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संध्या आरती सम्पन्न हो गई। वत्सर ने ढलते सूर्य की साक्षी में कृष्ण के लिए बाँसुरी बजाई। सरिता – शैल उसे एक चित्त से सुनते रहे। जब वत्सर ने वंशी वादन सम्पन्न किया तो शैल का चित्त भंग हुआ। वास्तव की धरातल पर वह आ गया। किन्तु सरिता अभी भी आँखें बंद कर स्थिर बैठी थी। जैसे अभी भी उसे बाँसुरी के सुर सुनाई दे रहे हो, वह उसमें एकाग्र होकर खोई हुई हो। शैल ने उसकी अवस्था भंग करने की इच्छा से सरिता को जगाना चाहा किन्तु वत्सर ने उसे रोक लिया। शैल रुक गया, सरिता की समाधि के सम्पन्न होने की प्रतीक्षा करने लगा। वत्सर ने मंदिर की शेष क्रियाओं को सम्पन्न किया। भगवान कृष्ण के शयन हेतु गर्भ द्वार बंद कर दिए। द्वार बंद होते ही सरिता अपने भाव विश्व को छोड़कर लौट आई। उसके मुख पर प्रसन्नता थी।
“सरिता जी, कहाँ खो गई थी? बाँसुरी तो कब की बंद हो चुकी है।”
“शैल, मुझे तो अभी भी दूर दूर बाँसुरी के सुर सुनाई दे रहे हैं। ध्वनि मंद है किन्तु उसे सुन सकूँ इतनी स्पष्ट है। तुम्हें सुनाई दे रही है? ध्यान से सुनो।”
“क्या?” शैल ने भी एकाग्र होकर बाँसुरी के सुरों को सुनने का यत्न किया। “मुझे तो कोई स्वर नहीं सुनाई दे रहे हैं।”
“शैल, कोई स्वर नहीं सुनाई देगा क्यों कि बाँसुरी के सभी सुर शांत हो गए हैं।”
“तो सरिता जी को क्या कोई भ्रम?”
“नहीं, उन्हें कोई भ्रम नहीं हो रहा है।”
“वत्सर, यह मेरा भ्रम है या सत्य? क्या है यह?”
“न तो भ्रम है यह न सत्य। यह एक सापेक्ष घटना है।”
“यह क्या होता है?”
“सारा से सरिता बनने के पश्चात आपका यह प्रथम कृष्ण मिलन है। अत: स्वयं कृष्ण आपके भीतर बसकर अभी भी आपको बाँसुरी के सुरों का अनुभव करा रहे हैं। वास्तव में तो वह कब के सम्पन्न हो चुके हैं।”
“क्या यह संभव है?”
“जो बात हमारी समज के वृत्त से बाहर की होती है वह हमें असंभव लगती है। किन्तु वह संभव होती है। हमारी बुद्धि का विस्तार अति अल्प है। उससे बाहर का व्याप अनंत होता है। अनंत का वह विस्तार अनंत संभावनाओं से भरा होता है, जो हमें असंभव स प्रतीत होता है।”
“तुमने कुछ गहन बात कह दी, वत्सर। तुम कितने ज्ञानी हो!”
“शैल, मैंने कहा था न कि वत्सर शास्त्रों का ज्ञाता है। हमारे मन की उस शंका का समाधान वत्सर त्वरित कर देगा।”
“कौन सी शंका? मैं कोई शास्त्रज्ञ नहीं हूँ।”
“हम तो मानते हैं कि तुम शास्त्रों के ज्ञाता हो। तुम्हारा ज्ञान उच्च है। अत: हमारे प्रश्नों के उत्तर भी तुम से ही अपेक्षित है। क्या उस प्रश्न को पुछ लें?”
“शैल, पुछ ही लो। अब विलंब का कोई कारण नहीं है।”
“कौन सा प्रश्न? कैसा प्रश्न? मेरा ज्ञान अत्यंत सीमित है। हो सकता है मैं उत्तर देने में असमर्थ रहूं।”
“हमारा तुम पर पूरा विश्वास है। प्रश्न यह है कि हमारे शरीर का बडा महत्व है ऐसा शास्त्र बताते हैं। तो बताओ कि हमारे शरीर का क्या महत्व है? कितना महत्व है? क्यों महत्व है?”
“ऐसा प्रश्न क्यों?”
“वत्सर, हमने बताया था कि सरिता जी मैया शुतुद्री में स्वयं को समर्पित करके आत्महत्या करने जा रही थी और पुजारी के बेटे ने उन्हें बचा लिया था। तब वह युवक ने कहा था कि मनुष्य के शरीर का बडा महत्व है। उसे ऐसे नष्ट नहीं करना चाहिए। अब बताओ कि हमारे उस नाशवंत शरीर का महत्व क्या है?”
“उसी युवक ने हमें यहाँ तुम्हारे पास आने का मार्ग भी दिखाया था”
“क्या? वह युवक मुझे जानता है? क्या उसने मेरा नाम लेकर आपको यहाँ आने को कहा था?”
“ऐसा सीधे सीधे तो नहीं कहा था।”
“तो कैसे कहा था, शैल?”
“उसने कहा था कि कोई ज्ञानी व्यक्ति ही हमारे शरीर का महत्व बताएगा। बस, हमें तुम्हारा स्मरण हो आया।”
‘सरिता जी, आप मुझे ज्ञानी समजकर यहाँ आए हो?”
“हम नहीं जानते। यहाँ आने के उपरांत हमें कोई और स्थान सुझा ही नहीं।”
“कदाचित विधि का यही विधान हो, यही नियति हो।”
“तो हमें उचित उत्तर दो, वत्सर।”
“चलो, यही कृष्ण की इच्छा होगी। मैं मेरी अल्प मति अनुसार उत्तर देने का प्रयास करूंगा। किन्तु भोजन के पश्चात। आओ, भोजन करते हैं।” सभी ने भोजन किया।
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प्रवृत्ति से निवृत्त होकर तीनों मंदिर के प्रांगण में आकर बैठ गए। सरिता और शैल के प्रश्न का उत्तर देते हुए वत्सर ने कहा, “आपका प्रश्न था कि हमारे शरीर का महत्व क्या है? मूल्य क्या है? हैं न? मैं मति अनुसार उत्तर देने का प्रयास करता हूँ।”
“हमें प्रतीक्षा है, वत्सर।”
“आप यह तो जानते ही हैं कि आप और आपका शरीर दोनों भिन्न है।”
“इस विषय में सुना अधिक है, समझा कुछ भी नहीं। वास्तव में यह है क्या?”
“सरिता जी, हमारे शरीर के भीतर जो रहता है वह हम हैं। हम शरीर की भांति स्थूल रूप में नहीं हैं, हमारा रूप सूक्ष्म है। इसी रूप से हम शरीर को धारण करते हैं। हम सब इतना तो जानते हैं कि हमारा शरीर पाँच महाभूतों का बना हुआ है, पृथ्वी -जल- वायु – अग्नि और आकाश। किन्तु क्या इन पाँच तत्वों को मिला दिया जाए तो शरीर बन जाएगा क्या?”
“ऐसा होता तो प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने अनेकों शरीर बना डाले होते।” शैल ने कहा।
“तो शरीर कैसे बनता है?”
“सरिता जी, शैल ने कहा वह सत्य है। अभी तक वैज्ञानिक ऐसा नहीं कर पाए। क्यों कि हमारे शरीर में कुल पचीस तत्व विद्यमान होते हैं। इन पचिस तत्वों से ही यह शरीर को हम धारण करते हैं। इनमें से दो तत्व ऐसे हैं जिनके न होने पर यह शरीर अचेत ही रहता है। यह दो तत्व हैं, प्रकृति और पुरुष। प्रकृति का अर्थ है परमतत्व। पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष वाला पुरुष नहीं है। पुरुष का अर्थ है आत्मा। इन दो तत्व, आत्मा और परमात्मा के बिना शरीर निश्चेत रहता है। यह जो पुरुष है, यह जो आत्मा है वह हम हैं। हमारे साथ परम तत्व प्रकृति भी साथ मिलकर इस शरीर को धारण करता है। यह दो तत्व शरीर को छोड़ देते हैं तब शरीर की मृत्यु हो जाती है।”
“हम और शरीर भिन्न हैं यह सिद्ध हो गया।”
“यही सत्य है, शैल।”
“अन्य तेईस तत्व कौन से हैं?”
“सरिता जी, गिनते रहना। पाँच महाभूत, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच तन्मात्राएं और मन – बुद्धि -अहंकार। यही हैं तेईस तत्व।”
“मन, बुद्धि, अहंकार और पंच महाभूत के विषय में तो ज्ञान है। कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और तन्मात्राएं? ये क्या है?”
“इसे सरलता से समझते हैं, शैल। प्रारंभ करते हैं कर्मेन्द्रियों से। हाथ, पग, वाक, गुदा और उपस्थ। ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं। जिस इंद्रिय से हम कोई कर्म करते हैं उसे कर्मेन्द्रिय कहते हैं। हाथ से आदान – प्रदान, पग से चलना, वाक से बोलना, गुदा से मल त्याग करना और उपस्थ से जनन करना। इनके यह कर्म हैं।”
“समज में आया।”
“सरिता जी, आपको भी समज आया होगा।” सरिता ने हकार का संकेत किया।
“अब ज्ञानेन्द्रिय की बात करें तो आँख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा। ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। आँख से देखना, नाक से सूंघना, कान से सुनना, जिह्वा से रस ग्रहण करना और त्वचा से स्पर्श का अनुभव करना। ये सब ज्ञानेन्द्रियों के कार्य हैं।”
“इनको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं यह तो अब जाना।”
“अब बची पाँच तन्मात्राएं। कौन कौन सी हैं? उनके क्या क्या कार्य हैं?”
“सरिताजी, रस, रुप गंध, शब्द और स्पर्श। यह पाँच तन्मात्राएं हैं। इनके कार्य तो सबको विदित है। इस प्रकार हमारे शरीर की रचना होती है। शरीर धारण करने के लिए हमें माता के गर्भ की आवश्यकता होती है। हम अर्थात पुरुष अर्थात आत्मा, प्रकृति के साथ माता के गर्भ में प्रवेश करते हैं। समय आने पर माता के गर्भ से पृथक होकर स्वतंत्र रूप से जन्म लेते हैं।”
“किन्तु हम जन्म क्यों लेते हैं?”