*हिस्सा 1: लौट आना (1972)*
1972. बनारस में गंगा अब भी वैसी ही बहती थी, पर घाट पर अब बिजली के बल्ब लग गए थे।
लाइब्रेरी की सीढ़ियाँ अब और घिस गई थीं। रवि के बाल पूरे सफेद हो गए थे। चश्मा मोटा हो गया था। पर एक चीज अभी भी वैसी थी — मंगलवार और शुक्रवार, 4 बजे। वो मेज़ अभी भी खाली रखता था। सफाई वाला कहता "बाबू जी, ये मेज़ कोई इस्तेमाल नहीं करता, हटा दूँ?" रवि कहता "रहने दो। आदत है।"
एक शुक्रवार, 4 बजकर 5 मिनट पर घंटी बजी।
दरवाजे पर एक लड़की खड़ी थी। लंबी, हाथ में झोला, आँखें बिल्कुल वैसी ही गहरी।
रवि ने चश्मा ठीक किया। दिल ज़ोर से धड़का।
"आर्या?"
लड़की हँसी। "पहचान लिया आपने?"
आर्या अब 18 साल की थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी, हिंदी साहित्य, फर्स्ट ईयर। माँ ने बोला था बनारस जाना है, नानी से मिलने। पर वो सीधा यहाँ आई थी।
"माँ ने बताया नहीं आपके बारे में। बस एक बार कहा था, बनारस में एक लाइब्रेरी है, जहाँ किताबें सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं।"
रवि ने कुछ नहीं कहा। बस अंदर आने का इशारा किया। वही पुरानी मेज़, वही पंखे की चिर-चिर।
आर्या ने इधर-उधर देखा। "सब वैसा ही है। बस आप थोड़े बूढ़े हो गए।"
रवि हँसा। पहली बार 10 साल में खुल के हँसा। "तुम बड़ी हो गई। चंद्रकांता से गुनाहों का देवता तक आ गई?"
आर्या ने झोले से एक किताब निकाली। वही 5 किताबों में से एक थी जो रवि ने दी थी। "ये खत्म हो गई। दूसरी चाहिए।"
*हिस्सा 2: डब्बा*
रवि किताब ढूँढने ऊपर गया। आर्या ने लाइब्रेरी में घूमना शुरू किया।
पीछे वाली अलमारी, जहाँ पुरानी बहियाँ रखी थीं, उसका एक कोना खुला था। पानी वाले साल के बाद से बंद था।
आर्या ने खींच कर देखा। अंदर एक लकड़ी का छोटा सा डब्बा था। धूल लगी हुई।
उसने खोला।
अंदर 23 कागज़ के टुकड़े थे। सब पे एक ही हैंडराइटिंग। रवि की।
एक पे लिखा था: "मीरा जी, आज आप नीली साड़ी में आई थीं। अच्छी लग रही थीं।"
दूसरे पे: "आज आपने 3 घंटे एक ही पन्ना पढ़ा। क्या सोच रही थीं?"
तीसरे पे: "अगर कल आप नहीं आईं तो मैं गंगा किनारे आपका इंतज़ार करूँगा।"
आर्या के हाथ काँपने लगे।
सबसे नीचे एक लिफाफा था। ऊपर लिखा था "मीरा के लिए — कभी देना नहीं था।"
रवि तब तक नीचे आ गया था। हाथ में किताब थी। डब्बा देख कर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"ये... ये यहाँ कैसे..."
आर्या ने एक कागज़ आगे बढ़ाया। "ये सब माँ के लिए थे?"
रवि बैठ गया। बहुत देर तक चुप रहा। फिर बोला:
"हाँ। हर मंगलवार, शुक्रवार के बाद रात को लिखता था। सोचा था अगर कभी हिम्मत आई तो दूँगा। हिम्मत कभी आई नहीं। फिर एक दिन सोचा, गंगा में बहा दूँगा, पर बहा नहीं पाया। इस डब्बे में बंद कर दिया।"
आर्या धीरे से बोली: "माँ आज भी हर साल गुनाहों का देवता पढ़ती है। उसी लाइन पर रुक जाती है। बाबा के जाने के बाद से तो और ज़्यादा।"
रवि ने पूछा: "तुम्हारे बाबा..."
"दो साल पहले। हार्ट अटैक।"
खामोशी। पंखा चल रहा था।
आर्या ने लिफाफा रवि को दिया। "अब दे दीजिए। देर तो पहले ही हो गई है। और देर मत कीजिए।"
रवि ने लिफाफा लिया नहीं। बोला: "अब क्या फायदा? उनकी दुनिया अलग है।"
आर्या ने उसी वक्त अपने झोले से एक और चीज़ निकाली। एक पुरानी डायरी। "ये माँ की है। उसने कहा था अगर मैं बनारस जाऊँ तो ये आपको दे दूँ। उसने कहा था, 'अगर रवि बाबू मिले, तो कहना, मैंने भी कुछ लिखा था, जो कभी दिया नहीं।'"
*हिस्सा 3: आखिरी 4 बजे*
रात को लाइब्रेरी बंद होने के बाद, रवि ने डायरी खोली।
पहला पन्ना: 1952.
"रवि बाबू आज गमछा दे रहे थे। हाथ काँप रहा था उनका। मैं लेना चाहती थी।"
"तीन हफ्ते की खामोशी में मैंने हर रात उनके लिए एक लाइन लिखी।"
"आज गुनाहों का देवता में कागज़ रखा। लिखा — अगर कहना गुनाह है, तो खामोश रहना भी तो सज़ा है। पता नहीं देखेंगे भी या नहीं।"
आखिरी पन्ना: 1962, जब वो सिंदूर में आई थी उस दिन के बाद का।
"आज लाइब्रेरी गई थी। सोचा था रवि बाबू कुछ कहेंगे। कुछ नहीं कहा। शायद सही किया। कुछ प्रेम कहानियाँ किताबों के बीच ही अच्छी लगती हैं। पर आर्या को भेजूँगी। वो मेरे जैसी है। शायद वो पढ़ ले जो मैं नहीं पढ़ पाई।"
रवि ने डायरी बंद कर दी। आँखों से पानी बह रहा था।
अगले दिन शनिवार था। लाइब्रेरी का दिन नहीं। पर रवि ने 4 बजे लाइब्रेरी खोली।
आर्या आई। साथ में कोई और भी था।
दरवाजे पर मीरा खड़ी थी। उम्र हो गई थी, पर आँखें वैसी ही थीं। हाथ में वही गुनाहों का देवता।
मीरा ने कहा: "आर्या ने बोला तुम यहाँ अब भी 4 बजे बैठते हो। सोचा एक बार फिर किताब वापस करने आऊँ।"
रवि ने मेज़ की तरफ देखा। वो मेज़ जो 20 साल से खाली थी।
इस बार उसने कहा: "मेज़ खाली नहीं है। बैठ जाइए।"
मीरा बैठी। आर्या पीछे खड़ी थी, मुस्कुरा रही थी।
रवि ने डब्बा खोला। 23 कागज़ मीरा के सामने रखे।
मीरा ने एक कागज़ उठाया, पढ़ा, और हँसी। आँखों में आँसू थे।
बोली: "इतने साल... आपने इतना कुछ लिखा और दिया एक भी नहीं?"
रवि बोला: "आपने भी तो डायरी में लिखा, दिया कब?"
दोनों हँस दिए। वही दर्द वाली हँसी, पर इस बार खामोशी नहीं थी।
शाम को लाइब्रेरी बंद हुई। तीन लोग सीढ़ियों से उतरे। रवि, मीरा और आर्या।
रवि ने ताला लगाते हुए कहा: "कल मंगलवार है। 4 बजे?"
मीरा ने कहा: "आदत जो पड़ गई है।"
_— समाप्त —_