alfaaz e ishq in Hindi Love Stories by amjadaara books and stories PDF | अल्फाज़ ए इश्क भाग 3

Featured Books
Categories
Share

अल्फाज़ ए इश्क भाग 3

तेज हवाओं का शोर जब थमा और सन्नाटा फिर से छा गया, तो कबीर भारी मन और उदास कदमों से उस सुनसान दीवार के पास से चला गया। वह अपने पीछे एक अधूरा शेर और एक अधूरी पेंटिंग छोड़ गया था[span_0](start_span)[span_0](end_span)[span_1](start_span)[span_1](end_span)। 

कुछ ही देर बाद, जब हवा पूरी तरह शांत हो चुकी थी, आयरा दबी पाँवों से वापस उसी जगह पर पहुँची। उसकी नज़र उस दीवार पर पड़ी जहाँ कबीर के छोड़े हुए निशान थे। वह समझ गई कि यह सब कबीर का ही लिखा हुआ है। आयरा ने आगे बढ़कर उस अधूरी पेंटिंग में थोड़े से और रंग भरे, लेकिन इस बार भी उसने उसे पूरा नहीं किया—पेंटिंग को अधूरा ही छोड़ दिया[span_2](start_span)[span_2](end_span)[span_3](start_span)[span_3](end_span)। इसके ठीक बगल में, उसने उस अधूरे शेर को आगे बढ़ाते हुए कुछ और पंक्तियाँ लिख दीं:

बदलते मौसमों की इस ठंडक में, तेरी आहट को ढूँढती हैं नजरें मेरी,
तन्हाई के इस सफर में अब भी हर एक शाम अधूरी रही...

लेकिन उसने भी उस शेर को पूरी तरह मुकम्मल नहीं किया, बल्कि बीच में ही अधूरा छोड़ दिया। 

इसके बाद आयरा थोड़ी दूर जाकर एक कोने में खड़ी हो गई। उसकी आँखें लगातार उसी रास्ते पर टिकी थीं, यह सोचते हुए कि शायद कबीर यहाँ वापस लौटकर आएगा। 

वक्त गुजरता गया, ठंडी हवाएं और तेज हो गईं, और धीरे-धीरे रात का अंधेरा हर तरफ फैल गया। आसमान पर तारे चमकने लगे, लेकिन कबीर वहाँ वापस नहीं लौटा। घंटों तक इंतज़ार करने के बाद भी जब कबीर नहीं आया, तो दिल में गहरा दर्द, मायूसी और तन्हाई समेटे हुए, आयरा बहुत ज्यादा उदास होकर उस सुनसान रात के अंधेरे में अपने घर वापस लौट गई[span_4](start_span)[span_4](end_span)[span_5](start_span)[span_5](end_span)।

उसकी रूह में बस यही सवाल गूंज रहा था कि आखिर कबीर आया क्यों नहीं[span_6](start_span)[span_6](end_span)[span_7](start_span)[span_7](end_span)? क्या उसकी मोहब्बत के इम्तिहान का यह सफर अभी और लंबा था[span_8](start_span)[span_8](end_span)[span_9](start_span)[span_9](end_span)? डायरी के पन्नों पर बिखरे वे अल्फ़ाज़ आज भी उस खामोश दीवार पर हवा के झोंकों के साथ अपनी दास्ताँ कह रहे थे[span_10](start_span)[span_10](end_span)[span_11](start_span)[span_11](end_span):

वो हाथ थामकर जो खाए थे कभी साथ जीने के वादे,
वफ़ा के वो सारे क़स्में आज वक़्त के आगे अधूरी रही[span_12](start_span)[span_12](end_span)[span_13](start_span)[span_13](end_span)।

डायरी के पन्नों पर लिखे थे जो मिलन के हसीं ख़्वाब,
हक़ीक़त की धूप में वो हर एक अधूरी ख़्वाहिश रही[span_14](start_span)[span_14](end_span)[span_15](start_span)[span_15](end_span)।

बिछड़ रहे हैं आज कुछ वक्त के लिए इस मोड़ पर हम,
पर यक़ीन है कि मुकम्मल होगी जो आज अधूरी रही[span_16](start_span)[span_16](end_span)[span_17](start_span)[span_17](end_span)।

लौटेंगे फिर से हम दोनों एक दिन अपनी उसी राह पर,
जो राहें आज इस मुश्किल सफर में हमारे बीच अधूरी रही[span_18](start_span)[span_18](end_span)[span_19](start_span)[span_19](end_span)।

खामोशियों के साए में अब दिल को यह यकीन दिलाना है,
हर एक जख्म को सीने पर सजाकर मुस्कुराना है।
फसलों की दूरियां चाहे जितनी भी क्यों न बढ़ जाएं,
हमें अपनी इस मोहब्बत को मुकम्मल कर दिखाना है।

रात के इस सन्नाटे में गूंजती है बस तेरी ही आवाज़,
हर एक धड़कन में छुपा है सिर्फ तेरा ही यह साज़।
सितारों की छांव में बैठ कर हम खुद से यह पूछते हैं,
क्यों हमारे दरमियान यह फासले और बढ़ते जाते हैं।

तेरी यादों के सहारे ही कटती है हर एक रात हमारी,
तू दूर होकर भी दिल के सबसे ज्यादा पास है प्यारी।
12 12 q2 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12 12