Ankaha sach (Part-6) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच (भाग-6)

Featured Books
Categories
Share

अनकहा सच (भाग-6)

हितेश अपनी बाइक चालू करता है और राजू को पीछे बिठाकर उसके गाँव की तरफ निकल पड़ता है।
रास्ते भर हितेश बेहद खुश होकर बातें कर रहा था, "यार राजू! कितना अच्छा है न... हम दोनों पास ही के गाँव के हैं और उस अनजान शहर में मिले। फिर हमारी इतनी गहरी दोस्ती हो गई, इसे सच में किस्मत ही कहते हैं! वरना शहरों में कहाँ अपने आसपास के लोग मिलते हैं। मुझे तो बहुत खुशी हो रही है भाई!"
राजू बस ख़ामोशी से उसकी हाँ में हाँ मिलाता रहा। रास्ते भर उसके दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। राजू हितेश को रास्ता बताता गया और आखिरकार वे दोनों उसके घर पहुँच गए।
जैसे ही वे बाइक से उतरे और घर के आँगन में अंदर गए, सामने खाट पर राजू के दादाजी बैठे थे। राजू ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए।
दादाजी ने मुस्कुराते हुए सिर पर हाथ रखा, "अरे राजू! आ गए तुम बेटा, कैसे हो?"
राजू ने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा, "जी दादाजी, ठीक हूँ। यह मेरा दोस्त हितेश है, पास वाले गाँव का ही है। कल इसके घर रुक गया था।"
हितेश ने भी तुरंत आगे बढ़कर दादाजी के पैर छुए और आशीर्वाद लिया। इतने में दादी भी वहाँ आ गईं। सब आपस में हाल-चाल पूछ ही रहे थे कि राजू की बहन पानी का जग और गिलास लेकर बाहर आई। उसने हितेश को पानी दिया और राजू को देखा। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए फिक्र और परेशानी साफ़ दिख रही थी।
सब आँगन में बैठकर बातें करने लगे। माहौल थोड़ा सामान्य हो ही रहा था कि तभी अचानक हितेश ने बेफिक्री से पूछ लिया—
"अरे राजू, तेरे मम्मी-पापा कहाँ हैं? वो घर पर नहीं हैं क्या?"
हितेश का यह सवाल सुनते ही आँगन में अचानक एक खौफनाक सन्नाटा छा गया।
राजू ने तुरंत अपनी नज़रें चुराकर अपनी बहन की तरफ देखा। दादा, दादी, बहन और राजू—सबकी ज़ुबान जैसे सिल गई थी।
तभी घर के अंदर के कमरे से कुछ चिल्लाने और चीज़ें फेंकने की आवाज़ें आने लगीं। राजू ने उन आवाज़ों को अनदेखा करने की कोशिश की, जैसे वे उसके कानों तक पहुँच ही न रही हों। वह घबराकर बोला, "अह... हाँ, वो कहीं बाहर गए होंगे... आ जाएँगे, मिल लेना।"
लेकिन अंदर से आती आवाज़ें और तेज़ होती चली गईं। घर का हर सदस्य परेशान हो उठा। राजू का मन कर रहा था कि ज़मीन फटे और वह उसमें समा जाए। वह नहीं चाहता था कि हितेश इस खौफनाक मंज़र का गवाह बने।
और तभी... घर के अंदर से एक आदमी बदहवास हालत में बाहर निकला।
वह इंसान पूरी तरह नशे में धुत था और पागलों की तरह हरकतें कर रहा था। उसके पीछे-पीछे एक औरत उसे पकड़ने और संभालने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उस नशेड़ी आदमी ने उस औरत को इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि वह ज़मीन पर जा गिरी!
यह देखते ही राजू की बहन बदहवास होकर चिल्लाई—"माँ!"
राजू और उसकी बहन दोनों अपनी माँ को संभालने के लिए दौड़े। बहन ने माँ को उठाया और रोते हुए अपने पिता से कहा, "पापा! आप यह क्या कर रहे हैं?!"
राजू के पिता ने नशीली आँखों से बेटी को देखा और ज़ोर से चिल्लाए, "तू दूर हो जा मेरी नज़रों से! बार-बार आ जाती है सामने... निकल यहाँ से!"
आँगन में चीख-पुकार मच गई। दादा-दादी भी लाचार नज़रों से सब देख रहे थे और उन्हें संभालने की कोशिश कर रहे थे।
हितेश वहीं खड़ा यह सब देख रहा था। उसके होश उड़ चुके थे। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह इस घर में रुके, राजू की मदद करे या चुपचाप यहाँ से चला जाए। राजू जिस खालीपन से भाग रहा था, उसका असली चेहरा आज हितेश के सामने नंगा खड़ा था।
काफी मशक्कत और हंगामे के बाद किसी तरह सिचुएशन को थोड़ा शांत किया गया।
माहौल की कड़वाहट और राजू की झुकी हुई नज़रें देखकर हितेश ने धीमी आवाज़ में राजू से कहा, "अम्म्म्... राजू, मैं... मैं अब चलता हूँ भाई। फिर मिलते हैं।"