cute girl in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | वो मासूम सी लड़की - 3

Featured Books
Categories
Share

वो मासूम सी लड़की - 3


  अपनी किस्मत खुद लिखनी है

पीहू के पति की जॉब विदेश में लग जाती है। वह दो साल के लिए विदेश चला जाता है। जाते समय पति ने कहा था - "पीहू, बस दो साल की बात है, फिर मैं तुम्हें और आरव को अपने साथ बुला लूँगा।"

पीहू को लगा था कि पति के जाने के बाद शायद ससुराल में उसे चैन मिले, पर हुआ इसका उल्टा। पति के जाते ही ससुराल वालों के ताने और तेज हो गए।

आखिर एक दिन पीहू के ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया। उन्होंने कहा, हमारा बेटा तो विदेश चला गया, अब तुम इस घर में क्यों रहोगी। तुम्हारा यहाँ कोई हक नहीं। पीहू से उसकी छत भी छीन ली गई।

 बारह साल का बेटा आरव और हाथ में एक छोटा सा बैग लिए पीहू सड़क पर खड़ी थी। आरव ने सहमी आँखों से माँ का हाथ कसकर पकड़ रखा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, कहाँ जाए। उसकी आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर एक खामोश प्रार्थना थी।

लेकिन वो एक माँ भी है, हार नहीं सकती। टूटने का समय नहीं है, उसे अपने बेटे आरव के लिए अपनी जंग खुद लड़नी है। माँएँ रोती हैं, पर टूटती नहीं। वह अपने मायके वाले शहर में चली गई, पर मायके में बोझ बनकर रहने के बजाय उसने मायके से कुछ दूरी पर एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया।

पीहू बहुत स्वाभिमानी लड़की है, वह मायके में रहकर भी किसी का एहसान नहीं लेना चाहती थी। उसने सोचा, जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँ।

पर उसकी राह आसान नहीं थी। अकेले बच्चे को पालना, उसे पढ़ाना बहुत मुश्किल था। आरव अब बड़ा हो रहा था, उसकी स्कूल की फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, सबका खर्चा था। कई रातें तो वह भूखी ही सो जाती, ताकि आरव पेट भर खा सके।

उसने घर का खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। पर उससे इतना नहीं होता था। तब एक शाम जब आरव उदास बैठा था, तो पीहू ने अपने बेटे से कहा - "बेटा अब तुम आठवीं क्लास में आ गए हो, क्या तुम छोटी क्लास के बच्चों को पढ़ाकर मेरी थोड़ी सहायता करोगे?"

पीहू का बेटा आरव भी बहुत समझदार था। उसने अपनी माँ को दिन-रात मेहनत करते, सिलाई मशीन पर झुकते देखा था। आरव ने अपनी माँ के आँसू पोंछते हुए कहा - "माँ, तुम चिंता मत करो, मैं हूँ ना। मैं आपकी सहायता जरूर करूँगा।"

माँ की आँखों से आँसू बह निकले, पर ये आँसू दुख के नहीं, गर्व के थे।

फिर तो माँ-बेटे की जोड़ी बन गई। आरव स्कूल से आकर शाम को चार से छह बजे तक मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता। उसकी मासूम आवाज में पढ़ाना बच्चों को बहुत पसंद आता।

पीहू ने हिम्मत करके एक बैटरी वाला रिक्शा किराए पर ले लिया। वो सुबह ठंड में भी बच्चों को स्कूल छोड़ने जाती और दोपहर को वापस लाती। धीरे-धीरे लोगों को उसकी ईमानदारी और ममता पर भरोसा हो गया और दस-बारह बच्चों को रोज स्कूल ले जाने की जिम्मेदारी मिल गई उसे।

अब उसका दिन बँटा हुआ था। सुबह पाँच बजे उठती अपने बेटे और पड़ोस के बच्चों को रिक्शा से स्कूल छोड़ने जाना दोपहर को स्कूल से वापिस लाना, इस तरह उसने दस बारह बच्चों की ज़िम्मेदारी ले ली. स्कूल से आकर , दोपहर में बच्चों को लाना और शाम को दो घंटे खुद ट्यूशन पढ़ाना। शरीर थक जाता, पर माँ का हौसला नहीं टूटता।साथ ही दो घंटा बड़े बच्चों को टूशन भी पढ़ाती.

कभी-कभी आरव रात में पूछता - "माँ, पापा कब आएंगे? क्या हम फिर से बड़े घर में रहेंगे?" तो पीहू के पास जवाब नहीं होता। वह बस उसे सीने से लगा लेती और कहती - "बेटा, पापा आएंगे, पर तब तक हमें अपनी किस्मत खुद लिखनी है। किसी का इंतजार करके जिंदगी नहीं रुकती।"

एक दिन आरव ने पीहू से कहा - "माँ हम एक फोटोकॉपी की मशीन खरीद लेते हैं, कोचिंग के बच्चों को कितने सारे प्रिंट निकालने होते हैं। फिर किराए के मकान में भी कब तक रहेंगे, अपना घर बनाने के लिए कुछ एक्स्ट्रा काम तो करना पड़ेगा।"

पीहू ने हाँ में सिर हिलाया, उसकी आँखों में एक नया सपना चमक उठा। वह बोली - "हाँ बेटा, हमें अपनी किस्मत खुद लिखनी है।"

उस रात जब पीहू अपनी छोटी सी छत पर लेटकर तारों को देख रही थी, आरव उसके पास ही सो रहा था। तारों को देखकर उसे अपना बचपन याद आया। जो मासूम सी लड़की कभी तारों में शेर और हिरन खोजती थी, आज वही अपने बेटे आरव के लिए एक नया आसमान बना रही थी, अपने पसीने और प्यार से।उसे अपनी किस्मत की कहानी खुद लिखनी थी.
शेष अगले भाग में.......