उम्मीद का सफर in Hindi Love Stories by amjadaara books and stories PDF | Ep 2 अल्फाज़ ए इश्क

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Ep 2 अल्फाज़ ए इश्क

ढलती हुई उस उदास शाम के साए में, कबीर और आयरा एक-दूसरे के बिल्कुल सामने खड़े थे। जिस पुरानी और जादुई डायरी ने पहले ही उनकी रूह को एक दूसरे से पूरी तरह जोड़ दिया था, आज उसी डायरी को सबसे बड़ा गवाह बनाकर दोनों ने बहुत ही भावुक होकर एक-दूसरे का हाथ थामा था। दोनों की आँखों में जुदाई के गहरे आँसू साफ़ नज़र आ रहे थे, पर उनके कांपते होठों पर एक-दूसरे से कभी भी जुदा न होने का एक बेहद पवित्र और मजबूत वादा भी था। वे आज आख़िरकार मिल तो चुके थे, लेकिन हालात की संगीन मजबूरियों ने उनके चारों तरफ एक ऐसी अदृश्य और बेरहम लक्ष्मण रेखा खींच दी थी जिसे वे चाहकर भी पार नहीं कर सकते थे। इस मतलबी ज़माने की बंदिशों ने उन्हें एक-दूसरे से दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उनकी यह ख़ूबसूरत मोहब्बत आज इस मोड़ पर आकर ठहर गई थी। यह अंत बिल्कुल नहीं था, बल्कि एक ऐसी अधूरी दास्ताँ थी जो मुकम्मल होने से ठीक पहले अधूरी रह गई थी।

इस गहरे अधूरेपन और दिल में छुपी दोबारा मिलने की अटूट आस को कबीर ने डायरी के पन्नों पर अपनी कलम से इस दर्दभरी ग़ज़ल के ज़रिए उतारा:

मिले तो थे मगर मिलकर भी हमारी मोहब्बत अधूरी रही,पास आए थे इतने, फिर भी ये कैसी अजीब दूरी रही।

वो हाथ थामकर जो खाए थे कभी साथ जीने के वादे,वफ़ा के वो सारे क़स्में आज वक़्त के आगे अधूरी रही।

डायरी के पन्नों पर लिखे थे जो मिलन के हसीं ख़्वाब,हक़ीक़त की धूप में वो हर एक अधूरी ख़्वाहिश रही।

बिछड़ रहे हैं आज कुछ वक़्त के लिए इस मोड़ पर हम,पर यक़ीन है कि मुकम्मल होगी जो आज अधूरी रही।

लौटेंगे फिर से हम दोनों एक दिन अपनी उसी राह पर,जो राहें आज इस मुश्किल सफर में हमारे बीच अधूरी रही।

कबीर ने भारी मन से उस डायरी को आहिस्ता से बंद किया। ज़माने ने भले ही आज उन्हें अलग-अलग रास्तों पर चलने के लिए मजबूर कर दिया था, लेकिन उनके दिलों के तार उस डायरी के अलफ़ाज़ों से हमेशा के लिए मजबूती से बंध चुके थे। आयरा जब कबीर से दूर जा रही थी, तो उसने मुड़कर एक आख़िरी बार कबीर की तरफ देखा। उसकी मासूम आँखों में बहते हुए आँसू तो साफ़ दिख रहे थे, मगर साथ ही उन आंसुओं के पीछे एक अटूट विश्वास भी छुपा हुआ था। वह विश्वास जो कह रहा था कि यह जुदाई हमेशा के लिए नहीं है। यह तो बस वक़्त का एक छोटा सा इम्तिहान है, जिससे गुज़रकर उनकी मोहब्बत को और भी पाक होना था। कबीर जानता था कि आने वाला समय कठिन होगा, जहाँ हर पल भारी बीतेगा। दिन बदलेंगे, पर कहानी का हर लफ़्ज़ दिलों में उम्मीद का दीया जलाए रखेगा। तक़दीर ने पन्ना पलट दिया, लेकिन किताब बंद नहीं हुई थी। दोनों को यक़ीन था कि इस सफ़र के बाद, किस्मत उन्हें फिर सामने खड़ा करेगी। तब यह अधूरी दास्ताँ पूरी तरह मुकम्मल होगी और दोनों एक हो जाएंगे। 1 2 3 4 5