alfaaz e ishq in Hindi Love Stories by amjadaara books and stories PDF | अल्फाज़ ए इश्क भाग 6

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अल्फाज़ ए इश्क भाग 6

कबीर के इस दुनिया से हमेशा के लिए चले जाने के बाद, आयरा की जिंदगी में जैसे सन्नाटा पसर गया था। उसे अपने आस-पास कोई भी नजर नहीं आता था—चारों तरफ बस एक गहरा अकेलापन और वीरानी थी। उसे ऐसा महसूस होता था जैसे अब इस बेरहम दुनिया में उसका अपना कहने वाला कोई नहीं बचा है, और वह बिल्कुल अकेली और तन्हा रह गई है। उसके दिल का हर एक कोना सिर्फ कबीर की कमी को महसूस कर रहा था, और इस घुटन भरे माहौल में कोई भी आयरा के इस दर्द को कम नहीं कर पा रहा था।

धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई वह उसी पुरानी और सुनसान दीवार के पास पहुँची। यह वही दीवार थी जहाँ कभी उसने एक पेंटिंग बनाई थी, जिसे बाद में कबीर ने थोड़े से रंग दिए थे। वे दोनों कभी आमने-सामने मिल नहीं पाए थे, बस उस पेंटिंग के जरिए उनका एक अधूरा रिश्ता जुड़ा था। आयरा कई बार खुद को इस वीरान जगह पर अकेला पाती थी, क्योंकि वह मानती थी कि यह पुरानी यादें उसे अंदर ही अंदर तोड़ रही हैं, लेकिन उसकी बेबसी के आगे किसी की भी एक नहीं चलती थी।

आज कबीर के जाने के बाद, आयरा उसी अधूरी पेंटिंग के सामने चुपचाप जाकर बैठ गई। उसकी नम आँखें उस दीवार पर टकटकी लगाए देख रही थीं। अपने दिल के टूटने और तन्हाई के इस आलम में, उसने अपने दर्द को बयां करते हुए सीधे उस दीवार पर ही अपने हाथों से ये शेर लिख दिए:

"अपने रब की इज़्ज़त की कसम खाती हूँ, ना करूँगी निकाह किसी और से।
कयामत तक का इंतज़ार करूँगी, हश्र में अपने रब से माँग लूँगी आपको।"

"मांगा था तुम्हें इतना दुआओं में कि हम भी भूल गए,
लेकिन, मेरे रब को हर बार का याद है।"

इन शेरों के साथ ही, उसकी तन्हाई और इंतजार के दर्द को बयां करती हुई ये पंक्तियाँ और शेर भी वहीं दीवार पर उतर आए:

सन्नाटे की चादर ओढ़े बैठी हूँ इस वीरान मोड़ पर,

तेरी यादों के सहारे ही काट लेंगे ये तन्हा ज़िंदगी,
तू लौट के आए ना आए, ये आँखें रास्ता ना छोड़ेगी।

तन्हाई का यह आलम और भी गहरा हो गया, जब दिल की गहराइयों से कुछ और दर्द भरे शेर उस दीवार पर उतर आए:



फना हो जाऊँ तेरी चाहत में इस तरह से,
कि जमाने को मेरी वफ़ा पर नाज़ हो जाए।
मिले जो कभी अगली दुनिया में तू मुझे,
खुदा से बस इतनी सी हमारी अर्जी हो जाए।

तेरी हर एक आहट का पहरा है इस दिल पर,
तू पास नहीं फिर भी तेरा साया है हर पल पर।

इन शेरों को उस दीवार पर उकेरने के बाद, आयरा का दिल कबीर की यादों के समंदर में डूब गया। वह उदास आँखें लिए खुद को उस मोड़ पर पाती और मन ही मन दुआ करती कि उसके दिल को थोड़ा सुकून मिल सके, पर आयरा पर तो जैसे कबीर की यादों का नशा और इंतजार का पहरा बैठा था। वह आज भी कबीर की राह तकती है, उसी की यादों के साए में जीती है और हर सांस के साथ सिर्फ उसी का इंतजार करती है...