वकील पति का घमंड टूटा in Hindi Drama by Raju kumar Chaudhary books and stories PDF | वकील पति का घमंड टूटा

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वकील पति का घमंड टूटा



“गर्भवती पत्नी को धक्का देकर बोला मैं वकील हूँ, तुम कुछ नहीं कर सकती!’… उसे नहीं पता था कि वह भारत के चीफ जस्टिस की बेटी है।”
मैं अनन्या हूँ। उम्र अट्ठाईस साल। और उस रात, जब मेरी दुनिया टूट रही थी… मैं सात महीने की गर्भवती थी।

तीन साल पहले जब मेरी शादी रोहित से हुई थी, मुझे सच में लगा था कि मुझे वो इंसान मिल गया है जिसके साथ मैं पूरी जिंदगी सुरक्षित और खुश रहूँगी। रोहित दिल्ली की एक बड़ी कॉर्पोरेट लॉ फर्म में काम करने वाला तेज़-तर्रार और महत्वाकांक्षी वकील था। आत्मविश्वासी, स्मार्ट, और हमेशा अपने करियर के बारे में बड़े सपने देखने वाला।

जब हम मिले थे, उसने मुझे एक साधारण लड़की के रूप में जाना था एक फ्रीलांस लेखिका और कभी कभी ट्यूशन पढ़ाने वाली। सादा जीवन जीने वाली, बिना किसी खास बैकग्राउंड के।

और सच कहूँ तो… यही मैं चाहती भी थी।

मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझे मेरे परिवार की वजह से जाने। मैं चाहती थी कि रोहित मुझे इसलिए चुने क्योंकि मैं मैं हूँ, न कि इसलिए कि मैं किस घर से आती हूँ।

इसलिए मैंने अपनी पहचान छिपा ली।

मैंने अपना असली सरनेम नहीं बताया।
मैंने अपने परिवार के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया।

क्योंकि मैं देखना चाहती थी कि बिना किसी ताकत, बिना किसी नाम और बिना किसी प्रभाव के क्या कोई मुझे सच में प्यार कर सकता है।

लेकिन शायद… यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।

शादी के बाद धीरे-धीरे सब बदलने लगा।

शुरू में छोटी-छोटी बातें थीं। रोहित का देर से घर आना, मेरे काम को गंभीरता से न लेना, या उसकी माँ का मुझे ताना मारना कि मैं “किसी काम की नहीं” हूँ। मैं चुप रही। मैंने सोचा हर शादी में थोड़ा समय लगता है।

लेकिन रोहित की माँ सुशीला देवी मुझे कभी अपनी बहू मान ही नहीं पाईं।

उनकी नजरों में मैं हमेशा “गरीब घर की लड़की” थी जिसने उनके सफल बेटे से शादी करके किस्मत बना ली।

धीरे-धीरे उनकी बातें तानों से आदेशों में बदल गईं।

और रोहित…
वह कभी मेरा साथ नहीं देता था।

हर बार वही एक जवाब
“माँ का दिल मत दुखाओ, अनन्या।”

जब मैं गर्भवती हुई, मुझे लगा शायद सब बदल जाएगा।

शायद एक बच्चे की खबर परिवार को करीब ला देगी।
शायद रोहित मुझे थोड़ा और समझेगा।
शायद उसकी माँ का दिल भी पिघल जाएगा।

लेकिन हुआ इसका उल्टा।

जैसे-जैसे मेरा पेट बड़ा होता गया, घर में मेरी इज्जत छोटी होती गई।

और फिर आई वो रात… क्रिसमस ईव की रात।

रोहित के माता-पिता के बड़े घर में फैमिली डिनर रखा गया था। लगभग पंद्रह मेहमान आने वाले थे—रोहित के ऑफिस के लोग, कुछ रिश्तेदार, और कुछ खास लोग जिन्हें प्रभावित करना जरूरी था।

मैं उस समय सात महीने की गर्भवती थी। मेरे पैर सूज जाते थे, कमर में लगातार दर्द रहता था, और डॉक्टर ने ज्यादा खड़े रहने से मना किया था।

लेकिन उस रात…

मुझे आराम करने के लिए नहीं कहा गया।

मुझे किचन में भेज दिया गया।

सुशीला देवी ने बड़ी सहजता से कहा,
“इतने मेहमान आ रहे हैं। बहू हो, खाना तो बनाओगी ही।”

और फिर उन्होंने एक लंबी सूची मेरे हाथ में थमा दी।

बटर चिकन।
मटन बिरयानी।
चार तरह की सब्जियाँ।
नान।
रायता।
सलाद।
और तीन तरह की मिठाइयाँ।

मैं अकेली किचन में खड़ी थी।

ओवन की गर्मी, गैस की लपटें, और मेरे शरीर की थकान—सब मिलकर मुझे तोड़ रहे थे। लेकिन मैं चुप रही। क्योंकि मुझे उम्मीद थी कि जब रोहित आएगा… वह समझेगा।

वह कहेगा
“माँ, अनन्या प्रेग्नेंट है। उसे आराम करने दो।”

जब रोहित घर आया, वह सच में किचन में आया भी।

उसने मुझे देखा पसीने से भीगी हुई, थकी हुई, पेट पकड़कर खड़ी।

एक पल के लिए मुझे लगा… अब वह कुछ कहेगा।

लेकिन उसने बस हँसते हुए कहा

“डियर, जल्दी करो। माँ कह रही हैं मेहमान भूखे हैं। और हाँ… स्वाद अच्छा होना चाहिए। मेरी लॉ फर्म के पार्टनर्स आए हैं।”

और फिर वह वाइन का गिलास लेकर लिविंग रूम में चला गया।

उस पल… मेरे दिल के अंदर कुछ टूट गया।

दो घंटे बाद खाना तैयार था।

शानदार डाइनिंग टेबल सजी हुई थी। महँगी प्लेटें, चमकते गिलास, और हँसते हुए मेहमान।

मैंने चुपचाप एक प्लेट ली।

मैं बस टेबल के कोने में बैठकर थोड़ा खाना चाहती थी। पूरे दिन मैंने कुछ ठीक से खाया भी नहीं था।

लेकिन जैसे ही मैं बैठने लगी…

अचानक मेरी कुर्सी खींच ली गई।

मैंने ऊपर देखा।

सुशीला देवी मुझे घूर रही थीं।

उनकी आवाज में व्यंग्य था

“ये कुर्सी कहाँ से उठा ली, अनन्या?”

मैंने थकी हुई आवाज में कहा,
“माँ जी… मैं भी थोड़ा खाना खाना चाहती हूँ। सुबह से किचन में हूँ। चक्कर आ रहे हैं…”

उन्होंने हल्की हँसी हँसी।

और जो उन्होंने अगला वाक्य कहा… उसने पूरी टेबल को चुप करा दिया।

“यहाँ नहीं बैठ सकती। ये सीटें VIP मेहमानों के लिए हैं।”

और फिर उन्होंने धीरे से जोड़ा

“किचन में जाकर खा लो। खड़े होकर।”

उस पल… कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।

और मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में… मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।


Continue....