रहती।
एक दिन बोली—
"बेटी, तू सेठ की लाड़ली है। तेरे बाप के घर अनाज की कमी नई, पैसा कम नई। यहाँ काहे भूखी मर रही है? चली जा अपने मायके।"
बहू चुपचाप सास के पैरन के पास बैठ गई।
बोली—
"अम्मा, अब यही मेरो घर है। डोली जिस आँगन में आई है, अर्थी भी यहीं से उठेगी।"
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली—
"वो अपनी जिम्मेदारी समझें या न समझें, मैं अपनी जिम्मेदारी कैसे छोड़ दूँ?"
बूढ़ीअम्मा बोली—
"पर बेटी, जिम्मेदारी निभाने के चक्कर में पेट को भी तो कुछ चाहिए न !"
बहू बोली—
"बहू को धरम सिर्फ सुख में साथ देना नई है अम्मा, दुःख में भी साथ निभाना है।"
यह सुनके बूढ़ी की आँख में आँसू आ गए।
मन में बोली—
"हे भगवान! बहू तो सोने की निकली अउर मेरा बेटा... वो तो सोने की दुकान में पड़ा पत्थर निकर गओ!"
चार दिन तक भूखी रह-रहके आखिर बहू का धीरज भी टूट गओ।
उस दिन वो धीरे-धीरे सास के पास आई।
चेहरा पीला, आँखें धँसी हुईं ओर आवाज ऐसी जैसे हवा में टँगी घंटी हो ।
बोली—"अम्मा..."
बूढ़ी ने पूछा—
"का भयो बेटी?"
बहू काँपती आवाज में बोली—
"अम्मा... मुझे बहुत जोर की भूख लगी है।"
इतना कहते ही उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
"अगर आज भी कुछ नई खाओ तो शायद मैं बचूँ न।"
उसने पेट पर हाथ रखो।
फिर बोली—
"अम्मा... मैं अकेली थोड़ी हूँ। मेरे पेट में आपका पोता पल रओ है। चार दिन से अन्न नई गओ। उसकी हर हलचल मुझे महसूस हो रही है।"
यह सुनते ही बूढ़ी का कलेजा मुँह को आ गओ।
उसने बहू को सीने से लगा लिया।
आँखों से आँसू बहते-बहते बोली—
"हे दीनानाथ! कैसी परीक्षा ले रए हो? एक तरफ भूखी बहू, दूसरी तरफ पेट में मासूम बच्चा... ओर ऊपर से मेरा वो रांड का संड!"
फिर आसमान की तरफ देखकर बोली—
"भगवान, गलती मेरी हो तो सजा मुझे दे देना, पर उस निकम्मे को भूख मत लगाना... उसको तो भूख लगी तो पूरा गाँव खा जाएगा!"
बहू आँसू पोंछते हुए भी हल्का मुस्कुरा दी।
तभी बूढ़ी की नजर आँगन के एक कोने में पड़ी।
अचानक उसे कुछ याद आ गओ।
उसे याद आया— चूड़ियाँ।
एक चूड़ी रांड के संड ने यूँई आँगन में फेंक रखी थी।
दूसरी अपनी प्यारी तेल पिलाई लट्ठ में बाँध रखी थी।
बूढ़ी मन में बोली—
"अरे हाँ! ये चूड़ी तो बची है!"
बूढ़ी ने चूड़ी उठाई, धोती के पल्लू में कसके बाँधी ओर धीरे-धीरे गाँव के बनिए की दुकान पर पहुँच गई।
दुकान पर पहुँचकर बोली—
"बेटा..."बनिया बोला—
"आओ अम्मा, का चाहिए?"
बूढ़ी बोली—
"घर में अन्न को एक दाना नई बचो। बहू चार दिन से भूखी है। जितना इस चूड़ी के बदले सामान बन पड़े, दे दे। बाकी उधार रह जाए तो मैं मेहनत-मजूरी करके चुका दूँगी।"
उसने चूड़ी गल्ले पर रख दी।
बनिए ने चूड़ी उठाई।
एक बार देखी।
फिर दूसरी बार देखी।
फिर आँखें मिचमिचाईं।
फिर चूड़ी को कान के पास ले जाकर ऐसे देखा जैसे चूड़ी अभी बोल देगी—
"राम-राम बनिया जी!"
बनिया बोला—
"अम्मा... ये चूड़ी कहाँ से आई?"
बूढ़ी बोली—
"घर में पड़ी थी।"
बनिया—
"घर में पड़ी थी?"
"हाँ।"
"अम्मा, तुम्हारे घर में ऐसी चीजें पड़ी रहती हैं क्या?"
बूढ़ी बोली—
"और का! एक पड़ी थी, एक लट्ठ में बँधी है।"
बनिया ने माथा पकड़ लिया।
"अम्मा के घर तो खजाना पड़ा है ओर अम्मा को खबरई नई!"
बनिया बोला—
"अम्मा, दस-दस किलो गेहूँ, चावल, दाल, आटा, चीनी, नमक, तेल—सब दे दूँ?"
बूढ़ी घबरा गई।
"अरे नई बेटा! इतना सामान लेकर मैं का करूँगी? जितना इस चूड़ी में आता हो उतना दे दे।"
बनिया फिर बोला—
"अम्मा, जितना इस चूड़ी के बदले बनता है, उतना दे दूँगा।"
बूढ़ी बोली—
"अरे, मजाक मत कर बेटा। दो-चार सेर आटा, थोड़ी दाल, थोड़ा चावल ओर जरा-सा तेल दे दे। घर में चार दिन से चूल्हा नई जला।"
बनिया बोला—
"अम्मा, मैं मजाक नई कर रओ!"
बूढ़ी बोली—
"तो फिर दस-दस किलो की बात काहे कर रओ?"
बनिया बोला—
"क्योंकि चूड़ी की कीमत..."
बूढ़ी बीच में बोल पड़ी—
"बेटा, चूड़ी की कीमत-विमत मोये नई मालूम। मुझे तो बस इतना मालूम है कि घर में पेट खाली हैं!"
बनिया सोच में पड़ गओ।
मन में बोला—
"लगता है अम्मा चूड़ी की असली कीमत जानती है, बस बता नई रही।"
फिर बोला—
"अम्मा, अगर कहो तो पचास-पचास किलो गेहूँ, चावल, आटा, दाल, चीनी, तेल सब तौल दूँ?"
बूढ़ी की आँखें गोल।
"पचास किलो?"
"हाँ।"
"पचास किलो?"
"हाँ अम्मा।"
बूढ़ी ने सिर पकड़ लिया।
"अरे बेटा! तू मेरे साथ ठट्ठा कर रओ है का?"
बनिया—
"नई अम्मा, मैं बिलकुल गंभीर हूँ।"
बूढ़ी—
"तो फिर मेरे साथे क्यों खेल रओ है?"
बनिया—
"मैं खेल नई रओ!"
बूढ़ी झल्लाकर बोली—
"अरे, तुझे ठट्ठा करने को यही एक बूढ़ी औरत मिली है? गाँव में कोई जवान नई मिली?"
दुकान पर बैठे लोग हँसी रोकने लगे।
बूढ़ी बोली—
"पहले अपने बाप से कहियो ब्याह करवा दे! दिनभर दुकान पे बैठके गाँव की लुगाइयन से ठट्ठा करता फिरता है!"
बनिए की हालत ऐसी हो गई जैसे किसी ने उसकी दुकान का हिसाब उल्टा कर दिया हो।
बूढ़ी ने चूड़ी उठाई।
"मैं भूखी-प्यासी तेरे पास आस लेकर आई थी। तू पचास-पचास किलो की बात करके मेरो मजाक उड़ा रओ!"
बनिया हाथ जोड़कर बोला—
"अम्मा, मेरी बात तो सुनो!"
बूढ़ी—
"नई सुनूँ! जितना इस चूड़ी में आता हो उतना दे देता, मैं चुपचाप चली जाती।"
अब बनिए को पूरा विश्वास हो गओ—
अम्मा को चूड़ी की असली कीमत का रत्ती भर भी अंदाजा नई है।
वह तुरंत उठा।
"अम्मा, बैठो-बैठो। गुस्सा मत करो।"
चौकी खिसकाई।
पानी लाया।
बोला—
"पहले पानी पी लो।"
बूढ़ी ने पानी पिया।
बनिए ने गल्ले से गुड़ का टुकड़ा निकालकर दिया।
"लो अम्मा, ये खा लो। खाली पेट गुस्सा ज्यादा आवत है।"
बूढ़ी ने गुड़ खाया और बोली—
"बेटा, तू पहले बता देता कि इतना सामान देगा तो मैं इतनी देर बहसई क्यों करती!"
बनिया मन में बोला—
"अम्मा, तुम सामान लेने आई थीं या मेरा खानदान जाँचने?"
फिर उसने जोर से आवाज लगाई—
"अरे ओ! सुनो सब!"
सारे नौकर दौड़ते हुए आए।
बनिया गरजकर बोला—
"अभी इसी समय अम्मा के घर सामान पहुँचाओ!"
नौकर बोले—
"का-का भेजें मालिक?"
बनिया बोला—
"सौ-सौ किलो गेहूँ, सौ-सौ किलो आटा, चावल, दाल, चीनी, नमक, तेल—घर का जितना जरूरी सामान है, सब!"
नौकरों की आँखें फैल गईं।
एक नौकर धीरे से दूसरे से बोला—
"लगता है मालिक चूड़ी देख पगलाए गायो है । दूसरा बोला—
"चुप रह हमे का कारणों है , कही सुन ले तो अगली बैलगाड़ी में तुझे ही लदवा देगा!"
बनिया गरजा—
"क्या फुसफुसा रए हो? जल्दी जाओ!"
नौकरों ने हाथ जोड़ दिए—
"जैसी आज्ञा मालिक!"
और देखते ही देखते गोदाम में खलबली मच गई।
बोरियाँ उठने लगीं।
बैलगाड़ियाँ जुड़ने लगीं।
ओर बूढ़ी माँ एक तरफ बैठी ये सब देखती रह गई।
उसके मुँह से बस इतना निकला—
"हे भगवान... मैंने तो दो रोटी माँगी थीं, ये बनिया पूरा खेत ही घर भेज रओ है!" इतनों का है एक चूड़ी में ,मोये पहले पाओ होता तो बहू भूखी नहीं मारती।।।
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नमस्कार पाठकों
मैने ये कहानी उसी भाषा मे लिखने की कोशिश की है जिसमें, मैने सुना था।
कई सालों बाद उस भाषा को लिखना जिसको हम शायद ही कभी अब बोलते है तोड़ा तो मुश्किल होता है ।
पर मजा भी बहुत आ रहा हैं।
अगर आपको कहानी पसंद आए तो कृपया वोट करना ।।
धन्यवाद। मेरी कहानी पढ़ने के लिए।।।।।।।