hukm aur hasarat in Hindi Love Stories by Diksha mis kahani books and stories PDF | हुक्म और हसरत -39

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हुक्म और हसरत -39

🔥♥️ हुक्म और हसरत ♥️🔥

#Arsia

एपिसोड 39 — एक आवाज़ का पीछा 

अगली सुबह रायगढ़ महल में बाकी दिनों की तरह ही शुरुआत हुई।

महल के गलियारों में कर्मचारियों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। रसोई से नाश्ते की खुशबू आ रही थी और बाहर बगीचे में माली पौधों को पानी देने में व्यस्त थे।

लेकिन नाश्ते की मेज पर बैठी सिया का ध्यान इन सब चीजों में बिल्कुल नहीं था।

उसके सामने चाय का कप रखा था। प्लेट में नाश्ता भी था, मगर उसकी नजरें कहीं दूर अटकी हुई थीं।

बार-बार उसके कानों में वही गहरी आवाज गूंज रही थी।

“एक पुरस्कार मेरे काम को नहीं बदलता।”

सिया ने धीरे से अपनी उंगली मेज पर थपथपाई।

आखिर उस आवाज में ऐसा क्या था, जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था?

उसे सिर्फ इतना याद था कि जैसे ही Mr. S. ने बोलना शुरू किया था, उसके मन में एक अजीब-सा एहसास हुआ था। जैसे वह आवाज उसके लिए बिल्कुल अनजान भी थी और कहीं न कहीं जानी-पहचानी भी।

लेकिन कहां सुनी थी उसने?

किससे सुनी थी?

जितना सोचती, उतना ही उलझती जाती।

“राजकुमारी!”

काव्या की आवाज सुनकर सिया अपने ख्यालों से बाहर आई।

“हम्म?”

काव्या उसके सामने बैठते हुए बोली, “आप ठीक हैं?”

“हां, क्यों?”

“क्योंकि पिछले दस मिनट से आप चाय को ऐसे घूर रही हैं, जैसे उसने आपका कोई जरूरी राज चुरा लिया हो।”

सिया ने अपने सामने रखा कप देखा।

“मैं चाय को नहीं घूर रही थी।”

“अच्छा? तो फिर किसे याद कर रही थीं?”

सिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“किसी को भी नहीं!”

काव्या ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा, “मैंने तो किसी का नाम भी नहीं लिया।”

सिया समझ गई कि वह जानबूझकर उसे छेड़ रही है।

“काव्या, तुम्हें सुबह-सुबह कोई काम नहीं है क्या?”

“बहुत सारे काम हैं, राजकुमारी। लेकिन आपसे ज्यादा जरूरी काम तो कोई हो ही नहीं सकता।”

“बहुत मजाक सूझ रहा है तुम्हें!”

“अब क्या करूं? आपकी हालत देखकर हंसी आ रही है।”

सिया ने नैपकिन उठाकर उसकी तरफ फेंकने का नाटक किया।

“ज्यादा मत बोलो!”

काव्या खिलखिलाकर हंस पड़ी।

तभी रोशनी भी वहां आ गई।

“सुबह-सुबह किस बात पर इतना हंस रही हो तुम दोनों?”

काव्या ने बिना देर किए जवाब दिया, “हमारी राजकुमारी किसी के ख्यालों में खोई हुई हैं।”

सिया ने तुरंत टोका, “काव्या!”

रोशनी की आंखें चमक उठीं।

“किसके ख्यालों में?”

“किसी के भी नहीं!” सिया ने झुंझलाकर कहा।

काव्या ने रोशनी के पास झुककर धीरे से कहा, “Mr. S.!”

रोशनी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“ओह! वो रहस्यमयी कारोबारी?”

“तुम दोनों चुप करोगी?” सिया ने अपना चेहरा हाथों में छिपाते हुए कहा।

लेकिन दोनों को आज उसे परेशान करने का मौका मिल गया था।

रोशनी उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई।

“अच्छा, सच-सच बताइए। आपको उनकी आवाज पसंद आई या आप सच में उन्हें पहचानने की कोशिश कर रही हैं?”

सिया ने हाथ नीचे किए।

इस बार उसके चेहरे पर हंसी नहीं थी।

“मैं सच कह रही हूं, रोशनी। मुझे उनकी आवाज कुछ जानी-पहचानी लगी थी।”

काव्या और रोशनी ने एक-दूसरे को देखा।

“लेकिन आपने उनसे पहले कभी बात तो नहीं की?” रोशनी ने पूछा।

“नहीं। कम से कम मुझे तो याद नहीं।”

“तो फिर हो सकता है कि आपको ऐसा ही लगा हो,” काव्या ने कहा।

सिया ने सिर हिलाया।

“शायद। लेकिन एक बात है…”

“क्या?”

“जब उनकी आवाज सभागार में गूंजी थी, तब मुझे लगा था कि मैं उस आवाज को पहले भी सुन चुकी हूं। सिर्फ आवाज नहीं… उनका बोलने का तरीका भी कुछ जाना-पहचाना था।”

काव्या ने सोचते हुए कहा, “हो सकता है आपने किसी दूसरे कारोबारी की आवाज सुनी हो।”

“हो सकता है।”

रोशनी ने तुरंत बात बदलते हुए कहा, “वैसे आवाज चाहे जैसी भी हो, मैं तो उनसे मिलना चाहती हूं।”

सिया ने उसे देखा।

“तुम भी?”

“हां! इतनी रहस्यमयी शख्सियत आखिर कैसी होगी? हमेशा नकाब में रहते हैं, किसी से ज्यादा बात नहीं करते और उनके बारे में किसी को कुछ पता नहीं। अब इतनी जिज्ञासा तो होगी ही!”

काव्या ने हामी भरी।

“और उनकी आवाज…”

रोशनी ने तुरंत कहा, “बहुत आकर्षक!”

दोनों हंस पड़ीं।

सिया भी मुस्कुराई, लेकिन उसका ध्यान अब भी उसी सवाल पर अटका था।

वह आवाज आखिर किसकी थी?

---

एक सवाल, कई उलझनें

कुछ देर बाद सिया नाश्ता करके उठी ही थी कि उसकी नजर सामने से आते अर्जुन पर पड़ी।

हमेशा की तरह सधा हुआ व्यक्तित्व, गंभीर चेहरा और अपने काम पर केंद्रित नजरें।

अर्जुन ने उसके पास आकर कहा, “राजकुमारी, गाड़ी तैयार है।”

सिया ने उसकी तरफ देखा, लेकिन इस बार उसकी नजर कुछ ज्यादा देर तक अर्जुन के चेहरे पर टिकी रही।

अर्जुन ने उसकी निगाह महसूस की।

“कोई परेशानी है?”

सिया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो फिर?”

“कुछ नहीं।”

अर्जुन ने अपनी घड़ी देखी।

“हमें आधे घंटे में दफ्तर पहुंचना है। अगर आप तैयार हैं तो चल सकते हैं।”

सिया ने उसकी बात अनसुनी करते हुए पूछा, “खड़ूस…”

“जी, राजकुमारी?”

“एक बात पूछूं?”

“पूछिए।”

सिया उसके थोड़ा करीब आई।

“आपकी आवाज हमेशा ऐसी ही रहती है?”

अर्जुन ने एक पल उसे देखा।

“कैसी?”

“ऐसी… गंभीर।”

“मैं सामान्य तरीके से बात कर रहा हूं।”

सिया ने होंठ दबाकर अपनी हंसी रोकने की कोशिश की।

“आपको पता है, कल मैंने एक आदमी की आवाज सुनी थी। बिल्कुल गहरी, गंभीर और…”

वह रुक गई।

अर्जुन ने पूछा, “और?”

“कुछ नहीं।”

“राजकुमारी, अगर कोई बात कहनी है तो पूरी कहिए।”

सिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “उसकी आवाज मुझे आपकी आवाज जैसी लगी।”

कुछ पल के लिए दोनों के बीच चुप्पी छा गई।

काव्या, जो पास ही खड़ी थी, तुरंत बोल पड़ी, “अरे हां! Mr. S. की आवाज! मैंने भी सोचा था कि दोनों की आवाज में कुछ समानता है।”

सिया ने उसे घूरा।

“तुम्हें हर बात में बोलना जरूरी है?”

“नहीं, लेकिन इतनी दिलचस्प बात हो रही हो तो चुप कैसे रहूं?”

अर्जुन ने दोनों की तरफ देखा।

उसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था।

“दुनिया में बहुत लोगों की आवाज एक जैसी हो सकती है।”

सिया ने उसकी बात पर गौर किया।

“लेकिन उनका बोलने का तरीका भी…”

“राजकुमारी,” अर्जुन ने उसकी बात काटते हुए कहा, “सिर्फ आवाज के आधार पर किसी के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।”

उसका स्वर न ज्यादा कठोर था, न ज्यादा नरम। बिल्कुल वैसा ही, जैसा वह हमेशा सिया से बात करते समय रखता था।

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

“आप सही कह रहे हैं।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तो चलें?”

सिया ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।

“एक मिनट।”

“अब क्या हुआ?”

“आपने मेरी बात का जवाब तो दिया ही नहीं।”

“किस बात का?”

“अगर मैं कहूं कि मुझे Mr. S. से मिलना है, तो?”

अर्जुन ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “पहले उनके बारे में पूरी जानकारी ली जाएगी।”

सिया ने आंखें घुमाईं।

“मैंने पूछा था कि मिलना चाहिए या नहीं।”

“और मैंने बताया कि उससे पहले क्या जरूरी है।”

“आपसे बात करना सच में बहुत मुश्किल है!”

“यह बात आप पहले भी बता चुकी हैं, राजकुमारी।”

काव्या अपनी हंसी रोक नहीं पाई।

सिया ने उसे देखा, फिर अर्जुन की तरफ मुड़ी।

“एक दिन मैं आपकी ये गंभीरता जरूर खत्म करूंगी, खड़ूस।”

अर्जुन ने गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए कहा, “उस दिन का इंतजार रहेगा, राजकुमारी।”

सिया उसके पीछे चल पड़ी।

उसके होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन मन में एक नया सवाल जन्म ले चुका था।

क्या अर्जुन सच में Mr. S. की आवाज से मिलता-जुलता था?

या उसका मन ही उसे बार-बार उस दिशा में ले जा रहा था?

---

दफ्तर में एक नया फैसला

दफ्तर पहुंचने के बाद सिया ने खुद को काम में व्यस्त करने की पूरी कोशिश की।

काव्या ने उसके सामने शहर के विकास से जुड़ी कुछ फाइलें रखीं।

“राजकुमारी, इन तीन प्रस्तावों पर आज फैसला लेना है। एक नए सामुदायिक केंद्र का है, दूसरा पुराने बाजार की मरम्मत का और तीसरा सार्वजनिक पुस्तकालय के विस्तार का।”

सिया ने पहली फाइल उठाई।

“इनमें सबसे ज्यादा जरूरी कौन-सा है?”

काव्या ने जवाब दिया, “पुस्तकालय का प्रस्ताव। वहां जगह कम पड़ रही है और विद्यार्थियों की शिकायतें लगातार आ रही हैं।”

सिया ने फाइल पढ़नी शुरू की।

कुछ देर बाद उसने पूछा, “क्या पुरानी इमारत के पीछे वाली जगह इस्तेमाल नहीं की जा सकती?”

काव्या ने दस्तावेज पलटकर देखा।

“की जा सकती है, लेकिन वहां कुछ मरम्मत की जरूरत होगी।”

“तो उसका खर्च नए निर्माण से कम होगा?”

“संभवतः।”

सिया ने तुरंत कहा, “पहले उसकी लागत का हिसाब निकलवाइए। बिना जरूरत नई इमारत बनवाने से बेहतर है कि हम मौजूदा जगह का सही इस्तेमाल करें।”

काव्या ने संतुष्टि से सिर हिलाया।

“जी, राजकुमारी। मैं संबंधित अधिकारी से बात करती हूं।”

सिया अगली फाइल देखने लगी।

काम करते हुए लगभग एक घंटा बीत गया।

अर्जुन कमरे के बाहर सुरक्षा संबंधी कुछ निर्देश दे रहा था। बीच-बीच में उसकी नजर दरवाजे के भीतर बैठे सिया पर चली जाती, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला।

सिया ने जब सिर उठाया तो उसे दरवाजे के पास खड़ा पाया।

“खड़ूस!”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“जी, राजकुमारी?”

“आप यहां कब से खड़े हैं?”

“कुछ देर से।”

“तो अंदर क्यों नहीं आए?”

“आप काम कर रही थीं।”

सिया ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा, “आपको पता है, कभी-कभी मुझे लगता है कि आप इंसानों से ज्यादा नियमों से प्यार करते हैं।”

अर्जुन ने बिना मुस्कुराए जवाब दिया, “नियमों से काम आसान होता है।”

“और जिंदगी?”

“जिंदगी में भी अनुशासन जरूरी है।”

सिया ने हार मानने वाले अंदाज में हाथ उठा दिए।

“बस! मैं आपसे बहस नहीं कर सकती।”

अर्जुन ने कहा, “अच्छा निर्णय है, राजकुमारी।”

सिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“आप मेरा मजाक उड़ा रहे हैं?”

“नहीं।”

“आपके चेहरे से तो ऐसा ही लग रहा है।”

“मेरे चेहरे पर क्या लिखा है, यह मैं नहीं बता सकता।”

सिया हंस पड़ी।

“आप सच में असंभव हैं!”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपनी जगह से हटकर बाहर चला गया।

सिया उसे जाते हुए देखती रही।

कुछ पल बाद उसने सिर झटककर खुद को काम में लगा लिया।

उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही जिज्ञासा उसे एक ऐसे व्यक्ति के करीब ले जाने वाली थी, जिसके बारे में वह अभी केवल अनुमान लगा सकती थी।

---

Mr. S. की दुनिया

शहर के दूसरे छोर पर स्थित एक निजी कार्यालय में माहौल बिल्कुल अलग था।

कमरे की दीवारों पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ हुए समझौतों के प्रमाणपत्र लगे थे। एक तरफ लंबी मेज थी, जिस पर कई फाइलें करीने से रखी थीं।

मेज के पीछे बैठे व्यक्ति के सामने एक सहायक खड़ा था।

“सर, कल के समारोह की खबरें आज सुबह कई व्यावसायिक समाचार पत्रों में छपी हैं।”

उसने कुछ कागज मेज पर रख दिए।

“आपके पुरस्कार की चर्चा भी हो रही है।”

Mr. S. ने उन कागजों पर एक नजर डाली।

“काम की खबर है?”

“जी, सर। लंदन वाली कंपनी के साथ संभावित समझौते का भी उल्लेख है।”

“संभावित समझौते को खबर मत बनने दीजिए। जब तक हस्ताक्षर नहीं होते, वह सिर्फ बातचीत है।”

“जी, सर।”

सहायक ने तुरंत नोट कर लिया।

Mr. S. ने अगली फाइल खोली।

“कल की बैठक के दस्तावेज तैयार हैं?”

“जी, सर। सभी दस्तावेज तैयार हैं।”

“किसी भी आंकड़े में गलती नहीं होनी चाहिए। मुझे दोबारा जांच करवाने की जरूरत न पड़े।”

“जी, सर।”

सहायक कुछ पल रुका, फिर बोला, “सर, एक और जानकारी है।”

Mr. S. ने फाइल से नजर उठाई।

“कहिए।”

“अवॉर्ड समारोह में रायगढ़ परिवार की राजकुमारी सिया भी मौजूद थीं।”

Mr. S. ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

सहायक ने आगे बताया, “समारोह में उनकी मुलाकात कई कारोबारियों से हुई थी। उन्होंने आपके बारे में भी जानकारी लेने की कोशिश की।”

कमरे में कुछ पल शांति रही।

फिर Mr. S. ने पूछा, “किससे?”

“लंदन से आए कारोबारी के सहायक से। उन्होंने आपके बारे में सामान्य जानकारी मांगी थी।”

Mr. S. ने अपनी उंगलियों से मेज पर रखी कलम को सीधा किया।

“उन्हें क्या बताया गया?”

“सिर्फ इतना कि आप कारोबार से जुड़ी बैठकों के अलावा सार्वजनिक कार्यक्रमों में कम दिखाई देते हैं।”

“ठीक है।”

सहायक ने कुछ और कहने के लिए मुंह खोला, लेकिन फिर रुक गया।

Mr. S. ने उसकी तरफ देखा।

“कुछ और?”

“सर, क्या रायगढ़ परिवार के साथ होने वाली बैठक तय कर दी जाए?”

“अभी नहीं।”

“जी।”

“पहले उनके प्रस्तावों और मौजूदा योजनाओं की पूरी जानकारी चाहिए। अधूरी जानकारी के आधार पर कोई फैसला नहीं होगा।”

सहायक ने सिर झुका दिया।

“समझ गया, सर।”

वह बाहर जाने लगा, तभी Mr. S. की आवाज फिर सुनाई दी।

“और एक बात।”

सहायक तुरंत पलटा।

“जी?”

“मेरे नाम से किसी को कोई वादा नहीं किया जाएगा। जो भी बात होगी, वह लिखित और स्पष्ट होगी।”

“जी, सर।”

सहायक बाहर चला गया।

कमरे में फिर शांति छा गई।

Mr. S. ने अपने सामने रखे दस्तावेजों पर ध्यान केंद्रित कर लिया।

उसके लिए फिलहाल सबसे जरूरी चीजें थीं—काम, समय और सही निर्णय।

बाहर की दुनिया उसके बारे में कितनी बातें करती थी, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

कम से कम वह ऐसा ही दिखाता था।

---

एक मुलाकात की शुरुआत

शाम को सिया अपने कार्यालय में दिन का काम समेट रही थी, तभी काव्या एक नई जानकारी लेकर अंदर आई।

“राजकुमारी, मुझे कुछ पता चला है।”

सिया ने तुरंत सिर उठाया।

“Mr. S. के बारे में?”

काव्या मुस्कुराई।

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि आज तुम तीसरी बार मेरे कमरे में इसी उत्साह के साथ आई हो।”

काव्या हंस पड़ी।

“ठीक है, मान लिया। लेकिन इस बार जानकारी सच में काम की है।”

सिया ने फाइल एक तरफ रख दी।

“बताओ।”

“कल समारोह में लंदन से आए कारोबारी की कंपनी के एक प्रतिनिधि से मेरी बात हुई। उन्होंने बताया कि Mr. S. अगले कुछ दिनों तक शहर में ही रहने वाले हैं।”

सिया की आंखों में चमक आ गई।

“सच?”

“हां। हालांकि उनके कार्यक्रम की पूरी जानकारी किसी के पास नहीं है।”

सिया कुछ सोचने लगी।

“क्या उनसे मिलने का कोई तरीका नहीं है?”

“उनके कार्यालय से संपर्क किया जा सकता है। लेकिन मिलने का समय मिलेगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है।”

सिया ने तुरंत कहा, “फिर भी कोशिश करते हैं।”

काव्या ने मुस्कुराते हुए पूछा, “आपको उनसे मिलकर पूछना क्या है?”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर बोली, “पता नहीं।”

“क्या मतलब?”

“मुझे बस यह जानना है कि उनकी आवाज मुझे इतनी जानी-पहचानी क्यों लगी। और मैं यह भी देखना चाहती हूं कि वह सच में वैसे ही हैं, जैसा लोग उनके बारे में बताते हैं।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“ठीक है। मैं उनके कार्यालय से संपर्क करने का तरीका पता करती हूं।”

तभी रोशनी का संदेश आया। काव्या ने उसे पढ़ा और हंसने लगी।

सिया ने पूछा, “अब क्या हुआ?”

“रोशनी पूछ रही है कि Mr. S. से मिलने का कार्यक्रम कब बन रहा है।”

सिया भी हंस पड़ी।

“उसे कहो, पहले मिलने का समय तो मिल जाए!”

काव्या ने संदेश का जवाब दिया।

सिया खिड़की के पास चली गई।

शहर की रोशनी धीरे-धीरे जगमगाने लगी थी।

उसने मन ही मन सोचा—

“Mr. S., आप आखिर हैं कौन? और आपकी आवाज मुझे इतनी जानी-पहचानी क्यों लगती है?”

उसे अभी सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहिए था।

लेकिन कई बार एक सवाल का पीछा करते-करते इंसान ऐसे रास्ते पर पहुंच जाता है, जहां से लौटना आसान नहीं होता।

और सिया की कहानी में भी अब एक नया मोड़ आने वाला था।

उसे अभी अंदाजा नहीं था कि उसकी यह छोटी-सी जिज्ञासा आगे चलकर कितनी बड़ी उलझन बन सकती है।

सुनते रहिए… “हुक्म और हसरत”। ❤️

जारी रहेगा... 💗✨

© Diksha

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यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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