अध्याय:10
शतरंज की चाल और हवा का रुख
शहर के मशहूर क्लब में शतरंज का फाइनल मुकाबला चल रहा था। एकतरफ थे 'विक्रम', जो अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे और पिछले तीनसालों से चैंपियन थे। दूसरी तरफ था एक नया लड़का, 'आर्यन'।
खेल के बीच में विक्रम ने एक ऐसी चाल चली कि आर्यन उलझ गया। विक्रम के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी'सुपरियर' बुद्धि ने फिर से कमाल कर दिया है। जब विक्रम जीते, तो उन्होंनेमीडिया से कहा, "यह मेरी गहरी समझ और रणनीति का परिणाम है। प्रतिभा कभी असफल नहीं होती।"
अगले साल फिर वही दोनों आमने-सामने थे। इस बार पासा पलट गया। एक छोटी सी गलती, और विक्रम हार गए। हारते ही विक्रम काआत्मविश्वास मलबे की तरह ढह गया। वे कमरे में बंद हो गए। उन्हें लगाकि वे अब 'अयोग्य' और 'कमजोर' हो चुके हैं। वे अपनी पिछली जीतों कोभूल गए और खुद को कोसने लगे। उन्हें लगने लगा कि उनका ज्ञान अबकिसी काम का नहीं रहा।
विक्रम के पुराने कोच, जो शांत स्वभाव के थे, उनके पास आए। उन्होंनेविक्रम को शांत होकर विश्लेषण करने को कहा।
कोच ने कहा, "विक्रम, पिछले साल जब तुम जीते थे, तब आर्यन बीमारथा और उसकी एकाग्रता कम थी। वह एक 'संयोग' था जिसने तुम्हारीकाबिलियत को और निखारा। और इस साल, जिस दिन मैच था, तुम्हें घरकी एक बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। तुम्हारी 'परिस्थितियों' नेतुम्हारे फैसले को प्रभावित किया।"
कोच ने आगे समझाया, "हम अक्सर अपनी समझ को जरूरत से ज्यादामान लेते हैं। सफलता में केवल हमारी मेहनत नहीं, बल्कि समय औरहालात का भी बड़ा योगदान होता है।"
विक्रम को अपनी गलती समझ आ गई। उन्होंने महसूस किया कि न तो वेपिछले साल 'भगवान' थे और न ही इस साल 'बेकार'। उन्होंने खुद कोअयोग्य मानना बंद कर दिया। उन्होंने सीखा कि सफलता मिलने परअहंकार नहीं और असफलता मिलने पर आत्म-ग्लानि नहीं होनी चाहिए।
अब विक्रम किसी भी जीत या हार को व्यक्तिगत रूप से लेने के बजाय, शांत होकर परिस्थितियों को देखते हैं। इससे उनके फैसले अब पहले सेकहीं ज्यादा सही और संतुलित होने लगे हैं।
सीख :
जीवन के सफर में सफलता और असफलता केवल हमारी काबिलियतका पैमाना नहीं हैं। कई बार संयोग और परिस्थितियाँ भी बड़ी भूमिकानिभाती हैं। खुद को जरूरत से ज्यादा ज्ञानी या जरूरत से ज्यादा अयोग्यसमझना, दोनों ही गलत हैं। सच्ची समझदारी शांत होकर हर पहलू कोसमझने और हर स्थिति में संतुलित रहने में है।
सफलता मिलने पर केवल अपनी काबिलियत का अहंकार न करें औरअसफलता पर खुद को कमजोर न समझें। याद रखें कि परिस्थितियों औरसंयोग का भी बड़ा योगदान होता है। शांत होकर लिए गए फैसले ही सहीदिशा दिखाते हैं।
अध्याय:11
खामोश धुन का जादू
पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से शहर में एक अजीब सी प्रतियोगिता कीघोषणा हुई। विषय था—'सफलता का स्वर'। शहर के दो सबसे होनहारयुवा, सुमित और कबीर, इसमें शामिल हुए। सुमित अपनी वाक्पटुता औरबड़ी-बड़ी योजनाओं के लिए मशहूर था। वह जहाँ भी जाता, अपनीभविष्य की सफलताओं के ढोल पीटना शुरू कर देता।
प्रतियोगिता के पहले दिन ही सुमित ने एक बड़ी सभा बुलाई। "मैं एक ऐसासंगीत यंत्र बनाऊँगा जिसकी गूंज मीलों तक जाएगी! मैंने पूरी रूपरेखातैयार कर ली है," वह आत्मविश्वास से चिल्लाया। लोगों ने तालियांबजाईं। सुमित को लगा जैसे उसने आधा काम तो वहीं पूरा कर लिया है। उसके अहंकार को इस झूठी प्रगति से बड़ी संतुष्टि मिली।
वहीं दूसरी ओर, कबीर की कार्यशाला का दरवाजा बंद था। वहाँ से न कोई आवाज़ आ रही थी, न ही कबीर किसी से अपनी योजना साझा कररहा था। लोग कानाफूसी करने लगे, "क्या कबीर डर गया है? या उसकेपास कोई विचार ही नहीं है?"
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, सुमित अपनी ऊर्जा 'बताने' में खर्च करने लगा। वह हर शाम कॉफी शॉप पर अपनी प्रगति के किस्से सुनाता। लेकिनहकीकत यह थी कि उसकी ऊर्जा बातों में ही बह रही थी। उसे लगा किलोग उसकी तारीफ कर रहे हैं, तो वह सफल हो गया है।
उधर, कबीर अपने काम में डूबा हुआ था। वह सुबह से रात तक बिनाकिसी से बात किए, चुपचाप और लगातार मेहनत कर रहा था। उसनेअपनी पूरी ऊर्जा को केवल अपने काम पर लगा दिया था। उसके पासबातें करने के लिए समय नहीं था क्योंकि वह जानता था कि बोलना औरकाम करना, दोनों एक ही मानसिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं।
प्रतियोगिता का अंतिम दिन आया। सुमित मंच पर आया और उसने अपनीयोजना के बारे में फिर से लंबा भाषण दिया। लेकिन जब उसने अपना यंत्रबजाने की कोशिश की, तो उससे केवल एक टूटी हुई और बेसुरी आवाज़निकली। सुमित का आत्मविश्वास ढह गया। उसने योजनाओं पर इतनीबातें की थीं कि उसे असली काम (प्रैक्टिस) करने का समय ही नहींमिला।
अब बारी कबीर की थी। वह खामोशी से मंच पर आया। उसने अपनीबांसुरी जैसी एक अनोखी कलाकृति निकाली। जैसे ही उसने पहला सुरछेड़ा, पूरी घाटी एक रूहानी संगीत से भर गई। संगीत इतना प्रभावशालीथा कि लोगों की आँखों में आँसू आ गए। वह आवाज़ किसी जादुई शक्तिजैसी लग रही थी।
जजों ने कबीर को विजेता घोषित किया। सुमित ने हार मानकर कबीर सेपूछा, "तुमने यह सब चुपचाप कैसे कर लिया? मैंने तो सबको बताया थाकि मैं क्या करने वाला हूँ।"
कबीर ने विनम्रता से कहा, "सुमित, जब हम अपनी योजनाओं का ढिंढोरापीटते हैं, तो हमारा दिमाग उस 'झूठी वाहवाही' को ही सफलता मान लेताहै और काम करने की भूख खत्म हो जाती है। मैंने अपनी ऊर्जा बातों मेंबर्बाद नहीं की, बल्कि उसे उस संगीत में पिरो दिया। सच्चा आत्मविश्वासशब्दों में नहीं, बल्कि काम की गहराई में होता है।"
सीख :
सफलता शोर मचाने से नहीं, बल्कि खामोशी से की गई मेहनत से मिलतीहै। अपनी योजनाओं को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने से पहले उन्हेंधरातल पर उतारें। याद रखें, आपकी ऊर्जा सीमित है—इसे या तो आपबोलकर खत्म कर सकते हैं या फिर काम करके इतिहास रच सकते हैं। असली प्रगति वह है जो परिणाम दिखाते हैं, शब्द नहीं।
अपनी ऊर्जा को बातों पर बर्बाद करने के बजाय काम पर केंद्रित करें। सच्चा आत्मविश्वास चुपचाप और लगातार मेहनत करने से आता है, न किबड़ी-बड़ी बातें करने से।