Conflict and resolution in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | संघर्ष और संकल्प

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संघर्ष और संकल्प

*अपनो का दर्द *

रूपा पति से लड़ झगड़कर अपने कमरे में बैठी रो रही थी । आए दिन सास और नंद जली कटी सुनाती और पति रूपेश रोज दारू पीकर आता और पत्नी रूपा को मारता पीटता व गालियां देता था । रूपा बहुत दुखी रहती थी ,दिन भर घर काम करती फिर खेतों में काम करने जाती । थक हार कर घर आती रात का खाना बनाती, पति दारू पीकर आता ,झगड़ा करता फिर वह बिना खाए सो जाती थी, या रोती रहती थी । कोई भी उसको खाने के लिए नहीं कहता था ,उसका मन करे तो खा ले ,मन करे तो भूखी रह जाए, किसी को उसकी परवाह नहीं थी ।
                       कभी-कभी गृहक्लेश से रूपा इतनी दुखी हो जाती जो वह आत्महत्या तक के बारे में सोच लेती थी, परंतु दो बच्चों के चेहरों की याद करके यह विचार स्थगित कर देती थी । सोचती ---- मैंने क्या अपराध किया है ,जो ऐसा पति मिला है, कभी मेरी परवाह ही नहीं करता, न सास को कुछ समझ आता है ,ननंद अपने पति गृह को छोड़कर यहां आकर बैठ गई है, 2 वर्ष से यही पर है, घर का कुछ भी काम नहीं करती ,वह भी उसके काम में कमियां निकाल कर, अपनी मां व भाई को उसके विरुद्ध भड़काती रहती है ।
             एक दिन उसने अपनी सहेली पुष्पा से अपने परिवारिक लड़ाई झगड़े के विषय में चर्चा की । दोनों सखी खेतों में काम करने जाती थी, तो पुष्पा बोली — बहन थोड़े दिन अपने मायके चली जा, मन दूसरा हो जाएगा ।
आह भर रूपा बोली — ठीक कहती हो , ---- मेरा तो मायका ---- पिता , भाई , सौतेली मां सब है , परंतु वर्षों हो गए ,कोई मुझे पूछते नहीं ------ना जाने कैसी किस्मत लिखाकर लाई हूं ------। बहन -------। 
                 पिता समृद्ध व्यापारी है ,वर्षों पूर्व मेरी जन्म दात्री मां का निधन हो गया, पिता मेरी शादी के बाद एक बार ही मुझे लेकर गए थे, उसके बाद से मैंने पिता का चेहरा नहीं देखा है, कभी भी वह मुझे याद नहीं करते । मैं ही कभी-कभी याद करती रहती हूं ।  
पुष्पा बोली — ऐसी क्या बात है ,बहन ? तेरे जैसी सम्य, सुशील महिला मिलना कठिन है परंतु ना तो तेरा पति पूछता है ,ना पिता पूछता है ,क्या बात है ? 
रूपा बोली — क्या बताऊं बहन ? अपने दुर्भाग्य को किससे कहूं ? मेरे पिता जी घनाडय व्यापारी व्यक्ति है मेरी मां सीधी – साधी महिला थी ,पिताजी उनको कभी पसंद नहीं करते थे । अपने माता-पिता के दबाव में उन्होंने मेरी मां से शादी की थी । 
पुष्पा ने पूछा — फिर क्या हुआ ? 
रूपा बोली — होता क्या ? पापा मां को पसंद नहीं करते थे । कभी कहीं लेकर ना तो जाते थे ,ना उनका ध्यान रखते थे । मां परंपरागत रूप से पिता को पतिदेव मानकर सदैव उनका ध्यान रखती थी ,वे पिता जी से लड़ती झगड़ती भी नहीं थी । कभी जवाब भी देना नहीं जानती थी , बस मन में घुटती रहती थी । इसी बीच मेरा जन्म हुआ - प्रसव काल में मां की समुचित देखभाल नहीं हो पाई ----- और मेरी माता जी बीमार रहने लगी । 
          पापा को मेरे जन्म पर ना कोई खुशी, ना कोई गम, उन्हें कोई मतलब नहीं था । समुचित देखभाल के अभाव में मां को अस्थमा की बीमारी हो गई । मां को बीमारी के कारण अलग कमरे में रखा जाने लगा और मैं नौकरों के सहारे पलती बड़ी होती रही । दादी बुढी थी, कभी-कभी मेरा ध्यान रखती ,वैसे भी जिस महिला को उसका पति महत्व नहीं देता तो उस महिला को कोई महत्व नहीं देता, और फिर मेरी मां को तो टी-वी की बीमारी थी , उसे कौन पूछता ? उचित देखभाल, दवाइयां, समुचित व्यवस्था न होने के कारण मां की बीमारी बड़ती गई । 
               मां जिंदगी भर उपेक्षा, अपमान झेलकर जीती रही , मैं भी ऐसे ही वातावरण में पलती बढ़ती रही । जिस मां का घर में सम्मान नहीं होता ,उस मां के बच्चों का भी कोई नहीं होता ,मैं भी इधर-उधर घूमती , नौकरों के सहारे जीती थी । समय आने पर मेरा दाखिला स्कूल में हो गया परंतु कोई मेरा भी ध्यान देने वाला नहीं था - क्या पढ़ रही हूं? और क्या नहीं ,कभी पिता ने नहीं पूछा - हम मां बेटी दोनों का जीवन उपेक्षा व तिरस्कार में बीता ,जबकि घर में धन का अभाव नहीं था ,फिर भी हम सुखी नहीं थी । 
                      बीमारी और देखभाल के अभाव में मेरे बचपन में ही मेरी मां खत्म हो गई । उसके मरने के कुछ दिनों बाद दादी भी मर गई । मैं और अकेली हो गई । पिता ने अपने पसंद से दूसरी शादी कर ली । नयी मां को पिता अपनी इच्छा से लाए थे इसलिए उसका घर में आदर मान होने लगा । दादी भी नहीं थी , नयी मां घर की मालकिन थी ,उनको जैसा मन में आता ,वैसी ही वह करती थी । मैं छोटी थी, ज्यादा कुछ नहीं समझती थी । 
                 मैं घर में अवांछित जंतु थी , कौन मेरी देखभाल करता ? मैं किस्मत के सहारे पलती और पढ़ती रही, जैसे तैसे मैंने 10वीं पास कर ली, फिर 12 वी में नयी मां पढ़ाना ही नहीं चाहती थी, तो भी मैं पढ़ती रही । तब तक घर में एक भाई आ चुका था । वह बड़ा लाडला था, माता-पिता दोनों का प्यार उसे मिला । नौकर भी उसकी बड़ी देखभाल करते थे । 
               जैसे- तैसे मैंने 12वीं तक पढ़ाई की | 12वीं की परीक्षा देने के बाद मेरी शादी यहां कर दी । शादी के बाद एक बार पिताजी ले गए थे ,उसके बाद ना तो पापा कभी मुझे बुलाए और ना कभी मेरा हाल-चाल पूछे —माँ तो सौतेली है ,परंतु पिता भी सौतेला हो गया है, पिता ने अपना बच्चा समझ कर मुझे कभी अपना स्नेह नहीं दिया ,एक बेगाना सा जीवन मैंने जिया है ,प्रेम क्या होता है ?पिता क्या होता है? मैं नहीं जानती । अब तो भाई भी बड़ा हो गया है, सुनी हूं उसकी शादी हो गई है । भाई की शादी के समय भी पापा, मम्मी ने मुझे नहीं बुलाया । हम गरीबों को कौन पूछता है ? ----- जब सगा बाप नहीं पूछता, तो----- सौतेली मां और सौतेले भाई से क्या शिकायत -----? वह सोच में डूब गई ------ मैं भी उसी घर की बेटी हूं ,जिस घर का भाई है ----- एक मेरा भाग्य और एक वह है -----। सब किस्मत का खेल है ---सब कह गई रूपा | 
                     यहां ससुराल में इन लोगों की एक दुकान है परंतु दारु पीने के कारण ना तो काम ठीक से करते हैं और ना ठीक से रहते हैं । जब शादी होकर आई थी, तब तो इतना नहीं पीते थे, अब दिन प्रतिदिन ज्यादा पीने लगे हैं , और दुकान का ध्यान नहीं देने से ग्राहक कम होते जा रहे हैं। मुझे तो कभी पैसा देते ही नहीं है ,अपने खर्चो के लिए मुझे खेतों में काम करने जाना पड़ता है। बच्चों की किताबें व कॉपियां तक नहीं खरीद कर देते ,पूरा ध्यान न देने से बेटी रमा इस वर्ष दसवीं परीक्षा में फेल हो गई । घर व खेतों में काम करते-करते मैं भी थक जाती हूं ,घर में कलह कलेश रहता है, इसलिए रमा का मन पढ़ने में नहीं लगता और वो पढ़ाई पर ध्यान नहीं देती है । 
                 घर के लड़ाई, झगड़ा ,मारपीट, से रूपा बहुत दुखी रहती थी ,पति व परिजनों द्वारा प्रताड़ित करने की बात एक दिन उसने समाज के मुखिया से कहकर न्याय की गुहार लगाई तो समाज के मुखिया – रामेश्वर ने उसके पति को समझाया, पति रूपेश रामेश्वर के सामने पत्नी की प्रशंसा करने लगा - और रामेश्वर के वापस जाने के बाद घर में उसने रूपा को बहुत पीटा कहा - "घर की बात बाहर निकाल कर मेरी बदनामी करती है । रहना है तो ढंग से रह नहीं तो निकल जा ।"
                      ऐसा वो कई बार कह चुका था — घर से निकल जा - परंतु घर की मान मर्यादा सोचकर रूपा चुप रह जाती थी । कभी यदि काम से लौटने में जरा भी देर हो जाती थी तो रूपा का पति रूपेश उसे बहुत डांटता था । वह उसके चरित्र पर शंका करता था इसलिए वह समय पर काम निपटाकर जल्दी-जल्दी घर लौटती थी । महिला सब कुछ सहन कर सकती है परंतु अपने चरित्र पर लांछन सहन करना उसे कठिन होता है । एक समझदार महिला बाहर या सार्वजनिक जीवन में काम करते हुए भी इस बात का ध्यान रखती है कि उसके चरित्र पर लांछन ना लगे, परंतु रूपेश उसकी भावनाओं और कार्यों की परवाह न करते हुए कुछ भी लांछन लगा देता था । बार-बार लांछन लगाने से रूपा तिलमिला गई ,उसने कहा — "जब तुम मुझे लांछन लगाते हो तो मुझे भी तुम्हारी कोई चिंता नहीं है ।"
         वह जिसके खेत में काम करती थी, उसी मालकिन के घर जाकर उनसे बोली —"माताजी मुझे आप एक कमरा दे दो, मैं अब यही रहूंगी - "
       मालकिन ने पूछा — "क्या बात है रूपा ? लगता है आज फिर तुझे रूपेश ने मारा है ।"
            आज रूपा का धैर्य टूट गया वह रो पड़ी ,उसने अपनी पीठ और टांगे मां को दिखाई - "देखो ,ऐसे बेरहमी से मारता है" ----- कहकर रूपा बिलख पड़ी । 
          मालकिन बोली - "मैं एक कमरा दे देती हूँ, तुम यहीं पर रह जाओ ।" 
           रूपा अपना सामान व बच्चों को लाकर उस कमरे में रहने लगी । घर छोड़ते समय रूपा को भी अखर रहा था । घर किसी भी प्राणी के लिए मोह का कारक होता है,स्वाभाविक ही हर व्यक्ति को घर से प्रीति होती ही है । रूपा को भी होना स्वाभाविक थी , परंतु मन को कड़ा करके वह घर से निकल आई और मालकिन के दिए कमरे में रहने लगी ।
                  अब रूपा सुबह जल्दी उठती , अपने नित्यकर्म से निपटकर वह एक अन्य घर में जाकर घर का काम - बर्तन ,कपड़ा धोने का - कर देती थी | बेटी रमा तब तक खाना बना लेती फिर खाना खाकर वह मालकिन के खेत में काम करने चली जाती थी, इस तरह उसे कुछ और आमदनी भी हो जाती थी । अब उसका मन थोड़ा शांत रहना चाहता था, परंतु पति रूपेश की याद सताती रहती थी ,पता नहीं खाना खाया या नहीं ? वह सोचते रहती — परंतु वह अपनी तरफ से उससे बात करना नहीं चाहती थी ।
                      लगभग दो माह बाद रूपेश का फोन आया "मेरी तबीयत ठीक नहीं है ,डॉक्टर को दिखाना है, मेरे साथ चलो ।" 
रूपा बोली —" दुकान में आ जाओ वहीं से मैं साथ चल दूंगी , घर नहीं आऊंगी ।"
                  रूपेश की दुकान से ही रूपा और रूपेश - दोनों डॉक्टर को दिखाने गए, दवा लेकर रूपेश बोला - "अब घर चलो, बहुत हो गया ।"
रूपा बोली – "मैं वहां ठीक हूं, तुम घर में रहो ,मैं वहीं पर रहूंगी ।"
                   रूपेश को रूपा के बिना घर में अच्छा नहीं लगता था, परंतु अपनी पीने की आदत से वह लाचार था, अब भी वह पीकर आता और बहन व मां से लड़ता था । अब मां और बहन परेशान रहने लगी | पहले तो घर का काम रूपा करती थी । दोनों मां बेटी - आराम करती थी , और रूपा को बातें सुनाती व रूपेश को उसके खिलाफ भड़काती थी । दो महीने में ही उनको रूपा की कीमत समझ आने लगी । अब रूपेश को झेलना उन दोनों कठिन हो गया । उसका टाइम बे टाइम घर आना, फिर हर बात में तीन - पांच करना , उनको सहन नहीं हो रहा था । आखिर एक दिन मां ने कहा — " मैं तेरा नखरा नहीं उठा सकती या तू रूपा के पास जाकर रह, या रूपा को लेकर आ ,मेरे से इस उमर में काम नहीं होता है ।" उस दिन घर में खूब झगड़ा हुआ ।रूपा के घर छोड़ने को लेकर माँ ,बहन , रुपेश एक दूसरे को दोष देते रहे ।
         अब रूपेश को रूपा की उपयोगिता समझ आई , फिर वह एक दिन रूपा से खेत में मिला ,उससे बहुत बातें की | रूपा तो स्वभाव से अच्छी महिला है, फिर एक दिन वह रूपा के घर में गया, उसको एक कमरे में रहता देखकर बोला — " अपना इतना बड़ा घर है, यहां कहां एक कमरे में रहती हो ,चलो अपने घर चलते है |
रूपा बोली – अब यहीं ठीक हूँ |
रुपेश बोला – घर चलो , रमा बड़ी हो रही है ,यहाँ अकेले रहती हो ,उसके लिए भी लड़का देखना है ,यहाँ रहोगी तो कैसे उसकी शादी हो पायेगी ?
रूपा बोली – जब शादी होगी तब देखी जायेगी , अभी मैं यहीं ठीक हूँ |
रुपेश बोला – समाज में बदनामी फ़ैल जायेगी , फिर कोई अच्छा घर बार नहीं मिलेगा |
रूपा बोली – यह बाते तुमको पहले सोचनी चाहिये थी , मैं इन बातो को बहुत सोचती थी ,इसलिए , तुम्हारी मार पीट ,लांछन सब सहती रही , परन्तु तुमने कभी मेरी परवाह नहीं की |
रुपेश का अहंकार गल गया था, बोला – अभी तो बोल रहा हूँ , मेरी गलती के लिये छोड़ माफ़ कर -अब घर चल , तेरे बिना मुझे भी अच्छा नहीं लगता है, घर सूना - सुना लगता है, अपना घर अपना ही होता है |
रूपा बोली – मैं घर पहुँच जाऊँगी तो तुम फिर मार पीट ,गाली , गलौज करोगे, फिर पीकर आओगे?
रुपेश बोले – अब नहीं पीऊंगा , घर तो चल ,उसने उसे मनाने की मुद्रा में, कंधे पर हाथ रखकर बहुत समझाया |मेरी गलती , मैं मान रहा हूँ. अब आगे की बात सोचो ,पुरानी बातें छोड़ दो. इस तरह 
            समझा बुझाकर , रूपेश रूपा को अपने घर ले आया । नारी स्वभाव से कठोर नहीं हो पाती ,वह भी रुपेश की बातो में आ गई और अपने घर चली गई ।

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     छतीसगढ़ रत्न 
                                                           
   डॉ.शिरोमणि माथुर
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