Conflict and Resolution - 3 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | संघर्ष और संकल्प - 3

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संघर्ष और संकल्प - 3

*हम सुधरेंगे – जग सुधरेगा*
                         मंदिर में चल रहे सत्संग में सुरजा बहुत देर से आई तो ममता ने पूछा – सुरजा अभी तक क्या कर रही थी, जो इतना देर से आई ? 
सुरजा बोली – आज मैं काम से बाजार तरफ गई थी, तो पाठक माता जी के घर के सामने से निकली मन में - सोची, माता जी बहुत दिनों से सत्संग में नहीं आ रही है, चलो उन से मिल कर आती हूँ – मै माता जी से मिलने घर के अन्दर गई, तो दरवाजे पर ही उनके कराहने की आवाज सुनाई दी –अन्दर जाकर देखी, माता जी की तबियत बहुत खराब है।तेज बुखार से वे कराह रही थी, अकेली तो रहती है, कोई उनकी सेवा करने वाला नहीं है।मैं उनके पास बैठ गई फिर उनके कपड़े वगैरह धोकर अभी आ रही हूँ। उनकी हालत देखकर उन पर बड़ा तरस आ रहा था ।
ममता ने पूछा – माता जी बीमार है तो खाना कौन बनाता है ? क्या खाती है ? 
सुरजा – पड़ोसिन दमयन्ती पांडे उनको खाना दे जाती है, वो ही उनकी देखभाल करती है।
ममता ने कहा - उनके बेटा – बहू को खबर देना था। 
सुरजा बोली - दमयन्ती ने खबर तो की है परन्तु कोई आये नहीं ।एक दिन दीपक (पोता) आया था, हाल-चाल देखकर व दादी से पैसे लेकर चला गया।
बरसों से पाठक माताजी अपने घर में अकेली रहती है । जब पाठक गुरूजी थे, तब तक उनकी भी पूंछ थी, पाठक पंडित जी स्कूल में टीचर थे।पाठक सर पंडिताई भी करते थे। बड़े विद्वान, व्यवहार कुशल, कथा वाचक व्यक्ति थे।स्कूल से रिटायर होने के बाद वे पंडिताई करने लगे , भागवत , रामायण व शिवपुराण की कथाओं के प्रवचन के साथ-साथ वे बड़े ज्योतिष भी थे।जिससे उन्हें अच्छी कमाई हो जाती थी, जबकि पंडित जी कभी भी किसी कथा में मोल भाव नहीं करते थे । अपनी व्यवहार कुशलता के कारण वे जल्दी प्रसिद्ध हो गये थे , वैसे भी उन्हें स्कूल से रिटायर होने के कारण अच्छी पेंशन मिलती थी ।
पंडित जी के लड़के रघु की पढ़ने लिखने में रूचि नहीं थी ।सीधे साधे रघु ने पंडित जी के बहुत समझाने बुझाने पर किसी तरह दसवीं पास कर ली थी । पंडित जी के परिचय व व्यवहार के कारण उसकी भी रेल्वे में नौकरी लग गई थी । इस तरह घर का खर्च अच्छे से चल जाता था । पंडित जी ने एक होशियार लड़की से रघु की शादी करा दी थी । सीधे साधे रघु का जीवन ठीक से चलता रहे । उनकी सोच थी , बेटा नौकरी तो कर ही रहा है , बहू पुष्पा घर व व्यवहार सम्हाल लेगी । इसलिये एक समझदार दसवी तक पढ़ी लड़की पुष्पा से रघु की शादी करदी | एक ही तो बेटा रघु है ,पंडित जी के पास पैसे की कमी नहीं थी ,बड़े शौक व धूमधाम से उन्होंने रघु की शादी की थी | रघु भी कम खुबसूरत नहीं था, गोरा चिट्टा 6 फीट की कद काठी वाला गढ़ा हुआ शरीर – रघु शादी के समय बड़ा आकर्षक लग रहा था | शीघ्र ही पुष्पा दो बच्चो की माँ बन गई , पंडित जी बहुत खुश रहते थे, खाली समय में वे घंटो पोते पोती के साथ खेलते,उन्हें पढ़ाते लिखाते रहते थे |      
पंडित जी के जीवन काल तक तो उनके प्रभाव से पुष्पा दबी रही और सबके प्रति व्यवहार भी ठीक रहा , परन्तु पंडित जी के देहान्त के बाद पुष्पा ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये । सास की सेवा कौन करेगा ? सोचकर उसने रघु का ट्रांसफर गुन्डरदेही करवा लिया।
लड़की नंदा पढ़ने लिखने में होशियार थी | बेटा दीपक की संगत बिगड़ गई थी ,वह भी 12 वीं तक पढ़कर पढ़ाई छोड़ दिया और लड़को के साथ घूमता रहता था । रघु सीधे सादे आदमी है इसलिये दीपक ने कभी भी न तो पिता की बात मानी और ना ही उनका सम्मान किया । जब माँ ही रघु का सम्मान नहीं करती थी तो दीपक क्या करता ? पुष्पा एक बार दल्ली छोड़कर गई तो फिर कभी वापस सास से मिलने नहीं आई ।
कुछ दिनो बाद नंदा की नौकरी रायपुर मे लग गई , अब पुष्पा नंदा के साथ रायपुर में रहने लगी । बहाना था बेटी को अकेले कैसे छोड़ू ? वास्तव में तो वह रघु से पिंड छुड़ाना चाहती थी , वैसे भी रघु के प्रति न तो उसे प्रेम था ना ही मान सम्मान । उसे तो उसके वेतन के पैसो से मतलब रहता था । बात बात पर वह रघु का अपमान कर देती थी । कहती थी - तुम को कुछ नहीं आता।
पंकज दादी के पास आता जाता रहता था , मीठी –मीठी बातें करके दादी से पैसे ऐंठकर ले जाता था । दादी को हर माह पेंशन के पैसे मिलते थे । पाठक माताजी का सादा रहन सहन था , कुछ ज्यादा खर्चा नहीं । पंडित जी के नाम के प्रभाव से अभी भी दान पुन्य का सामान उनके घर आ ही जाता था ।दीपक कभी दादी , कभी पापा कभी मम्मी के पास रहता और घूम-घूमकर मजे करता रहता था । दादी दल्ली में रहती , पिता गुन्डरदेही में , माँ पुष्पा व नंदा बहन रायपुर में रहते थे ।
अब कुछ दिनों से पाठक माताजी बहुत बीमार हैं उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं । माताजी अपना घर छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहती या कोई उन्हें अपने पास रखना नहीं चाहते ।बेटा , बहू उनके पास आना नहीं चाहते और उन्हें अपने पास ले जाना भी नहीं चाहते । 
पुष्पा रायपुर में मंदिर में रोज सत्संग में जाती है और सत्संग में बड़े-बड़े व्याख्यान देती है । उसका नारा रहता है - हम सुधरेंगे- जग सुधरेगा।
विश्व का कल्याण हो , प्राणियों में सद्भावना हो।
अधिकतर आयोजनों में पुष्पा की सहभागिता प्रमुख रहती है और मंदिर के कार्यक्रमों में अग्रणी भी वहीं बनती है । सासू माँ बीमार रहती है उसे उनका कभी ध्यान भी नहीं आता है | अपनी जिम्मेदारी को छोड़कर मंदिर के आयोजनों से मिलने वाली वाह वाही में पुष्पा मगन रहती थी और यहाँ माताजी अपने बुढ़ापे में अंतिम घड़ियाँ अकेले झेल रही है |अकेली रहते रहते उनके खाने पीने की व्यवस्था ठीक नहीं रहती है उनसे स्वंम कुछ होता नहीं है दूसरा कोई उनका ख्याल रखने वाला नहीं है. उपदेश देने वाली बहू को उनकी कोई चिंता नहीं है. 

डॉ. शिरोमणिमाथुर
दल्लीराजहरा
9893742299 
shiromanimathur@gmail.com