बाँसुरी की धुन
भाग 18 — त्याग की राह
सुबह का सूरज गाँव के ऊपर धीरे-धीरे चढ़ रहा था। लेकिन उस दिन गाँव की सुबह में रोज जैसी चहल-पहल नहीं थी। लोगों के चेहरों पर उदासी थी। किसी के मन में आक्रोश था, तो किसी की आँखों में आँसू।
रामलाल अपनी पत्नी सलमा और बच्चों के साथ गाँव छोड़कर वन की ओर जा रहा था। उसके कंधे पर एक छोटी-सी गठरी थी। सलमा ने जरूरी सामान बाँध रखा था। बच्चे अपने पिता के पीछे चुपचाप चल रहे थे। उन्हें पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उनका परिवार अपना घर छोड़कर क्यों जा रहा है।
रामलाल केवल एक परिवार का मुखिया नहीं था। वह सरकारी विद्यालय में शिक्षक भी था। वर्षों से गाँव और आसपास के बच्चों को शिक्षा देता आया था। उसके लिए विद्यालय केवल नौकरी का स्थान नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को सँवारने का माध्यम था। आज गाँव छोड़ते समय उसके मन में अपने विद्यार्थियों की चिंता भी थी।
पीछे गाँव के लोग खड़े थे।
कोई उन्हें रोकना चाहता था, कोई समझाना चाहता था, लेकिन अब तक किसी की बात रामलाल के निर्णय को बदल नहीं सकी थी।
उसके बड़े भाई बागुन की आँखें भर आई थीं। उनकी पत्नी, जिन्हें सलमा अपनी बड़ी दीदी कहती थी, बार-बार अपने आँचल से आँसू पोंछ रही थीं।
बागुन ने भारी आवाज में पुकारा, “रामलाल! ओ रामलाल! एक बार फिर सोच ले, भाई। अपना घर छोड़कर कोई कहाँ जाएगा?”
रामलाल रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर देखा। बड़े भाई का चेहरा देखकर उसका कलेजा काँप उठा। वह उनके पास आया और उनके पैर छू लिए।
बागुन ने उसे दोनों हाथों से उठाकर सीने से लगा लिया।
“तूने ऐसी कौन-सी गलती कर दी, जिसके लिए तुझे इतनी बड़ी सजा मिल रही है? क्या अपनी पत्नी और बच्चों की आस्था का सम्मान करना अपराध है? क्या इसके लिए अपने ही गाँव को छोड़ देना पड़ेगा?”
रामलाल की आँखें भी नम हो गईं।
“दादा, मैं गाँव छोड़ना नहीं चाहता। यह मेरी जन्मभूमि है। इसी मिट्टी में हमारे पुरखों के पदचिह्न हैं। इसी गाँव में मैंने बचपन बिताया है। इसी गाँव के बच्चों को पढ़ाते हुए मैंने अपना जीवन बिताया है। लेकिन मेरे कारण अगर गाँव के लोग आपस में लड़ने लगें, तो मैं कैसे चैन से रह सकता हूँ?”
बागुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो क्या तू चला जाएगा और हम तुझे रोकने के लिए कुछ नहीं करेंगे?”
रामलाल कुछ बोल नहीं पाया।
तभी बागुन की पत्नी आगे आईं। उन्होंने अपनी छोटी बहन सलमा को सीने से लगा लिया।
“सलमा! तू भी हमें छोड़कर चली जाएगी? इस घर में तेरे आने के बाद कितनी रौनक थी। आज तेरे जाने की बात सुनकर घर का आँगन सूना लगने लगा है।”
सलमा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“दीदी, आप मुझे अपनी बेटी की तरह मानती रही हैं। मैं आपको छोड़कर नहीं जाना चाहती। लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती कि मेरे कारण परिवार के लोग एक-दूसरे से दूर हो जाएँ।”
दीदी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बहन, घर के लोगों में मतभेद होते हैं। क्या हर मतभेद पर घर छोड़ दिया जाता है?”
सलमा ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, “नहीं दीदी। लेकिन जब मतभेद पूरे गाँव को बाँटने लगे, तब कभी-कभी किसी को पीछे हटना पड़ता है।”
दीदी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। उन्होंने सलमा को फिर गले लगा लिया।
दोनों बहनों की आँखों से आँसू बहते रहे। एक ही परिवार की दो बेटियाँ आज एक-दूसरे से बिछुड़ रही थीं। एक गाँव में रह जाने को विवश थी, तो दूसरी अपने पति और बच्चों के साथ अनजान वन की ओर जाने को तैयार थी।
उधर रामलाल के मित्र भी उसे रोकने के लिए आगे आए।
सबसे पहले लातू हांसदा ने उसका रास्ता रोक लिया।
“रामलाल, तू सचमुच जाने का फैसला कर चुका है? क्या हमारी बात का भी कोई महत्व नहीं रहा?”
रामलाल ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“लातू, तुम सब मेरे अपने हो। इसी कारण तो मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम्हारे बीच दुश्मनी पैदा हो।”
लातू ने लगभग झुँझलाते हुए कहा, “अरे, गाँव में मतभेद हैं तो बैठकर सुलझाएँगे! तू चला जाएगा तो क्या सारे मतभेद समाप्त हो जाएँगे? कल किसी दूसरे परिवार में ऐसा प्रश्न उठा, तब क्या वह भी गाँव छोड़ देगा?”
रामलाल चुप रहा।
लातू की आवाज भर्रा गई।
“भाई, मैं तुझे रोक नहीं पाया, तो जिंदगी भर अपने आपको माफ नहीं कर पाऊँगा।”
रामलाल ने उसे गले लगा लिया।
“मुझे कमजोर मत समझना, लातू। गाँव छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं है। लेकिन इस समय मैं अपने दुख से बड़ा गाँव की एकता को मान रहा हूँ।”
लातू ने उसकी पीठ थपथपाई, मगर उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
तभी रामेश्वर हांसदा आगे आए। गाँव में सभी उन्हें रामेश्वर चाचा कहकर बुलाते थे। उम्र ने उनकी कमर झुका दी थी और आँखों की रोशनी भी कमजोर पड़ गई थी। फिर भी गाँव के लोग उनके अनुभव का सम्मान करते थे।
उन्होंने रामलाल का हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, मेरी बात मान ले। मैं बूढ़ा हो गया हूँ। पता नहीं कितने दिन और इस दुनिया में रहूँगा। लेकिन जाते-जाते अपने गाँव के एक बेटे को इस तरह बिछुड़ते नहीं देखना चाहता।”
रामलाल ने उनके चरण छुए।
“चाचा, आप ही बताइए, मैं क्या करूँ? एक तरफ मेरी पत्नी है, जिसके विश्वास का सम्मान करना मेरा धर्म है। दूसरी तरफ मेरा गाँव है, जिसके लोगों से मेरा जीवन जुड़ा है। मैं किसी का अपमान नहीं करना चाहता।”
रामेश्वर चाचा ने उसकी ओर देखा।
“बेटा, त्याग करना सरल नहीं होता। अपना घर, अपनी मिट्टी और अपने लोगों को छोड़ना किसी सजा से कम नहीं है। लेकिन त्याग तभी सार्थक है, जब उसके पीछे किसी के प्रति घृणा नहीं, बल्कि सबके कल्याण की भावना हो।”
रामलाल की आँखें झुक गईं।
रामेश्वर चाचा ने फिर कहा, “तू जा रहा है, लेकिन अपने मन में गाँव के लिए कटुता मत रखना। कल को यही लोग तुझे पुकारें, तो लौटने का रास्ता खुला रखना।”
रामलाल ने उनके पैर पकड़ लिए।
“चाचा, मेरे मन में किसी के लिए बैर नहीं है। मैं अपने गाँव को छोड़ रहा हूँ, अपने लोगों को नहीं।”
यह सुनकर रामेश्वर चाचा की बूढ़ी आँखों में आँसू चमक उठे।
उन्होंने आकाश की ओर देखा, फिर रामलाल के सिर पर काँपता हुआ हाथ रख दिया।
“रामलाल, मेरी बूढ़ी आँखें आज एक बात कह रही हैं। तेरे इस त्याग से यह प्रमाण मिलता है कि तू भगवान के रास्ते पर है। तूने अपने स्वार्थ से पहले सबके कल्याण को रखा है। मारांग बुरु अवश्य तेरी रक्षा करेंगे।”
कुछ क्षण के लिए वहाँ खड़े सभी लोग शांत हो गए।
रामेश्वर चाचा ने आगे कहा, “लेकिन बेटा, याद रखना—मारांग बुरु की कृपा केवल जंगल में रहने से नहीं मिलती। वह मनुष्य के कर्म, सत्य और उसके हृदय की पवित्रता में भी दिखाई देती है। अपने परिवार की रक्षा करना, बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और किसी के प्रति अन्याय न करना। यही तेरी आगे की परीक्षा होगी।”
रामलाल की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने चाचा के पैर छुए।
“आपका आशीर्वाद मेरे लिए सबसे बड़ी पूँजी है।”
सोहरी भी आगे आया। उसकी आँखें नम थीं।
“रामलाल, तू जानता है कि मैं हमेशा से तेरे परिवार के सुख-दुख में साथ रहा हूँ। आज तुझे इस तरह जाते देखकर मन काँप रहा है। वन में जीवन आसान नहीं होता। वहाँ घर कैसे बनाएगा? बच्चों को कैसे पालेगा?”
रामलाल ने शांत स्वर में कहा, “सोहरी, कठिनाइयाँ आएँगी। लेकिन हम मेहनत करेंगे। मैं नहीं चाहता कि गाँव के लोग मेरे कारण एक-दूसरे से लड़ें। शायद कुछ समय दूर रहने से सबको सोचने का अवसर मिले।”
तभी रोहित हेम्ब्रम दौड़ता हुआ आया।
“काकू! काकू, रुक जाइए!”
रामलाल के कदम रुक गए।
रोहित उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखें लाल थीं।
“काकू, आप सचमुच हमें छोड़कर चले जाएँगे? मैं आपको जाने नहीं दूँगा। अगर गाँव के लोग आपस में लड़ रहे हैं, तो हम उन्हें समझाएँगे। आप क्यों सजा भुगत रहे हैं?”
रामलाल ने रोहित के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, मैं कोई सजा भुगतने नहीं जा रहा हूँ। मैं अपने मन से यह निर्णय ले रहा हूँ, ताकि गाँव में आपसी वैर न बढ़े।”
रोहित ने तुरंत कहा, “लेकिन काकू, आपके जाने से हम सब दुखी होंगे। आपकी जरूरत सिर्फ आपके परिवार को नहीं, हम सबको है।”
रामलाल की आँखें भर आईं।
“रोहित, तुम्हारा यह स्नेह ही मेरी ताकत है। लेकिन अभी मेरे लिए यही उचित है कि मैं कुछ समय के लिए दूर चला जाऊँ। तुम गाँव में प्रेम बनाए रखना। किसी के प्रति कटुता मत रखना।”
रोहित ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“काकू, मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगा। जब भी जरूरत होगी, मैं आपसे मिलने आऊँगा।”
रामलाल ने उसे गले लगा लिया।
“मुझे तुम पर विश्वास है, बेटा।”
रोहित की आँखों से आँसू बह निकले। वह कुछ दूर तक रामलाल के साथ चलता रहा। फिर रामलाल ने उसे समझाकर वापस गाँव की ओर भेजा।
उस दृश्य को देखकर गाँव के कई लोग अपने आँसू नहीं रोक सके।
गाँव के एक बुजुर्ग ने कहा, “आज हम किस बात पर लड़ रहे हैं? एक तरफ परंपरा है, दूसरी तरफ अपने ही गाँव का परिवार। क्या दोनों के बीच कोई रास्ता नहीं निकल सकता?”
दूसरे ग्रामीण ने उत्तर दिया, “रास्ता तो निकल सकता है, लेकिन पहले हमें एक-दूसरे की बात सुननी होगी।”
मांझी हाड़ाम, चातुर मांझी और संताली समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू भी वहाँ उपस्थित थे। उनके सामने भी कठिन प्रश्न था। गाँव की परंपराओं का सम्मान कैसे बना रहे और किसी परिवार के साथ अन्याय भी न हो?
सिनाराम मुर्मू ने गंभीर स्वर में कहा, “हम सब इस गाँव के जिम्मेदार लोग हैं। अगर हमारे बीच मतभेद हैं, तो उनका समाधान बातचीत से होना चाहिए। किसी परिवार का दुख हमारे समाज की जीत नहीं हो सकता।”
लेकिन तब तक रामलाल अपना निर्णय कर चुका था।
उसने सबके सामने हाथ जोड़कर कहा, “मैं किसी को दोषी ठहराकर नहीं जा रहा हूँ। आप सभी मेरे अपने हैं। मेरे रहने से अगर गाँव के लोग दो पक्षों में बँट रहे हैं, तो मैं कुछ समय के लिए दूर चला जाता हूँ। मेरी इच्छा है कि गाँव में शांति बनी रहे।”
बागुन ने फिर पुकारा, “रामलाल, आखिरी बार कह रहा हूँ—मत जा!”
रामलाल के कदम रुक गए।
उसने अपने बड़े भाई को देखा। उनकी आँखों में वर्षों का स्नेह था। सामने बड़ी माँ खड़ी थीं, जिनका आँचल आँसुओं से भीग चुका था। एक ओर लातू, रामेश्वर चाचा, सोहरी और रोहित थे, जो उसे रोकने की हर कोशिश कर चुके थे।
रामलाल का मन भीतर से टूट रहा था।
लेकिन उसने सलमा और बच्चों की ओर देखा। फिर गाँव की ओर।
वह धीरे से बोला, “दादा, मेरा शरीर गाँव से दूर जा रहा है, लेकिन मेरा मन यहीं रहेगा। जिस दिन आप सब बुलाएँगे और गाँव में शांति होगी, उस दिन लौटने में मुझे देर नहीं लगेगी।”
उसने अपने बड़े भाई के पैर छुए।
बागुन ने उसे उठाकर गले लगा लिया। दोनों भाई देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे। फिर बागुन ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“जा, भाई। अगर यही तेरा निर्णय है, तो मैं तुझे रोकूँगा नहीं। लेकिन याद रखना, तेरे लौटने का इंतजार करता रहूँगा।”
बागुन की पत्नी ने अपनी गोतिनी सलमा और बच्चों को आशीर्वाद दिया।
“बहन, सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ मत छोड़ना। बच्चों को अच्छी शिक्षा देना। और चाहे जहाँ रहो, अपनी मिट्टी को मत भूलना।”
सलमा ने दीदी के पैर छुए।
“दीदी, आपका आशीर्वाद हमारे साथ रहेगा।”
सबसे अंत में दिलीप हेम्ब्रम आगे आया। वह सलमा का भाई था। उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। उसने रामलाल को गले लगाते हुए भर्राए स्वर में कहा—
“जीजाजी, मुझे आप पर गर्व है। आपने गाँव की एकता बचाने के लिए अपना घर छोड़ने का निर्णय लिया है। लेकिन मैं जानता हूँ कि आप केवल एक परिवार के मुखिया नहीं हैं, बल्कि एक शिक्षक भी हैं। आपने जीवनभर बच्चों को शिक्षा दी है। आज आपका अपना जीवन ही समाज के सामने एक बड़ा पाठ बन गया है।”
रामलाल चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।
दिलीप ने आगे कहा, “आपका यह त्याग एक दिन इस गाँव और पूरे संताल समाज को आईना दिखाएगा। लोग सोचने पर विवश होंगे कि परंपराओं की रक्षा करते-करते कहीं हम अपने ही लोगों को तो नहीं खो रहे हैं।”
फिर उसने अपनी बहन सलमा की ओर देखा।
“सलमा, तुम सचमुच भाग्यवान हो कि तुम्हें रामलाल जैसा जीवनसाथी मिला है। बहन, जीजाजी का साथ कभी मत छोड़ना। कठिनाइयाँ आएँगी, लेकिन विश्वास बनाए रखना।”
सलमा अपने भाई से लिपटकर रो पड़ी।
रामलाल ने दिलीप के कंधे पर हाथ रखा।
“दिलीप, मैं शिक्षक हूँ। मेरा विश्वास है कि शिक्षा केवल किताबों में लिखे अक्षरों का ज्ञान नहीं है। शिक्षा मनुष्य को विवेक, सहिष्णुता और दूसरों के दुख को समझने की शक्ति भी देती है। मैं चाहता हूँ कि एक दिन हमारा समाज इन मूल्यों को समझे।”
दिलीप ने सिर झुका लिया।
“जीजाजी, आपकी यही बात एक दिन लोगों को समझ आएगी।”
रामलाल ने सबको प्रणाम किया और परिवार के साथ वन की ओर चल पड़ा।
पगडंडी पर उसके कदम भारी थे। बच्चे बार-बार पीछे मुड़कर देख रहे थे। सलमा भी अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए आगे बढ़ रही थी।
कुछ दूर चलने के बाद छोटे बेटे ने अपने पिता से पूछा, “बाबा, अब हम कहाँ रहेंगे? क्या हम फिर अपने पुराने घर लौटेंगे?”
रामलाल कुछ क्षण चुप रहा। फिर बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, “बेटा, अभी तो हम एक नया घर बनाएँगे। लेकिन जहाँ भी रहेंगे, तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
बच्चे ने मासूमियत से पूछा, “बाबा, आप हमें पहले की तरह पढ़ाएँगे न?”
रामलाल के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“हाँ बेटा। मैं शिक्षक हूँ। जहाँ रहूँगा, शिक्षा का दीपक जलाता रहूँगा।”
सलमा ने उसकी ओर देखा। वह समझ रही थी कि रामलाल के मन में केवल परिवार की चिंता नहीं, बल्कि अपने विद्यालय और विद्यार्थियों की भी चिंता है।
कुछ क्षण बाद उसने धीरे से पूछा, “आपके विद्यालय का क्या होगा? आपके विद्यार्थी आपका इंतजार करेंगे।”
रामलाल ने गंभीर स्वर में कहा, “सलमा, मैं अपनी जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहता। गाँव छोड़ने का निर्णय अपनी जगह है और सरकारी शिक्षक होने का दायित्व अपनी जगह। मैं शिक्षा विभाग को अपनी परिस्थिति से अवगत कराऊँगा। नियमानुसार जो भी व्यवस्था संभव होगी, उसका पालन करूँगा। बच्चों की पढ़ाई और अपनी सेवा—दोनों को यूँ ही अधूरा नहीं छोड़ सकता।”
सलमा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आप चिंता मत कीजिए। हम कठिनाइयों का सामना मिलकर करेंगे।”
रामलाल ने उसकी ओर देखा। उस क्षण उसे लगा कि जीवन की इस कठिन राह में उसका सबसे बड़ा सहारा सलमा ही है।
गाँव की सीमा पार करते समय रामलाल एक बार फिर रुका।
उसने अपने खेतों, घरों और उस दिशा की ओर देखा, जहाँ मांझी थान था। यही वह मिट्टी थी, जिसमें उसके पूर्वजों की स्मृतियाँ बसी थीं। यही वह समाज था, जिससे अलग होने की कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी।
रामेश्वर चाचा अब भी वहीं खड़े थे।
उन्होंने अपनी बूढ़ी आँखों से जाते हुए परिवार को देखा और धीरे से कहा—
“हे मारांग बुरु! इस परिवार की रक्षा करना। इनके मन में किसी के लिए बैर न आए। इनके त्याग से हमारे समाज को कुछ सीखने की बुद्धि देना।”
हवा चली। पेड़ों की पत्तियाँ सरसराईं।
रामलाल और उसका परिवार धीरे-धीरे वन की ओर बढ़ता गया। सामने अनजान रास्ता था। न घर का ठिकाना, न आजीविका का भरोसा। फिर भी परिवार एक-दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ रहा था।
रामलाल के मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे। एक ओर परिवार का भविष्य था, दूसरी ओर सरकारी सेवा का दायित्व। वह जानता था कि वन में जीवन बसाना आसान नहीं होगा। बच्चों की शिक्षा, रहने की व्यवस्था और अपनी नौकरी से जुड़ी औपचारिकताएँ—सब उसके सामने नई चुनौतियाँ बनकर खड़ी थीं।
लेकिन उसके भीतर एक विश्वास था। जिस शिक्षा और विवेक का पाठ वह वर्षों से अपने विद्यार्थियों को पढ़ाता आया था, अब उसी की कसौटी पर उसका अपना जीवन था।
गाँव में लोग देर तक उसी रास्ते को देखते रहे।
उस दिन रामलाल केवल अपना घर छोड़कर नहीं गया था। वह गाँव के सामने एक ऐसा प्रश्न छोड़ गया था, जिसका उत्तर किसी एक व्यक्ति के पास नहीं था।
क्या अपनी परंपरा की रक्षा करने का अर्थ किसी अपने को खो देना है, या परंपरा की आत्मा को बचाने के लिए अपने भीतर सहिष्णुता और करुणा को स्थान देना भी जरूरी है?
क्या शिक्षा केवल पुस्तकों और विद्यालयों तक सीमित है, या मनुष्य के व्यवहार और सामाजिक जीवन में भी उसका वास्तविक अर्थ दिखाई देना चाहिए?
समय इन प्रश्नों का उत्तर देगा।
और वन की ओर बढ़ते रामलाल के जीवन में अब एक नई परीक्षा शुरू होने वाली थी।