बांसुरी की धुन भाग :-१६ in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी को धुन भाग :-१६ - बांसुरी को धुन भाग :१६

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बांसुरी को धुन भाग :-१६ - बांसुरी को धुन भाग :१६

बाँसुरी की धुन
भाग 16 — विश्वास की अग्निपरीक्षा
गाँव के बीचोंबीच विशाल पीपल के पेड़ के नीचे आज असाधारण भीड़ जमा थी। स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग और युवा—सभी एकत्रित थे। आज का प्रश्न केवल माही द्वारा मांझी थान में अगरबत्ती दिखाने और गोबर से मोड़ोली करने का नहीं था। यह परंपरा, विश्वास और न्याय के बीच खड़े पूरे समाज का प्रश्न बन चुका था।
सभा में संताली समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू और मांझी हाड़ाम चातुर मांझी उपस्थित थे। बुधराय चाचा भी गंभीर मुद्रा में बैठे थे। गाँव के कई बुजुर्ग शांत थे, जबकि युवाओं के बीच इस विवाद को लेकर पहले से ही बहस चल रही थी।
रामलाल की पत्नी अपनी जेठानी के साथ माही को लेकर सभा में पहुँची। माही ने सभी बुजुर्गों को प्रणाम किया और चुपचाप खड़ी हो गई।
सिनाराम मुर्मू ने गंभीर स्वर में पूछा, “माही, तुम्हें पहले ही मना किया गया था। फिर तुमने मांझी थान में अगरबत्ती क्यों दिखाई और गोबर से मोड़ोली क्यों की?”
माही ने विनम्रता से उत्तर दिया, “सिनाराम चाचा, मैंने किसी का अपमान करने के लिए ऐसा नहीं किया।”
“लेकिन गाँव के लोग इसे अपनी परंपरा के विरुद्ध मानते हैं,” सिनाराम ने कहा।
माही ने उनकी ओर देखते हुए पूछा, “मैं अपनी परंपरा का सम्मान करती हूँ, चाचा। लेकिन क्या अपनी श्रद्धा व्यक्त करने से किसी का अपमान हो जाता है?”
सभा में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
तभी शानू, जो बुधराय का भतीजा था, अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।
“यह सब चालाकी है! आज अगरबत्ती और मोड़ोली, कल कोई दूसरी पूजा-पद्धति लेकर आएगा। फिर हमारी संताली परंपरा का क्या होगा?”
माही ने शांत स्वर में कहा, “शानू भैया, मैं अपनी परंपरा मिटाने नहीं आई हूँ। मैं केवल अपने विश्वास के बारे में प्रश्न पूछ रही हूँ।”
शानू ने तीखे स्वर में कहा, “क्या हमारे हापराम ने हमें गलत रास्ता दिखाया था? क्या मारांग बुरू और लुगु बाबा के प्रति हमारे पूर्वजों की श्रद्धा व्यर्थ थी?”
“मैंने ऐसा कब कहा, भैया?” माही की आवाज में पीड़ा थी। “हमारे हापराम हमारी जड़ें हैं। उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन क्या अपनी जड़ों का सम्मान करते हुए दूसरे के विश्वास को समझने की कोशिश नहीं की जा सकती?”
शानू ने कहा, “धर्म कोई खिलवाड़ नहीं है, माही!”
“आप बिल्कुल सही कहते हैं। धर्म खिलवाड़ नहीं है। इसलिए तो मैं चाहती हूँ कि हम इस प्रश्न को क्रोध से नहीं, समझदारी से देखें।”
माही के उत्तर से सभा में बैठे कुछ युवक एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
तभी किशना टुडू उठ खड़ा हुआ।
“मांझी बाबा, मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ।”
मांझी हाड़ाम चातुर मांझी ने सिर हिलाया। “पूछो, किशना।”
किशना ने सभा की ओर देखते हुए कहा, “चाँदनी पर विपत्ति आई है। यह दुःख की बात है। लेकिन इसका कारण माही की अगरबत्ती ही है, इसका प्रमाण किसके पास है?”
शानू तुरंत बोल पड़ा, “तो क्या तुम मांझी थान के क्रोध को नहीं मानते?”
किशना ने संयमित स्वर में कहा, “मैं मांझी थान का अनादर नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल यह पूछ रहा हूँ कि बिना प्रमाण किसी बेटी को दोषी ठहराना क्या न्याय है?”
“अब तुम भी रामलाल के पक्ष में बोलने लगे?” शानू ने ताना मारा।
किशना ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “मैं रामलाल के पक्ष में नहीं, न्याय के पक्ष में बोल रहा हूँ!”
भीड़ में फिर हलचल होने लगी।
अब तक चुपचाप सबकी बातें सुन रहे सालगे मांझी उठे।
उन्होंने शानू से पूछा, “एक बात बताओ, शानू। अगर किसी परिवार में बीमारी आ जाए, तो क्या हम बिना कारण जाने किसी को दोषी ठहरा देंगे?”
शानू ने कहा, “लेकिन यह मांझी थान की पवित्रता का प्रश्न है।”
सालगे मांझी ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, “हाँ, यह पवित्रता का प्रश्न है। मगर न्याय की पवित्रता भी कोई छोटी बात नहीं है।”
उनकी बात सुनकर कई बुजुर्ग विचारमग्न हो गए।
तभी दागू मुर्मू ने अपनी लाठी सँभालते हुए कहा, “मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, लेकिन एक बात नहीं बदलनी चाहिए।”
सिनाराम मुर्मू ने पूछा, “कौन-सी बात, दागू बाबा?”
दागू मुर्मू ने उत्तर दिया, “मनुष्य के प्रति मनुष्य का सम्मान। हम अपने हापराम को मानते हैं। उनकी परंपराओं को बचाना हमारा कर्तव्य है। लेकिन क्या किसी के मन की बात सुने बिना उसे अपराधी कहना भी हमारे हापराम ने सिखाया था?”
सभा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
तभी बाटुल बेसरा ने अपनी जगह से कहा, “दागू ठीक कह रहा है। परंपरा को बचाना जरूरी है, लेकिन परंपरा के नाम पर किसी का मन तोड़ना भी ठीक नहीं।”
शानू ने असंतोष से कहा, “तो क्या गाँव में अब कोई नियम नहीं रहेगा?”
बाटुल बेसरा ने समझाते हुए कहा, “नियम जरूर रहेगा। लेकिन नियम का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।”
युवाओं की ओर से फिर आवाज उठी।
एक युवक बोला, “अगर आज माही को छोड़ दिया गया, तो कल हर कोई अपनी मनमर्जी करेगा!”
रोहित हेंब्रम ने उसकी ओर देखकर कहा, “भैया, एक बात पूछूँ?”
शानू ने कहा, “बोलो, रोहित।”
रोहित ने कहा, “हमारे हापराम के समय न मोटरसाइकिल थी, न मोबाइल और न आज जैसी शिक्षा। क्या आज इनका उपयोग करने वाले सभी लोग अपनी परंपरा के विरोधी हो गए?”
कुछ युवाओं के चेहरों पर हल्की मुस्कान आ गई।
शानू ने कहा, “मोबाइल और पूजा में अंतर है!”
रोहित ने सिर हिलाया। “अंतर है, मैं मानता हूँ। लेकिन हर नई बात को गलत मान लेना भी तो ठीक नहीं। हमें समझना चाहिए कि कौन-सी बात हमारी संस्कृति को नुकसान पहुँचा रही है और कौन-सी केवल किसी व्यक्ति की अलग आस्था है।”
वह कुछ क्षण रुका। फिर उसके चेहरे पर गंभीरता छा गई।
“मुझे अफसोस और कष्ट के साथ कहना पड़ रहा है कि अगर हमारी पूजा इतनी पवित्र है और मांझी थान इतना पवित्र है, तो हमारे लोग दिकुओं के कर्ज में कैसे फँस गए? शराब पीकर रास्ते में गिरना क्या यही पवित्रता है?”
सभा में बैठे लोगों के चेहरे उतर गए।
रोहित ने अपनी बात जारी रखी।
“कम से कम आज माही और रामलाल चाचा हमारे सामने उदाहरण बनकर खड़े हैं। उनसे हमें सीखना चाहिए। रामलाल चाचा ने शराब छोड़ी, अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाई और अपनी बेटी को पढ़ने का अवसर दिया। क्या हम उनके इस बदलाव को नहीं देखेंगे?”
सभा में गहरी शांति उतर आई।
जो लोग अभी तक परंपरा की रक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, उनमें से कई स्वयं शराब की लत से जूझ रहे थे। कई लोग कर्ज में डूबे हुए थे। उनके बच्चे भी बड़ों को देखकर वही आदतें सीख रहे थे।
शानू के पास रोहित के प्रश्न का तत्काल कोई उत्तर नहीं था।
तभी सभा के पीछे से एक महिला उठ खड़ी हुई। वह इपिल मुर्मू थी, जो गाँव में समाज सेवा के कार्यों के लिए जानी जाती थी।
उसने मांझी हाड़ाम से पूछा, “मांझी बाबा, क्या मैं भी कुछ कह सकती हूँ?”
“कहो, इपिल,” मांझी हाड़ाम ने अनुमति दी।
इपिल ने सभा की ओर देखते हुए कहा, “जब किसी गरीब के घर बीमारी आती है, तो हम सब मदद के लिए दौड़ते हैं। जब किसी की बेटी पढ़ना चाहती है, तो हम कहते हैं कि उसे आगे बढ़ना चाहिए। फिर आज एक बेटी अपने विश्वास की बात कह रही है, तो हम उसे सुनने से क्यों डर रहे हैं?”
एक बुजुर्ग ने कहा, “लेकिन इपिल, समाज की परंपरा भी तो बचानी है।”
“बिल्कुल बचानी है,” इपिल ने उत्तर दिया। “लेकिन क्या परंपरा बचाने के लिए एक बेटी का सम्मान छीनना जरूरी है?”
फिर उसने माही की ओर देखा।
“माही, तुमने जो किया, उसके पीछे तुम्हारी भावना क्या थी?”
माही ने कहा, “दीदी, मेरे मन में किसी के प्रति अनादर नहीं था। मैंने अपने गुरु को स्मरण किया और श्रद्धा से मांझी थान में अगरबत्ती दिखाई। मैं अपने हापराम को भी उतना ही सम्मान देती हूँ।”
इपिल ने कहा, “तो फिर तुम्हारी बात भी पूरी सुनी जानी चाहिए।”
सभा में बैठे लोगों के चेहरे पर अलग-अलग भाव उभरने लगे।
सिनाराम मुर्मू स्वयं असमंजस में थे। उन्हें माही की बातों में कुछ सच्चाई दिखाई दे रही थी, लेकिन वर्षों से चली आ रही परंपरा के विषय में कोई निर्णय लेने से वे हिचक रहे थे।
उन्होंने मांझी हाड़ाम चातुर मांझी की ओर देखा।
“मांझी बाबा, अब आप ही बताइए। इस विवाद का समाधान क्या है?”
मांझी हाड़ाम कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, “मैंने जमीन के विवाद सुलझाए हैं। खेत और पानी के झगड़े सुलझाए हैं। परिवारों के बीच की नाराजगी भी दूर कराई है।”
जाटू ने बीच में कहा, “लेकिन यह विवाद अलग है, मांझी बाबा।”
“हाँ, जाटू,” मांझी हाड़ाम ने स्वीकार किया। “यहाँ एक ओर हमारी परंपरा है, दूसरी ओर एक लड़की के विश्वास का प्रश्न। मैं किसी की भावना को कुचलकर न्याय कैसे करूँ?”
सिनाराम मुर्मू ने कहा, “लेकिन यदि हम परंपरा की रक्षा नहीं करेंगे, तो हमारा समाज कैसे बचेगा?”
मांझी हाड़ाम ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, “परंपरा की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। मगर किसी निर्दोष को दोषी ठहराना हमारा अधिकार नहीं।”
शानू फिर उठ खड़ा हुआ।
“तो क्या माही को कोई दंड नहीं मिलेगा?”
किशना ने तुरंत कहा, “पहले अपराध तो सिद्ध हो, शानू! केवल असहमति को अपराध कैसे मान लें?”
शानू ने नाराजगी से कहा, “तुम लोग समझ नहीं रहे हो। आज यह छोटी बात लग रही है, लेकिन कल इसका परिणाम पूरे गाँव को भुगतना पड़ सकता है।”
रोहित ने उत्तर दिया, “और अगर आज हमने बिना प्रमाण किसी को दोषी ठहरा दिया, तो उसका परिणाम भी तो पूरे गाँव को भुगतना पड़ सकता है।”
दोनों ओर से आवाजें उठने लगीं। कोई परंपरा की दुहाई दे रहा था, कोई न्याय की। कुछ लोग माही के पक्ष में थे, जबकि कुछ उसे दंडित करने की माँग कर रहे थे।
इसी बीच सभा के एक कोने में बैठे दो व्यक्ति अब तक चुपचाप सब कुछ सुन रहे थे। वे थे लाटू हंसदा और रामेश्वर हंसदा।
लाटू हंसदा रामलाल का विरोधी रहा था। रामलाल की दीक्षा और उसके बदले हुए जीवन को लेकर उसके मन में भी अनेक आपत्तियाँ थीं। वह अब तक एक शब्द नहीं बोला था। उसके बगल में बैठे रामेश्वर हंसदा भी शांत थे। दोनों के चेहरे बता रहे थे कि वे भीतर ही भीतर किसी विचार से जूझ रहे हैं।
लाटू ने एक बार माही की ओर देखा। वह सिर झुकाए खड़ी थी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह किसी से बहस नहीं कर रही थी।
लाटू ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। फिर धीमे से रामेश्वर से बोला, “क्या किसी लड़की को इस तरह सबके सामने खड़ा करना उचित है?”
रामेश्वर ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
लाटू फिर चुप हो गया।
सभा में बहस जारी थी। शानू बार-बार परंपरा की दुहाई दे रहा था। कुछ लोग उसका समर्थन कर रहे थे। लाटू से अब और चुप नहीं रहा गया।
वह अचानक उठ खड़ा हुआ।
“बस कीजिए!”
उसकी आवाज सुनकर सभा में बैठे लोग उसकी ओर मुड़ गए। रामलाल भी आश्चर्य से उसे देखने लगा।
शानू ने पूछा, “लाटू, तुम क्या कहना चाहते हो?”
लाटू ने कुछ क्षण माही को देखा। फिर बोला, “मैं रामलाल का विरोध करता रहा हूँ। उसकी दीक्षा से भी मुझे आपत्ति रही है। लेकिन आज मैं एक बात साफ कहना चाहता हूँ—माही को केवल उसके विश्वास के कारण दोषी ठहराना मुझे भी उचित नहीं लगता।”
सभा में हलचल मच गई।
शानू ने अविश्वास से पूछा, “तुम भी माही के पक्ष में बोल रहे हो?”
लातू ाहुत दृढ़ स्वर में कहा, “हाँ, मैं माही के पक्ष में बोल रहा हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मैंने अपनी परंपरा छोड़ दी है। मैं भी अपने हापराम का सम्मान करता हूँ। लेकिन किसी के विश्वास को सुने बिना उसे अपराधी मान लेना कहाँ का न्याय है?”
वह कुछ क्षण रुका। उसकी आवाज पहले से धीमी हो गई।
“मैंने रामलाल का विरोध किया है, लेकिन अगर उसके जीवन में सुधार आया है, तो मैं उस सुधार को झुठला कैसे सकता हूँ? और अगर माही ने किसी का नुकसान नहीं किया, तो मैं उसे दोषी कैसे मान लूँ?”
रामलाल की आँखों में आश्चर्य था। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि उसका विरोध करने वाला व्यक्ति कभी उसके परिवार के समर्थन में खड़ा होगा।
लातू ने आगे कहा, “हमारी परंपरा इतनी कमजोर नहीं होनी चाहिए कि किसी दूसरे के विश्वास से ही टूट जाए। हमें अपनी परंपरा पर भरोसा रखना चाहिए और न्याय भी करना चाहिए।”
कुछ बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा। सभा का वातावरण धीरे-धीरे बदल रहा था।
तभी रामेश्वर हंसदा भी अपनी जगह से उठे।
उन्होंने पहले मांझी हाड़ाम को प्रणाम किया, फिर सभा की ओर मुखातिब हुए।
“मैं भी अपनी बात रखना चाहता हूँ।”
मांझी हाड़ाम ने कहा, “कहो, रामेश्वर।”
रामेश्वर ने शांत स्वर में कहा, “मेरे विचार से हमारी पूजा का एकमात्र उद्देश्य सुख और शांति की प्राप्ति है। मनुष्य पूजा इसलिए करता है कि उसके जीवन में सद्भाव आए, परिवार में शांति रहे और समाज में प्रेम बना रहे। वही असल मार्ग है, जो मनुष्य को बेहतर बनाता है।”
सभा में बैठे लोग ध्यान से सुनने लगे।
रामेश्वर ने आगे कहा, “हमारे देवताओं में भी उतनी ही शक्ति है—यह मेरा विश्वास है। लेकिन उस शक्ति को समझने और अनुभव करने के लिए सिद्ध मंत्रों का अभ्यास आवश्यक हो सकता है। यह मेरा विचार है, और मैं इसे किसी पर थोपना नहीं चाहता।”
उन्होंने मांझी थान की दिशा में हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
“मैं अपने देवताओं का अपमान नहीं करता। मैं अपने हापराम की परंपरा को भी नहीं भूलता। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने गुरु के प्रति श्रद्धा रखता है और उससे अपने जीवन में अच्छे बदलाव लाता है, तो हमें उसके आचरण को भी देखना चाहिए।”
रामेश्वर ने माही की ओर देखा।
“यह बेटी कह रही है कि उसके मन में किसी के प्रति अनादर नहीं था। तो कम से कम उसकी बात सुनने का धैर्य तो हमें रखना चाहिए।”
फिर उन्होंने शानू की ओर देखा।
“शानू, परंपरा की रक्षा जरूरी है। लेकिन क्या परंपरा का उद्देश्य मनुष्य को सुख और शांति देना नहीं है? यदि हमारी किसी बात से किसी निर्दोष का मन टूट रहा है, तो हमें अपने निर्णय पर विचार करना चाहिए।”
शानू ने कोई उत्तर नहीं दिया।
इस बार सभा में बहस नहीं हुई। लोग चुपचाप अपनी-अपनी जगह बैठे रहे। लाटू का बदलता हुआ रुख और रामेश्वर की संतुलित बातों ने विवाद को एक नया मोड़ दे दिया था।
सिनाराम मुर्मू ने दोनों की ओर देखा। उनके चेहरे पर पहले से अधिक गंभीरता थी।
उन्होंने कहा, “आज हम सबके सामने अनेक विचार आए हैं। कोई परंपरा की रक्षा की बात कर रहा है, कोई न्याय की, तो कोई मनुष्य के भीतर आए बदलाव की। शायद हमें इन सब बातों को समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।”
मांझी हाड़ाम चातुर मांझी ने सहमति में सिर हिलाया।
“परंपरा को बचाना है, तो समाज को भी बचाना होगा। और समाज तभी बचेगा, जब हम एक-दूसरे की बात सुनना सीखेंगे।”
सभा में कुछ देर तक मौन छाया रहा।
तभी बागून चाचा धीरे-धीरे अपनी जगह से उठे। वे अब तक अपने छोटे भाई रामलाल की ओर देखने से भी बच रहे थे। उनके मन में वर्षों की नाराजगी, संदेह और अपने ही व्यवहार को लेकर पछतावा एक साथ उमड़ रहे थे।
उन्होंने बोलने के लिए मुँह खोला, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।
उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने एक बार रामलाल की ओर देखा। रामलाल भी उन्हें देख रहा था। दोनों भाइयों के बीच वर्षों से खिंची दूरी उस एक क्षण में जैसे सबके सामने आ गई।
बागून ने काँपते होंठों से कहा, “मैं... मैं रामलाल के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ।”
लेकिन आगे के शब्द फिर गले में अटक गए।
उन्होंने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया और आँखें पोंछीं। कुछ क्षण बाद खुद को सँभालकर बोले, “मैं आज तक रामलाल को दोष देता रहा। मुझे लगता था कि दीक्षा लेने के बाद वह अपनी परंपरा से दूर हो जाएगा। लेकिन आज सोच रहा हूँ... कहीं उसे समझने में ही मुझसे गलती तो नहीं हुई?”
उनकी आवाज भर्रा गई।
“मैंने उसे उसके पुराने जीवन में देखा है। शराब के कारण उसके घर में कितनी परेशानियाँ थीं, यह हम सब जानते हैं। लेकिन आज उसने शराब छोड़ दी है। उसके परिवार में शांति है। उसकी बेटी पढ़ रही है।”
बागून ने रामलाल की ओर देखा। उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
“मैं अपने छोटे भाई को बदलते हुए देख रहा था, फिर भी उसके बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाया। आज मुझे समझ में आ रहा है कि शायद मैं उसकी दीक्षा से इतना डर गया कि उसके भीतर आए अच्छे बदलाव को देख ही नहीं पाया।”
रामलाल की आँखें भी नम हो गईं। वह अपने बड़े भाई को कुछ कहना चाहता था, लेकिन सभा के सामने उसके शब्द नहीं निकले।
बागून ने काँपती आवाज में कहा, “मैं यह नहीं कहता कि मेरे सारे संदेह समाप्त हो गए हैं। लेकिन इतना जरूर मानता हूँ कि किसी के जीवन में अच्छाई आई है, तो हमें उसे पहचानना चाहिए।”
उन्होंने सभा की ओर देखा।
“अगर रामलाल ने शराब छोड़कर अपने परिवार को सँभाला है, तो क्या हम उसके इस बदलाव का सम्मान नहीं कर सकते? क्या हम केवल इसलिए उससे दूर रहें कि उसकी श्रद्धा का रास्ता हमसे अलग है?”
बागून की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
“रामलाल मेरा छोटा भाई है। उसे समझने में मैंने देर कर दी। लेकिन आज मैं इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि उसकी अच्छाई को उसकी दीक्षा के कारण नकारना मेरे लिए भी उचित नहीं होगा।”
रामलाल ने अपने बड़े भाई की ओर देखा। उसके चेहरे पर वर्षों की पीड़ा थी, लेकिन उस पीड़ा के बीच आशा की एक छोटी-सी किरण भी दिखाई दे रही थी।
सभा में बैठे लोग मौन थे।
किसी ने पहली बार बागून को इस तरह भावुक होते देखा था।
दूर पहाड़ी की ओर से हल्की हवा चली। पीपल के पत्ते सरसराने लगे।
रामलाल धीरे-धीरे अपनी जगह से उठने लगा।
आज उसे भी अपनी बात कहनी थी।
क्रमशः…