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#Arsia
एपिसोड 43: नकाब के उस पार
दोपहर के बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे।
गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए सिया बार-बार अपनी घड़ी की ओर देख रही थी। उसके चेहरे पर उत्सुकता साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि यह उत्सुकता आखिर किस बात की थी।
एक ऐसे बिज़नेसमैन से मिलने की, जिसके साथ वह अपने शहर के विकास को लेकर चर्चा करने वाली थी?
या फिर उस रहस्यमयी इंसान को करीब से देखने की, जिसकी आवाज़ पिछले कई दिनों से उसके दिमाग में घूम रही थी?
सिया ने अपने गुलाबी अनारकली सूट की आस्तीन ठीक की। उसके लंबे झुमके हल्की-हल्की आवाज़ करते हुए हिल रहे थे। गालों पर लगा ब्लश, गुलाबी लिपस्टिक और आँखों में लगा काजल उसके चेहरे की खूबसूरती को और निखार रहे थे।
वह आज सचमुच बहुत खूबसूरत लग रही थी।
और उसके ठीक बगल में बैठा अर्जुन इस बात को न चाहते हुए भी महसूस कर रहा था।
उसकी नज़र एक पल के लिए सिया के चेहरे पर ठहरी, फिर वह तुरंत सामने देखने लगा।
आखिर इतनी सजने-सँवरने की क्या ज़रूरत थी? मीटिंग ही तो है।
अगले ही पल उसके भीतर से एक दूसरी आवाज़ उठी।
वह जैसे चाहे तैयार हो। आपको इससे क्या फर्क पड़ता है, अर्जुन?
अर्जुन ने अपनी उँगलियाँ आपस में कस लीं।
बिल्कुल कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं यहाँ सिर्फ अपनी ड्यूटी के लिए हूँ।
“अर्जुन?”
सिया की आवाज़ सुनकर उसने उसकी ओर देखा।
“जी, राजकुमारी?”
“आपको क्या लगता है, मिस्टर एस कैसे होंगे?”
अर्जुन का चेहरा पहले की तरह शांत रहा।
“मैं किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में अंदाज़ा लगाना उचित नहीं समझता, जिससे हम अभी तक मिले नहीं हैं।”
सिया ने मुँह बनाया।
“आपसे कोई दिलचस्प जवाब मिलना तो नामुमकिन है।”
“आपने सवाल पूछा था। मैंने जवाब दे दिया।”
“हाँ, बिल्कुल। मशीनों को भी शायद आपसे बेहतर बातचीत करनी आती होगी।”
अर्जुन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
सिया कुछ पल उसे देखती रही, फिर खिड़की की ओर मुड़ गई।
“वैसे, मुझे लगता है कि वह बहुत रहस्यमयी इंसान होंगे। हमेशा नकाब पहनना, अपनी जगह किसी असिस्टेंट को अवॉर्ड लेने भेजना और सिर्फ अपनी रिकॉर्ड की हुई स्पीच सुनाना। कोई सामान्य इंसान ऐसा क्यों करेगा?”
“हर व्यक्ति की अपनी निजी ज़िंदगी और अपने कारण होते हैं, राजकुमारी।”
“और अगर उनके कारण बहुत दिलचस्प हुए तो?”
“तब भी आपको अपनी मीटिंग के उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए।”
सिया ने आँखें घुमाईं।
“आप हर चीज़ को इतना गंभीर क्यों बना देते हैं?”
“क्योंकि हर चीज़ को मज़ाक समझना सुरक्षित नहीं होता।”
“और हर चीज़ को खतरा समझना भी ज़रूरी नहीं होता।”
“यह निर्णय मैं अपने अनुभव के आधार पर करता हूँ।”
सिया ने उसकी ओर देखकर धीरे से कहा, “खड़ूस।”
अर्जुन ने सुन लिया, लेकिन हमेशा की तरह अनसुना कर दिया।
गाड़ी कुछ देर बाद एक ऊँची इमारत के सामने जाकर रुकी।
इमारत के बाहर किसी बड़े बिज़नेस ग्रुप का नाम नहीं था। बस प्रवेश द्वार के पास एक छोटा-सा धातु का बोर्ड लगा था, जिस पर अंग्रेज़ी के दो अक्षर उकेरे गए थे—S.
सिया ने बोर्ड पढ़ा और उसकी आँखों में चमक आ गई।
“तो यही है उनका ऑफिस!”
अर्जुन पहले गाड़ी से उतरा। उसने आसपास नज़र दौड़ाई, प्रवेश द्वार और वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मियों का निरीक्षण किया, फिर सिया के उतरने के लिए दरवाज़ा खोला।
“मेरे पीछे रहिएगा, राजकुमारी।”
सिया ने पैर नीचे रखते हुए उसकी ओर देखा।
“मैं मीटिंग के लिए आई हूँ, किसी मिशन पर नहीं।”
“मेरे लिए दोनों परिस्थितियों में आपकी सुरक्षा प्राथमिकता है।”
“और आपके लिए मेरी हर बात का जवाब देना भी शायद कोई मिशन ही है।”
अर्जुन ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया। वह उसके साथ इमारत के भीतर चला गया।
अंदर का वातावरण बाहर से बिल्कुल अलग था। चमकदार फर्श, सलीके से सजा हुआ रिसेप्शन और दीवारों पर लगी आधुनिक कलाकृतियाँ उस जगह की भव्यता दिखा रही थीं। इसके बावजूद वहाँ कोई अनावश्यक शोर नहीं था। हर कर्मचारी अपने काम में व्यस्त था।
रिसेप्शन पर बैठी युवती ने सिया का नाम पूछा।
“मैम, आपकी मीटिंग बारह बजे निर्धारित है। मिस्टर एस को आपके आने की सूचना दे दी गई है। आप कृपया बैठिए।”
“क्या हमें उनसे मिलने के लिए इंतज़ार करना होगा?” सिया ने पूछा।
“सर का संदेश है कि आप सीधे उनके केबिन में आ सकती हैं।”
सिया ने अर्जुन की ओर देखा।
“देखा? कम से कम उन्हें इंतज़ार करवाना पसंद नहीं है।”
“अभी उनसे मिले भी नहीं हैं, राजकुमारी।”
“आपको हर खुशी में कमी निकालनी होती है क्या?”
“मैं सिर्फ स्थिति स्पष्ट कर रहा हूँ।”
सिया ने एक गहरी साँस ली और रिसेप्शनिस्ट के पीछे चल दी।
अर्जुन उसके साथ था।
वे एक लंबे गलियारे से गुज़रे। गलियारे के अंत में लकड़ी का एक बड़ा दरवाज़ा था। उसके बाहर खड़ा कर्मचारी दरवाज़ा खोलने के लिए आगे आया।
“सर आपका इंतज़ार कर रहे हैं, मैम।”
सिया के कदम अचानक धीमे हो गए।
जिस व्यक्ति को वह कई दिनों से सिर्फ तस्वीरों और रिकॉर्ड की हुई आवाज़ के ज़रिए जानती थी, आज वह उसके सामने होने वाला था।
उसने एक बार अपने कपड़ों को देखा, फिर अनजाने में अपने बालों को ठीक किया।
अर्जुन की नज़र उस पर पड़ी।
“घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, राजकुमारी। आप यहाँ अपने काम के लिए आई हैं।”
सिया ने उसकी ओर देखा। उसके शब्दों में हमेशा की तरह सख्ती थी, लेकिन इस बार उनमें एक छोटी-सी व्यावहारिक सलाह भी छिपी थी।
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मुझे घबराहट नहीं हो रही।”
“अच्छी बात है।”
“मैं बस सोच रही हूँ कि उनकी आवाज़ असल में कैसी होगी।”
अर्जुन के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।
“आपको जल्द ही पता चल जाएगा।”
सिया ने दरवाज़े की ओर देखा।
फिर उसने एक गहरी साँस ली और अंदर कदम रख दिया।
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केबिन बहुत बड़ा था।
एक ओर काँच की दीवार के पार शहर की ऊँची इमारतें दिखाई दे रही थीं। सामने एक विशाल मेज़ थी, जिस पर कुछ फाइलें और एक लैपटॉप रखा था। कमरे की सजावट में दिखावा कम और गंभीरता अधिक थी।
और उस मेज़ के पीछे बैठा था वह व्यक्ति, जिससे मिलने के लिए सिया यहाँ आई थी।
मिस्टर एस।
उसने काले रंग का सूट पहन रखा था। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह काला नकाब था, जो उसकी पहचान को पूरी तरह छिपाए हुए था। उसकी आँखें सामने आने वाले हर व्यक्ति का बारीकी से निरीक्षण करती प्रतीत होती थीं।
सिया ने उसे तस्वीरों में देखा था।
लेकिन तस्वीर और सामने मौजूद इंसान में बहुत अंतर होता है।
“वेलकम, मिस सिया।”
उसकी आवाज़ सुनते ही सिया के चेहरे की मुस्कान कुछ पल के लिए ठहर गई।
यह आवाज़…
वह उस रिकॉर्ड की हुई स्पीच जैसी नहीं थी, जिसे उसने अवॉर्ड समारोह में सुना था।
स्पीच में आवाज़ गहरी, ठंडी और बेहद प्रभावशाली थी। उसके हर शब्द में एक अजीब-सा अधिकार महसूस होता था। लेकिन इस समय सामने से आने वाली आवाज़ का उतार-चढ़ाव कुछ अलग था। उसमें एक सहजता थी, जैसे बोलने वाला व्यक्ति अपने सामने बैठे इंसान को सहज महसूस करवाना चाहता हो।
सिया ने ध्यान से उसकी ओर देखा।
क्या रिकॉर्डिंग में आवाज़ अलग सुनाई दी थी?
या फिर वह खुद ही ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही थी?
“थैंक यू, मिस्टर एस।”
सिया ने अपनी उलझन छिपाते हुए जवाब दिया।
मिस्टर एस ने सामने की कुर्सी की ओर इशारा किया।
“प्लीज़, बैठिए। मैंने आपका प्रस्ताव पढ़ा है। आपके शहर के विकास केंद्र और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ा आपका विचार दिलचस्प है।”
सिया बैठ गई।
अर्जुन उसके पीछे थोड़ी दूरी पर खड़ा हो गया।
उसकी आँखें एक बार मिस्टर एस पर ठहरीं। नज़र तेज़ थी, चेहरे पर सख्ती थी और जबड़ा हल्का-सा कसा हुआ था।
तो यही है वह इंसान, जिससे मिलने के लिए राजकुमारी इतनी उत्सुक थीं।
उसकी नज़र अनजाने में सिया की ओर चली गई।
वह पूरी एकाग्रता से मिस्टर एस की बात सुन रही थी।
अर्जुन ने अपनी दृष्टि वापस सामने कर ली।
ध्यान रखिए, अर्जुन। आप यहाँ निजी विचारों के लिए नहीं, अपनी ड्यूटी के लिए आए हैं।
मिस्टर एस ने अपनी मेज़ पर रखी फाइल खोली।
“आपने प्रस्ताव में लिखा है कि शहर के नए विकास केंद्र में नागरिकों की शिकायतों के लिए एक अलग सहायता कक्ष होना चाहिए। साथ ही, आपने स्थानीय दुकानदारों और छोटे व्यवसायों को भी योजना में शामिल करने की बात कही है। ऐसा क्यों?”
सिया का ध्यान तुरंत अपने काम पर आ गया।
“क्योंकि विकास का मतलब सिर्फ नई इमारतें बनाना नहीं होता, मिस्टर एस। अगर किसी इमारत में आने वाले लोगों को अपनी समस्या बताने के लिए ही भटकना पड़े, तो वह सुविधा किस काम की?”
मिस्टर एस चुपचाप उसकी बात सुनता रहा।
सिया ने आगे कहा, “हमारे शहर में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें ऑनलाइन आवेदन करना नहीं आता। कुछ लोगों को सरकारी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं है। अगर हम सिर्फ एक खूबसूरत इमारत बना देंगे, तो बाहर से सब अच्छा दिखाई देगा, लेकिन लोगों की परेशानी वहीं की वहीं रहेगी।”
“और स्थानीय दुकानदारों को शामिल करने से क्या लाभ होगा?”
“उन्हें यह महसूस होगा कि शहर का विकास उनके खिलाफ नहीं, उनके साथ हो रहा है। अगर हम हर योजना में उनकी आजीविका को नज़रअंदाज़ करेंगे, तो विरोध होना स्वाभाविक है। मैं चाहती हूँ कि विकास हो, लेकिन किसी परिवार को अपना घर या दुकान खोने के डर के साथ न जीना पड़े।”
सिया की आवाज़ में अब झिझक नहीं थी।
वह अपने विचार स्पष्ट रूप से रख रही थी।
मिस्टर एस ने फाइल बंद कर दी।
“आपके विचार व्यावहारिक हैं। लेकिन उन्हें लागू करना कागज़ पर लिखने जितना आसान नहीं होगा।”
“मैं जानती हूँ।”
“आपको प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। बजट की सीमाएँ होंगी, कुछ अधिकारी आपकी योजना से सहमत नहीं होंगे और कुछ लोग अपने निजी लाभ के लिए इसका विरोध भी कर सकते हैं।”
“तो क्या इसका मतलब यह है कि हमें कोशिश ही नहीं करनी चाहिए?”
मिस्टर एस की आँखों में एक हल्की-सी चमक उभरी।
“नहीं। इसका मतलब है कि आपको हर कदम सोच-समझकर उठाना चाहिए।”
सिया मुस्कराई।
“यह बात मुझे कोई पहले भी कह चुका है।”
उसके पीछे खड़े अर्जुन की भौंह हल्की-सी उठी।
निश्चित रूप से मेरी ही बात कर रही हैं।
मिस्टर एस ने पूछा, “आपके सुरक्षा अधिकारी?”
सिया ने पलटकर अर्जुन की ओर देखा।
“जी। अर्जुन। वह मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभालते हैं।”
“समझ गया।”
मिस्टर एस की नज़र एक क्षण के लिए अर्जुन पर ठहरी।
अर्जुन ने भी उसे देखा।
दोनों के बीच कोई अभिवादन नहीं हुआ, न ही कोई अतिरिक्त बातचीत।
अर्जुन की आँखों में सख्ती थी। वह सामने बैठे नकाबपोश व्यक्ति को ऐसे देख रहा था, जैसे उसकी हर गतिविधि का आकलन कर रहा हो।
बहुत आत्मविश्वास है, मिस्टर एस। देखते हैं, यह आत्मविश्वास हर परिस्थिति में कितना कायम रहता है।
उसके विचारों में एक अनचाही चिढ़ घुल गई।
सिया को अपने सामने बैठे व्यक्ति से बात करते देखना उसे असामान्य रूप से खल रहा था। उसे इस बात से परेशानी नहीं होनी चाहिए थी कि सिया किसी प्रभावशाली बिज़नेसमैन से मिल रही है। यह एक सामान्य व्यावसायिक मुलाकात थी।
फिर भी, जब मिस्टर एस ने सिया की बात सुनते हुए अपनी कुर्सी के आगे झुककर उसकी ओर ध्यान दिया, तो अर्जुन का जबड़ा और कस गया।
वह राजकुमारी की बात सुन रहा है। इसमें गलत क्या है?
अर्जुन ने अपने मन को झिड़क दिया।
आपका काम उनकी सुरक्षा करना है, उनके सामने बैठने वाले हर व्यक्ति से बेवजह परेशानी महसूस करना नहीं।
उसने अपनी बाँहें पीछे बाँध लीं और दोबारा कमरे की गतिविधियों पर ध्यान देने लगा।
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“मिस्टर एस, अगर आप हमारी योजना में सहयोग करने के लिए तैयार हों, तो हम आपके बिज़नेस ग्रुप के साथ एक विस्तृत प्रस्ताव साझा कर सकते हैं।”
सिया की बात पर मिस्टर एस कुछ पल सोचता रहा।
“आप चाहती हैं कि आपका शहर सिर्फ आर्थिक रूप से आगे न बढ़े, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों को भी उसका लाभ मिले।”
“बिल्कुल।”
“और अगर इस प्रक्रिया में आपको कुछ लोकप्रिय फैसलों के बजाय कठिन फैसले लेने पड़े?”
सिया ने बिना देर किए जवाब दिया, “तो मैं वही फैसला लूँगी जो शहर के लिए सही होगा। लेकिन किसी फैसले को सही कहने से पहले मैं यह ज़रूर देखूँगी कि उसका बोझ किन लोगों पर पड़ रहा है।”
कमरे में कुछ पल के लिए शांति छा गई।
मिस्टर एस ने धीरे से सिर हिलाया।
“यह सोच अच्छी है, मिस सिया। बहुत से लोग विकास की बात करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग उसके परिणामों की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार होते हैं।”
सिया को उसके शब्दों में ईमानदारी महसूस हुई।
फिर भी, उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था।
वह आवाज़।
वह लहजा।
और वह अजीब-सा अंतर, जिसे वह समझ नहीं पा रही थी।
आखिरकार उसने तय किया कि वह सीधे पूछेगी।
“मिस्टर एस, क्या मैं आपसे एक निजी सवाल पूछ सकती हूँ?”
“अगर वह इस मीटिंग से बहुत दूर न हो, तो ज़रूर।”
सिया हल्का-सा हँसी।
“यह आपके बारे में है। दरअसल, मैंने आपको बिज़नेस अवॉर्ड समारोह में सुना था। आपकी स्पीच… काफी प्रभावशाली थी।”
“मुझे खुशी है कि आपको पसंद आई।”
“लेकिन आज आपकी आवाज़ कुछ अलग लग रही है।”
यह कहते ही सिया ने उसकी आँखों पर ध्यान दिया।
उसके सामने बैठे व्यक्ति की आँखें शांत थीं, मगर उनमें एक क्षण के लिए ऐसी चमक उभरी, जिसे सिया पढ़ नहीं पाई।
“अलग?” मिस्टर एस ने पूछा।
“जी। शायद रिकॉर्डिंग की वजह से हो। उस दिन आपकी आवाज़ बहुत गहरी और सख्त लग रही थी। आज…” सिया कुछ पल रुकी, फिर बोली, “आज आप थोड़े अलग सुनाई दे रहे हैं।”
अर्जुन की नज़र तुरंत सिया पर गई।
राजकुमारी, आप हर बात पर इतनी बारीकी से ध्यान क्यों देती हैं?
उसने अपना चेहरा सामान्य रखा, लेकिन उसकी आँखें अब मिस्टर एस पर टिक गई थीं।
मिस्टर एस ने कुर्सी की पीठ से अपना सिर टिकाया।
“रिकॉर्डिंग में आवाज़ का प्रभाव अलग हो सकता है, मिस सिया। उस दिन मैं एक बड़े समारोह को संबोधित कर रहा था। आज हम आमने-सामने बैठकर बातचीत कर रहे हैं। दोनों परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होतीं।”
जवाब गलत नहीं था।
बल्कि सुनने में बिल्कुल तर्कसंगत था।
फिर भी सिया की उलझन पूरी तरह दूर नहीं हुई।
“हो सकता है। शायद मैंने ही ज़्यादा ध्यान दे दिया।”
“जिज्ञासा बुरी बात नहीं है। बशर्ते वह आपके उद्देश्य से ध्यान न भटकाए।”
सिया ने हल्के से सिर हिलाया।
“आप सही कह रहे हैं।”
लेकिन भीतर ही भीतर उसने उस अंतर को याद रख लिया।
क्योंकि वह केवल आवाज़ का अंतर नहीं था।
तस्वीरों में दिखने वाला मिस्टर एस उसे जितना रहस्यमयी और दूर लग रहा था, सामने बैठा व्यक्ति उतना ही सहज होकर बातचीत कर रहा था। उसके शब्दों में आत्मविश्वास था, मगर वह उस कठोर व्यक्तित्व से थोड़ा अलग प्रतीत हो रहा था, जिसकी कल्पना सिया ने की थी।
क्या यह सिर्फ परिस्थितियों का अंतर था?
या नकाब के पीछे छिपा यह इंसान अपनी असली शख्सियत का केवल एक हिस्सा दुनिया को दिखाता था?
सिया के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।
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मीटिंग लगभग आधे घंटे तक चली।
इस दौरान मिस्टर एस ने सिया के प्रस्ताव में कुछ बदलाव सुझाए। उसने बजट का एक अलग विवरण तैयार करने, स्थानीय दुकानदारों से बातचीत का रिकॉर्ड रखने और योजना के पहले चरण के लिए एक छोटी टीम बनाने की सलाह दी।
सिया ने हर सुझाव ध्यान से सुना और अपनी डायरी में नोट किया।
जब बातचीत समाप्त हुई, तो मिस्टर एस ने कहा, “आप अपनी संशोधित योजना मेरे कार्यालय को भेज दीजिए। समीक्षा के बाद हम तय करेंगे कि किस स्तर पर सहयोग संभव है।”
“ज़रूर। और आज समय देने के लिए धन्यवाद।”
सिया अपनी कुर्सी से उठी।
मिस्टर एस भी खड़ा हो गया।
“आपसे मिलकर अच्छा लगा, मिस सिया।”
“मुझे भी।”
सिया ने औपचारिक मुस्कान के साथ जवाब दिया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।
अर्जुन उसके साथ चलने लगा।
लेकिन बाहर निकलने से ठीक पहले सिया ने एक बार पलटकर मिस्टर एस की ओर देखा।
वह दोबारा अपनी मेज़ के पीछे बैठ चुका था और सामने रखी फाइल खोल रहा था, मानो यह मुलाकात उसके लिए दिन के कई व्यावसायिक कामों में से केवल एक थी।
सिया को न जाने क्यों लगा कि वह इस व्यक्ति को समझने से अभी बहुत दूर है।
उसने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ा दिए।
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गलियारे में पहुँचते ही अर्जुन ने पूछा, “मीटिंग आपकी अपेक्षा के अनुसार रही?”
“हाँ। उनका काम करने का तरीका अच्छा लगा। उन्होंने सिर्फ हमारी तारीफ नहीं की, बल्कि उन कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया जिन्हें हमें सुधारना चाहिए।”
“यह अच्छी बात है।”
सिया कुछ कदम चलने के बाद अचानक रुक गई।
“लेकिन एक बात समझ नहीं आई।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
“क्या?”
“उनकी आवाज़।”
अर्जुन के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।
“फिर वही बात, राजकुमारी?”
“हाँ, फिर वही बात!” सिया ने थोड़ा ज़ोर देकर कहा। “आपने भी उनकी रिकॉर्डिंग सुनी थी। आपको सच में कोई अंतर महसूस नहीं हुआ?”
“मैंने उनकी आवाज़ का विश्लेषण करने के लिए रिकॉर्डिंग नहीं सुनी थी।”
“आप तो हर चीज़ का विश्लेषण करते हैं!”
“हर चीज़ का नहीं।”
“अच्छा? तो किन चीज़ों का नहीं करते?”
अर्जुन ने बिना मुस्कराए जवाब दिया, “उन सवालों का, जिनका मेरी ड्यूटी से कोई संबंध नहीं होता।”
सिया उसे घूरने लगी।
“आपसे बात करना दीवार से बात करने जैसा है।”
“तो आपको दीवार से बात करने की आवश्यकता नहीं है, राजकुमारी।”
सिया के मुँह से एक छोटी-सी हँसी निकल गई।
“आप सच में खड़ूस हैं।”
“आप यह बात पहले भी बता चुकी हैं।”
“और आगे भी बताती रहूँगी।”
“यह आपका व्यक्तिगत निर्णय है।”
सिया सिर हिलाती हुई आगे बढ़ गई।
अर्जुन उसके पीछे चल पड़ा।
बाहर पहुँचकर उसने एक बार उस इमारत की ओर देखा, फिर अपनी नज़र वापस सिया पर टिका दी।
उसके मन में कई विचार एक साथ चल रहे थे।
मीटिंग सफल रही थी। सिया ने अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखी थी। सामने वाले व्यक्ति ने भी कोई अनुचित व्यवहार नहीं किया था।
फिर भी अर्जुन के भीतर की बेचैनी कम नहीं हुई थी।
उसे मिस्टर एस की मौजूदगी से आखिर परेशानी क्यों हो रही थी?
उसने अपने मन में उठते सवाल को वहीं दबा दिया।
आपका काम राजकुमारी को सुरक्षित घर पहुँचाना है। बाकी बातें सोचने के लिए आपके पास बहुत समय है।
गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए उसने सिया से कहा, “चलिए, राजकुमारी।”
सिया गाड़ी में बैठ गई।
लेकिन जैसे ही गाड़ी इमारत से दूर जाने लगी, उसने खिड़की से बाहर देखते हुए मन ही मन एक फैसला कर लिया।
वह मिस्टर एस के बारे में और पता लगाएगी।
उसकी आवाज़ का अंतर भले ही एक संयोग हो, मगर उस नकाब के पीछे छिपा व्यक्तित्व उसे अब पहले से कहीं अधिक दिलचस्प लगने लगा था।
और उसे यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी यह जिज्ञासा आने वाले दिनों में कितने सवाल खड़े करने वाली थी।
कभी-कभी सबसे बड़ा रहस्य वह नहीं होता, जो हमारी नज़रों से छिपा हो… बल्कि वह होता है, जो हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हमें दिखाई नहीं देता।
क्या सिया मिस्टर एस के रहस्य के करीब पहुँच पाएगी? और अर्जुन के भीतर उठ रही उस अनजानी बेचैनी का कारण क्या है?
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©Diksha ...
✍️ लेखिका: Diksha
आपकी अपनी कहानियाँ — हुक्म और हसरत, अनबन्ध, वो जो चुपके से देखा करता था, अनचाही मोहब्बत।
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